ये कहां आ गए हम.? @ डॉ. सुधीर सक्सेना

ये कहां आ गये हम?
• डॉ. सुधीर सक्सेना
सदी के सिनेनायक की एक लोकप्रिय और हिट फिल्म के गीत के शुरूआती बोल हैं ‘ये कहां आ गये हम?’ गीत का प्रश्नातुर मुखड़ा इस आशय का कोई संकेत नहीं देता कि नायक-नायिका किस मकाम पर आन पहुंचे हैं? दिलचस्प तौर पर यह मुखड़ा इस महादेश की सियासत और जम्हूरियत के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक है। घटनाक्रम तीखा है और नुकीले तीक्ष्ण प्रश्न खड़े करता है। सिर्फ अंदाज लगाया जा सकता है कि देश-दुनिया किस दिशा में अग्रसर है। जानना जरूरी है कि हम किस धरातल या पायदान पर हैं, या हम किसी ‘जंपिंग बोर्ड’ पर हैं?
इधर लगभग रोजाना जो खबरें मिल रही हैं, वे भयावह हैं। उनके लिये चिंताजनक शब्द सचमुच छोटा है। ऐसी खबरें अपने गर्भ में अत्यंत अनिष्टकारी और खतरनाक आशंकाओं को समेटे हुये हैं। ज्यादा पीछे न जायें। इसी अगस्त मास की खबर है। आठ अगस्त को उत्तराखंड में हल्द्वानी में एक सभा हुई। सभा को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, अध्यक्ष और सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे ने संबोधित किया। सभा संपन्न हो गयी। कोई बड़ी बात नहीं। गंभीर और बड़ी बात वह है, जो इसके बाद घटित हुई। उसके बाद कथित सनातनी तत्वों ने वहां शुद्धिकरण के लिये हवन किया। यह एक शर्मनाक कृत्य था। उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार है, लेकिन सरकार की भृकुटि में बल नहीं पड़े। खड़गे ने जब यह मामला संसद में उठाया तो न तो प्रधानमंत्री का बयान आया और न ही गृहमंत्री का। कार्रवाई होने की बात तो दूर, जेपी नड्डा ने यह कहकर कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली कि मामले की जांच होगी। यह घटना अपनी तरह की इकलौती या अपूर्व घटना नहीं है। मई, सन 2024 में सपा-नेता अखिलेश यादव के साथ भी कन्नौज के गौरीशंकर मंदिर में ऐसा ही हुआ था। तब भी मंदिर को गंगाजल से धोया गया था। अप्रैल, सन 25 में राजस्थालन में अलवर में टीकाराम जूली के साथ यही हुआ था। बीजेपी के ज्ञानदेव आहुजा सुर्खियों में उभरे थे। प्रकरण बहुतेरे हैं। इन प्रकरणों में क्या कार्रवाई हुई? कार्रवाई के नाम पर सिफर के पीछे कौन सी शक्तियां और मानसिकता काम कर रही है? अध्योध्या में भव्य और विराट मंदिर बना। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु को क्यों नहीं बुलाया गया? क्या स्त्री और आदिवासी होने से वह अपात्र हो गयीं? सोचने की बात है कि धर्म-ध्वजाधारी कैसे धर्म की दुहाई दे रहे हैं और वे धर्म के पोषक हैं अथवा अधर्म के? खड़गे परिपक्व और जुझारू नेता हैं, जो कहते हैं कि मुझमें लड़ने की शक्ति है और मैं लड़ता हूं। वह कोई रियायत नहीं मांगते। वह नौ बार एमएलए और पांच बार एमपी रहे हैं। अखिलेश की पृष्ठभूमि भी सबको ज्ञात है। जब अखिलेश और खड़गे के साथ ऐसा घृणित सलूक हो सकता है तो सोचकर ही कंपकपी आती है कि कथित सनातनियों के मन में कैसी आसुरी शक्तियां पनप चुकी हैं और इस घटनाक्रम की अंतिम परिणति क्या होगी? सोचने की बात है कि तब दलितों, वंचितों, पिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का क्या होगा? ये घटक ही तो हमारे जनगण की संरचना करते हैं।
