आलेख: ईरान बनाम अमेरिका ज़ंग तो होनी ही थी…..
@ – डॉ. सुधीर सक्सेना

ईरान बनाम अमेरिका
ज़ंग तो होनी ही थी…..
• डॉ. सुधीर सक्सेना
मध्यपूर्व में युद्ध के लिये 28 फरवरी, शनिवार अभिशप्त था, अलबत्ता कोई यह सोचे कि गर ईरान घुटने टेक देता तो एकबारगी जंग टल जाती तो वह मुगालते में है। ईरान और इस्राइल के दरम्यां लड़ाई तो बीते साल जून में भी भड़की थी, किंतु उसके शोले देर तलक और दूर तलक दहकने से रह गये थे। अंततः उलटी गिनती का दौर पूरा हुआ और महिनों की तैयारी और वार्ता से ईरानी लीडर खामेनेई को भुलावे में रखने के बाद ट्रंप और बीबी (नेतन्याहू) ने बज़िद ईरान पर धावा बोल दिया।
गोपनीयता के आवरण से छन-छन कर आती सूचनाओं से पता चलता है कि परमाणु कार्यक्रम को लेकर तेहरान और वाशिंगटन के बीच ओमान की मध्यस्थता से वार्ताओं का दौर साल के शुरू से जारी था। बातचीत पहले मस्कट और फिर जेनेवा में हुई। दिलचस्प तौर पर दोनों पक्ष एक मेज के इर्दगिर्द या आमने-सामने नहीं बैठते थे, वरन वे अलग-अलग कमरों में बैठते थे। रायल ओपेरा हाउस कांफ्रेंस सेंटर में दोनों के कमरों के बीच सैंतालिस मीटर लंबा गलियारा था, जिसे अमेरिकी साइबर सुरक्षा विश्लेषक पीटर गिरनस, जो ओमान सल्तनत के विदेश मंत्रालय में राजनयिक सहायक हैं, ने फरवरी मास में 212 बार पार किया। पीटर के फेरों से उनकी बेचैनी, जद्दोजहद और समझौते की ललक को बूझा जा सकता है। बहरहाल, फरवरी में बातचीत अच्छी चली और फैसलाकुन दौर में यूँ पहुंची कि किसी ठोस परिणाम की उम्मीद बँध चली थी। आश्चर्यजनक तौर पर ईरान घुटनों पर झुकता चला गया। वह संवर्द्धित यूरेनियम के शून्य भंडारण पर तैयार हो गया। उसने मौजूदा भंडार को तनु कर उसे अपरिवर्तनीय ईंधन में बदलने पर भी रजामंदी दे दी। यही नहीं, उसने आईएईए-सत्यापन और अमेरिका के संभावित निरीक्षण को भी कूबूल कर लिया। अप्रत्याशित तौर पर उसने परमाणु बम के लिये सामग्री को ‘कभी नहीं, हर्गिज नहीं’ के खाने में रखने पर भी सहमति दे दी। गिरनस ने 14 पंक्तियों की स्प्रेडशीट बनायी। 21 फरवरी तक पूरी स्प्रेडशीट हरी हो चुकी थी। एक भी पीली इबारत नहीं। हरे रंग का अर्थ था कन्फर्म और पीला यानि लंबित।
गौर करें कि हरी से भरी स्प्रेडशीट तैयार होने और अभिशप्त शनिवार के बीच एक हफ्ते का फासला है। तेहरान की ताबड़तोड़ सहमतियों से गिरनस अचरज में थे। तेहरान परमाणु बम के लिए सामग्री का प्रयास नहीं करेगा’ के खाने में वर्गीकृत करना चाहता था, किंतु ऊहापोह के बाद वह ‘कभी नहीं, हार्गिज नहीं’ पर रजामंद हो गया। स्पष्ट है कि ईरान वार्ता की कामयाबी और जंग से बचाव चाहता था। मंगलवार यानि 24 फरवरी को रात्रि 2:14 बजे दस्तावेज को मस्कट में अंतिम रूप मिला। 14 पन्नों का दस्तावेज टंकित हुआ। स्लाइड तैयार हुईं। हस्ताक्षर समारोह के लिये जेनेवा के Palais des nations में चार सौ लोगों की क्षमता के सभाकक्ष क्रमांक 20 को आरक्षित किया गया। दस्तखत के लिये ईरानी पक्ष के पसंदीदा माँट ब्लॉक montblanc meisterstiic पेन खरीदे गये। एक नग की कीमत 630 डॉलर। पेनों पर कुल खर्च 630 गुणा बारह। 27 फरवरी को घड़ी की सुइयां घूमीं। अमेरिकी विदेशमंत्री ने अमेरिकी दूतों – स्टीव विटकोफ और जैरेड कुश्नर की सराहना की। दोपहर दो बजे उपराष्ट्रपति वेंस ने बैठक ली और कहा – ‘उत्साहजनक’ अमेरिकी उपराष्ट्रपति के सहायक ने आईपैड पर नोट्स लिये। इसी रोज शाम 4 बजे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पत्रकारों से दो टूक कहा- ‘प्रगति की गति से संतुष्ट नहीं।’
दस्तावेज धरा रह गया। माँट ब्लैंक इस्तेमाल नहीं हुये। ईरानी बिरादरी समझ ही नहीं पाई कि माजरा क्या है? संयुक्त अरब अमीरात और इस्राइल के मुखिया पर्दे के पीछे कलें घुमा रहे थे। खामेनेई गफलत में थे। वे तब भी गफलत में थे, जब वह कमांडर पकपोर और रक्षामंत्री अली शमखान से मिल रहे थे। ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदी नेजाद का कहना है कि ईरान में मौसाद के गुप्तचरों को पकड़ने के लिये जिस यूनिट का गठन किया गया था, उसका मुखिया मोसाद का एजेंट था और यूनिट में मोसाद के 20 एजेंट थे। इन्हीं डबल एजेंटों ने खामेनेई की सटीक लोकेशन अपने आकाओं को भेजी और अचूक निशानेबाजी ने खामेनेई का काम तमाम कर दिया। स्पष्ट है कि वार्ता तो ‘स्वांग’ था, ईरान को भरमाने का खेल। अमेरिका-इस्राइल के ईरान पर मुसलसल हमले जारी रहेंगे। ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के अमेरिका-इस्राइल के पक्ष में लामबंद होना तस्दीक करता है कि अमेरिका और योरोप के लिये तमाम देशों की हैसियत शिकार या उपनिवेश से ज्यादा नहीं है।
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