इस्रायल : पौ बारह के फेर में ‘बीबी’
- डॉ. सुधीर सक्सेना

इस्रायल : पौ बारह के फेर में ‘बीबी’
• डॉ. सुधीर सक्सेना
ग्रह-योग अनुकूल हों या नहीं, लेकिन इस्रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक बार फिर से जीत के लिये कोई कोर कसर नहीं उठा रखी है। बीबी के नाम से चर्चित और लोकप्रिय नेतन्याहू दरअस्ल उस शातिर तीरंदाज की तरह है, जिसकी पैनी निगाह पत्तों में दुबकी चिड़िया की आँख से कभी ओझल नहीं हुई। यूँ तो मतदान 27 अक्टूबर को होगा, अलबत्ता बीबी चुनावी मोड में बहुत पहले से हैं। उनकी चिड़िया की आँख पर नजर का ही फेर है कि सात अक्टूबर की विपदा का उन्होंने भरपूर सियासी दोहन किया। कतर के विदेशमंत्री के बयान के बाद स्पष्ट हो गया है कि हमास ने बंधक प्रकरण के अगले ही दिन समाधान का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन बीबी ने सैकड़ों इस्रायलियों की जान खतरे में डालकर उसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया। इस संवेदनशील मुद्दे से उन्होंने तिहरा खेल खेला। एक ओर तो उन्होंने वाशिंगटन से रिश्तों को ‘चार्ज’ किया। दूसरे इसे गाजा में बर्बर नरसंहार (जीनोसाइड) के लिये बहाना बनाया। और तीसरे इससे उन्होंने देश के भीतर यहूदी कौम को इस तरह अपने पक्ष में ध्रुवीकृत और गोलबंद किया कि इस्रायलियों को वह देश की सुरक्षा और अस्तित्व के लिये अपरिहार्य लगने लगें। इसमें शक नहीं कि बीबी ने सात अक्टूबर, सन 23 के सनसनीखेज मुद्दे का भरपूर दोहन किया। उन्होंने विपक्ष की खूब लानत मलामत की और अपनी गलती कुबूल करने के बजाय सारा दोष सुरक्षा एजेंसियों पर मढ़ दिया। गाज़ा को लेकर उन्होंने विश्व जनमत को धता बताते हुये अड़ियल रुख अपनाया और गाजा को तबाह कर दिया। विश्वव्यापी आलोचना और नुक्ताचीं का उन पर कोई असर नहीं हुआ। यही बीबी अब फ्लाई दुबई काण्ड के जरिये चुनावी लाभ उठाने की फिराक में हैं। एक ओर तो संकटमोचक यात्री पलंबर यानिव हायून के साथ उनकी तस्वीरें वाइरल हो रही हैं, दूसरे भारतीय जांबाज स्मित मच्छार की प्रशंसा और श्रेय के जरिये वह अपने चुनावी कैंपेन में नया रंग भरना चाहते हैं। इसमें शक नहीं कि भारत से इस्रायल के रिश्ते बीते बरसों में अतिशय प्रगाढ़ हुये हैं और नेतन्याहू और मोदी विश्व-परिदृश्य में दोस्त बनकर उभरे हैं। मोदी ने 25-26 फरवरी, 2026 को इस्रायल की राजकीय यात्रा की थी। इसके ऐन दो दिन बाद अमेरिका-इस्रायल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य आक्रमण कर दिया था। इसके बाद मार्च 26 में अयोध्या में जगद्गुरु
परमहंस आचार्य ने बीबी की जीत और नेतृत्व की मजबूती के लिए विशेष पूजा-पाठ और हवन किया था। इसी क्रम में यूपी में संभल में भी सनातनियों ने बीबी के लिए हवन-पूजन किया था। इससे जाहिर है कि भारत में जहां दक्षिणपंथी बीबी की जीत चाहते हैं, वहीं वामपंथी खेमा और मानवाधिकार-कार्यकर्ताओं की मंशा है कि बीबी बुरी तरह हारें। जहां तक ट्रंप का प्रश्न है, ‘टाइम’ पत्रिका को प्रदत्त इंटरव्यू में ट्रंप का यह कहना कि मैं अब तेल अवीव की राजनीति में शामिल नहीं हूँ, नेतन्याहू और उनके समर्थकों के लिए निराशा का सबब है।
एक करोड़ से अधिक के इस्रायल में रजिस्टर्ड मतदाताओं की संख्या 67 लाख 88 हजार 804 है। ड्यूरी पर तैनात 1.70 लाख सैनिक पोल-परिधि से बाहर हैं। यह एक बड़ी तादाद है, जो हारजीत के आकलन का पैमाना बन सकती है। इस्रायली चुनाव मतपत्रों से होते हैं। ईवीएम का नहीं होना बीबी के लिए घाटे का फैक्टर है। चुनावी वेला में बीबी के माथे पर लकीरों का बड़ा कारण कुछ और संदर्भ भी हैं। इस बार 66,000 से ज्यादा नये ओलिम (अप्रवासी) वोट डालेंगे। अरब समुदाय से जुड़े 1.18 लाख वोटर पहली बार मताधिकार का उपयोग करेंगे। इस चुनाव में फर्स्ट -टाइमर वोटरों पर सबकी नजर है। पहली बार वाटरों के समूह में करीब छह लोग ऐसे हैं, जिनकी उम्र 18 से 22 साल के बीच है। यूं तो 38 पार्टियां पंजीकृत हैं, लेकिन मुकाबले में नजर आती पार्टियों की तादाद तकरीबन एक दर्जन है। लीकुड पार्टी बीबी के नेतृत्व का सबसे बड़ा दक्षिणपंथी दल है। सत्तारूढ़ गठबंधन में अन्य दक्षिणपंथी, अति राष्ट्रवादी और धार्मिक दल शामिल हैं। प्रतिपक्ष में यार लापिड के नेतृत्व की यश अतीद जैसी मध्यमार्गी और बीबी- विरोधी यहूदी पार्टियां हैं। एक तीसरा गुट पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट द्वारा तैयार किया गया है। ‘यशार’ दोनों मुख्य गुटों को अच्छी टक्कर दे रहा है। राआम और जॉइंट लिस्ट जैसी अरब- पार्टियां भी मुकाबले में हैं। ये पार्टियां गठबंधन के समीकरणों के मान से मायने रखती है।
इस्रायल के चुनावों में चुनाव पूर्व पोलों का खूब चलन है। सैनिकों को पोल में शामिल नहीं किया जाता, फलतः उनके अनुमान गड़बड़ा जाते हैं और फिर यह धारणा बलवती है कि ये प्रायोजित होते हैं और इन्हें प्रभावित किया जा सकता है। क्नेसेट (संसद) की कुल सदस्यता 120 है। यानि बहुमत के लिए 61 का आंकड़ा चाहिये। गत माह चैनेल 12 के पोल ने दोनों मुख्य गुटों को 52-52 सीटें दीं। उधर चैनेल 14 ने बीबी के गुट को मजबूत बढ़त दिखाई। चैनल ने उसे 63-64 सीटें हासिल करते बताया। लोग मानते हैं कि चैनेल आबादी के बड़े हिस्से को पोल-सर्वे से दूर रखते हैं और समावेशी नहीं होते।
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