एक और खबर। तारीख के मान से ताजा खबर। वर्ष 2013 में मुजफ्फर नगर दंगों से जुड़े मामले में विशेष एमपी, एमएलए अदालत ने 25 कार्यकर्ता आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की अभियोजन पक्ष की याचिका को स्वीकार कर लिया है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का यह फैसला प्रश्न खड़े करता है। यह प्रश्न पश्चिमी उत्तरप्रदेश की राजनीति में गेमचेंजर सिद्ध हुआ था। सोचने की बात है कि ताजा फैसले से किसे गिज़ा मिलेगी और किसे हवा? खबरों की लड़ी में ताजा खबर है – गुजरात से जहां जेएनयू में स्कूल आफ सोशल साइंसेज की पूर्व डीन, ज्यूरिख, पेरिस और एडिनवर्ग में विजिटिंग प्रोफेसर और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की सदस्य रही प्रो. जोया हसन को सरदार पटेल कॉलेज में मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाये जाने के बावजूद राष्ट्रध्वज फहराने और बोलने से रोक दिया गया।
गौरतलब है कि पिछली दहाई में देश में क्या हुआ है? लोकतंत्र की गाड़ी का स्टीयरिंग व्हील किन हाथों में है और उसे कितने कोण से मोड़ा गया है? संवैधानिक संस्थाओं और सार्वजनिक उपक्रमों की दशा और दिशा पर पोथियां लिखी जा सकती हैं। क्या हमें इन पर श्वेत-पत्र की जरूरत है? यह अकारण नहीं है कि नलसर, हैदराबाद विश्वविद्यालय के कानून के छात्र दीक्षांत समारोह में सुप्रीम कोर्ट के सीजे के हाथों डिग्रियां लेने का विरोध करते हैं। कानून के छात्रों के लिये सीजेआई के हाथों सनद लेना गर्व की बात होनी चाहिये थी, मगर वे ऐसा नहीं चाहते। क्यों? उत्तर में आज का ‘सत्य’ निहित है। क्षेपक यह कि बर कौंसिल आफ इंडिया विवाद में कूदकर कड़ा फर्मान जारी करती है, लेकिन छात्रों के सत्याग्रह की चेतावनी से उसके हाथ-पांव फूल जाते हैं और वह फर्मान वापस ले लेती है, मगर उसकी मानसिकता उदघाटित होने से बच नहीं पाती।
संप्रति, सबका सलीका और सलूक कसौटी पर है? जो बिरादरी नियामक शक्तियों के निशाने पर है, वो सबको दीख रही है, मगर अभी अनदीखती बिरादरियां और भी हैं। जनगण का बड़ा वर्ग खतरे में है। देश में कुछ राज्य देखते ही देखते ‘पेट्री तश्तरी’ बन गये हैं। भगवा-ब्रिगेड की प्रयोगशालाएं अनेक हैं। तो क्या जनगण का बड़ा वर्ग भविष्य में ‘घेट्टो’ में निर्वासित होने को बाध्य होगा?
यह प्रश्न सिर्फ पंद्रह अगस्त पर नहीं, यूं भी मौजूं है कि क्या हम वाकई लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं, जिसका वायदा संविधान ने हमसे किया था या फिर लोकतंत्र प्रहसन या स्वांग में बदल गया है? क्या संप्रति नियामक शक्तियां जनगण को छल रही हैं और प्रपंच में लिप्त है? जनगण और लोकतंत्र का सीधा रिश्ता है, क्या लोकतंत्र को छूछा और रिक्त किया जा रहा है और लोकतंत्र और मुक्त बाजार काबिज ताकतों के जरिये ‘बावरा अहेरी’ में बदल गये हैं?
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