‘न्यायपालिका की तत्परता में सुधार की जरूरत पर आत्मचिंतन किया जाए’, बोले CJI सूर्यकांत

नई दिल्ली। महत्वपूर्ण मामलों में अदालतों की ओर से समय रहते हस्तक्षेप करने की अहमियत पर जोर देते हुए सीजेआई सूर्य कांत ने कहा कि न्याय और अन्याय के बीच का अंतर अंतिम फैसले में नहीं, बल्कि इस बात में है कि क्या अदालत ने तब हस्तक्षेप किया जब हस्तक्षेप की सबसे ज्यादा जरूरत थी।
उन्होंने न्यायपालिका, खासकर संवैधानिक अदालतों से आत्म-मंथन करने को कहा ताकि वे अपने कामकाज को और बेहतर बना सकें और मामलों की लिस्टिंग को अधिक पारदर्शी और अनुमान लगाने योग्य बना सकें।
‘न्याय की शुरुआत और अंत दिल्ली में नहीं’
केरल उच्च न्यायालय के प्लेटिनम जुबली समारोह में बोलते हुए सीजेआई ने कहा कि भारत में संवैधानिक न्याय की शुरुआत और अंत नई दिल्ली में नहीं होता है। इसकी असली ताकत देश भर में फैले 25 उच्च न्यायालयों के मजबूत नेटवर्क में है, जिनमें से प्रत्येक पर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने और कानून के शासन को बनाए रखने की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि नागरिकों की समस्याओं से निपटने के लिए हाई कोर्ट ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं, क्योंकि वे लोगों की रोजमर्रा की वास्तविकताओं से गहराई से जुड़े होते हैं। उन्होंने कहा, “इसी संदर्भ में मैं अनुच्छेद 226 के असाधारण संवैधानिक महत्व पर जोर देना चाहता हूं। इसका व्यापक दायरा हमारी न्यायिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। जहां अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने की गारंटी देता है, वहीं अनुच्छेद 226 हाई कोर्ट्स को यह अधिकार देता है कि वे न केवल मौलिक अधिकारों, बल्कि अन्य कानूनी अधिकारों के लिए भी उचित रिट और निर्देश जारी कर सकें।”
