जन गण मन अधिनायक…..! @ डॉ. सुधीर सक्सेना

जन गण मन अधिनायक…..!
• डॉ. सुधीर सक्सेना
एक भारतीय आत्मा पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की पंक्तियां हैं : जन गण मन अधिनायक तेरा उसे विश्व का दास न कर तू। ये पंक्तियां उन्होंने बीती शती में आजादी के कुछ साल बाद लिखी थीं। इसी कविता की पंक्ति है : सिर के ऊपर पेट चढ़ाकर अपना सत्यानाश न कर तू। माखन लाल चतुर्वेदी ओज और तेज के गायक-कवि थे। उन्होंने ‘पुष्प की अभिलाषा’ जैसी कविता भी लिखी है। उनके लिये वह फूल वरेण्य है, जो सुरबाला के केशों में गूँथे जाने की चाह नहीं रखता वह वनमाली से यह कहकर तोड़ने की याचना करता है कि उसे उस पथ पर फेंक दिया जाये, जिस पथ से मातृभूमि पर शीश चढ़ाने को मतवाले वीर गुजरते हैं।
यह स्वतंत्रता का गौरव-गान है। यह स्वतंत्रता का स्तवन है। यह मुक्ति का स्फूर्त-छंद है। यह आजादी की महिमा का बखान है। आजादी क्या है? आजादी से बड़ी कोई नेमत नहीं। उस पर सब कुछ निसार है। उस पर कलधौत के धाम निछावर हैं। आजादी है तो वन है। आजादी ऐसी दौलत है, जिसका न तो मोल लगाया जा सकता है और न ही जिसकी कीमत कूती जा सकती है। इन्हीं अर्थों में पंद्रह अगस्त भारत के सुदीर्घ और आरोह-अवरोह भरे इतिहास की सबसे उजली और मानीखेज तारीख है। इस दिन वैश्विक परिदृश्य में भारत ऐसे विलक्षण राष्ट्र के रूप में उभरा था, जिसने कृशकाय किंतु तप:पूत महात्मा गांधी नामक विश्व इतिहास के विलक्षणतम महानायक के नेतृत्व में सत्याग्रह और बलिदानों से दासता से मुक्ति पाई थी। गांधी जागृत महामना थे, लेकिन उनकी महत्ता यह थी कि उन्होंने कोटि-कोटि जन को जागृत किया। उन्होंने कोटि-कोटि भारतीयों को सत्याग्रही योद्धाओं में बदल दिया। उनका आचरण कि विश्व मानवता विस्मित हो उठी। उनके लिये सत्य ही ईश्वर था। उनका अभीष्ट था जन की मुक्ति; सिर्फ राजनीतिक मुक्ति नहीं, समाज की अस्पृश्यता, हिंसा, लिंग-भेद, असमानता, अंधविश्वासों और कुरीतियों से मुक्ति। वे गैर-बराबरी के खिलाफ थे। वे सांप्रदायिकता के खिलाफ थे। वे राजतंत्र और दमनतंत्र के खिलाफ थे। जातीय और सांप्रदायिक वैमनस्य उन्हें स्वीकार्य न था। उनका जीवन ही उनका संदेश था और उनकी हत्या विश्व मानवता के लिए स्तब्धकारी सबक कि अनिष्ठकारी, प्रतिगामी और हिंस्र शक्तियों को न तो गांधी पसंद हैं और न ही उनका मार्ग और न ही उनके सपने। जाहिर है कि गांधी उनकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा थे और आज भी हैं। गांधी सत्य, शुचिता, लोक और लोकमंगल की व्यवस्था में प्रतिष्ठा के हिमायती थे। डॉ. आंबेडकर का संविधान गांधी के संघर्ष और सपनों के आलोक में लिखा गया। विश्व कवि रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसी महान और स्निग्ध आलोक में ‘जनगण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता’ रचा। नेताजी सुभाष बोस की प्रेरणा से यह स्वरबद्ध हुआ।
इस तरह पंद्रह अगस्त जनगण की प्रतिष्ठ का लोकपर्व है। वह किसी जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ग, वर्ण या संगठन विशेष का नहीं, अपितु एक अरब पैंतालिस करोड़ भारतीयों का महापर्व है। मगर सन 1947 और सन 2026 में सिर्फ वर्षों का नहीं, वातावरण का भी फासला है। यह फासला दहाई दर दहाई घट-बढ़ का शिकार रहा है। आज हम कहां खड़े हैं और किस दिशा में अग्रसर हैं? यह कोई यक्ष प्रश्न नहीं है, कि उत्तर के लिए हम किसी युधिष्ठिर को तलाशें। हम सबके भीतर युधिष्ठिर है, जिसे नंगी आंखों से सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा है। जंतर-मंतर पर जेनजी का आंदोलन चक्षुरून्मीलन का प्रसंग है। भविष्य में ऐसे प्रसंग बढ़ेंगे। हां यह यक्ष प्रश्न जरूर है कि असहमति, विरोध और आंदोलन के प्रति सत्ता का सलूक कैसा हो? यह भी यक्ष प्रश्न है कि व्यवस्था की सक्रियता का अभीष्ट जनगण है अथवा इनेगिने विशिष्टजन या संप्रदाय विशेष? बात नात्सी, फासी या सेक्यूलर शब्दावली की नहीं है, मुद्दा यह है कि हम कितने संवेदनशील उदात्त हैं और समावेशी या सामासिक समाज के निर्माण के लिए हमारी आस्था और आचरण की क्या दशा और दिशा है? मुद्दा यह भी है कि राजनीतिक व्यवस्था में शीर्ष का जनगण से सरोकार है या नहीं और यदि है तो कितना है और उसकी निष्ठा किस दर्शन या वाद के प्रति है?
आज क्या हम बोगदे में हैं? क्या हमें रोशनी का सिरा दीख रहा है? स्वतंत्र्यचेता समाज ही स्वतंत्रता की रक्षा कर सकता है, खोट और खुरंट से ग्रस्त दासवृत्ति का समाज नहीं। सुश्री अरूंधति राय का ‘कठघरे में लोकतंत्र’ में प्रश्न कौंधता है : क्या लोकतंत्र के बाद जीवन है? और हाँ, तो उस जीवन का स्वरूप क्या होगा? कभी धूमिल ने पूछा था : क्या आजादी तीन थके हुये रंगों का नाम है, जिन्हें एक पहिया ढो रहा है? इन प्रश्नों से इस महादेश के जनगण मन अधिनायक का भविष्य भी जुड़ा हुआ है।
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