फ्रांस समेत कई योरोपीय देशों में हड़कंप

  • डॉ. सुधीर सक्सेना

फ्रांस समेत कई योरोपीय देशों में हड़कंप
• डॉ. सुधीर सक्सेना
फ्रांस समेत योरोप के अनेक देशों में खतरे की घंटी लगातार घनघना रही है। फ्रांस जल रहा है। क्या पेरिस, क्या मार्सेल्स, क्या बोर्दो, लीले या नीस या ल्यों सर्वत्र अशांति और अराजकता व्याप्त है। छात्रों से शुरू आंदोलन ने सरकारी नीतियों, बदतर सार्वजनिक सेवाओं और रोजमर्रा की दुश्वारियों से त्रस्त नागरिकों को अपनी चपेट में ले लिया है। यह आंदोलन अब फ्रांस तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने इर्दगिर्द सर्बिया, अल्बानिया, बेल्जियम, पुर्तगाल, इटली और स्पेन जैसे देशों में पाँव पसार लिये हैं और वहां सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट तेज हो गयी है।
फ्रांस में स्कूलों में पढ़ाई और सुविधाओं की मांग को लेकर छात्रों के आंदोलन को छिड़े तीन हफ्ते की अवधि बीत गयी, लेकिन उसका थमना तो दूर रहा, वह लगातार व्यापक और उग्र रूप लेता जा रहा है। राजधानी पेरिस में शनिवार को पांच लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतर आये और लूटमार, तोड़फोड़ और आगजनी का बाजार गर्म रहा। रविवार को साढ़े तीन सौ से अधिक लोग गिरफ्तार किये गये। लिमो जेस में 19वीं सदी का सिटी हाल फूँक दिया गया और पेरिस व अन्यत्र अनेक रेस्त्रां तोड़फोड़ का शिकार बने। सरकार को अनेक जगह मियादी कर्फ्यू लगाना पड़ा। पुलिस ने अश्रुगैस छोड़ी और बड़े पैमाने पर धरपकड़ की।
फ्रांस के पड़ोसी देश अल्बानिया में उग्र प्रदर्शनकारियों ने सत्ता से मिलीभगत के चलते सुप्रीम कोर्ट की इमारत में आग लगा दी। तिराना में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन लगातार जारी रहकर सातवें दिन में प्रवेश कर गया। वहां सत्ता-विरोधी फ्लेमिंगो आंदोलनकारी समाजवादी प्रधानमंत्री एदी रामा के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। उधर स्पेन में राजधानी मैड्रिड एवं अन्यत्र प्राथमिक व माध्यमिक शालाओं के शिक्षक पगार को लेकर हड़ताल पर चले गये। बार्सीलोना में प्रदर्शन हुए और प्यूर्ता देल सोल को प्रदर्शनकारियों ने तारपोलिन-तंबुओं से घेर दिया। असंतोष की लहर से इटली भी नहीं बच सका। वहां बोलोना और तूरिन में आंदोलन भड़क उठा। हिंसक प्रदर्शन हुये। अक्टूबर 17 मूवमेंट के तहत अब प्रत्येक शनिवार अपरान्ह तीन बजे देशभर में प्रदर्शन का ऐलान किया गया है। जाहिर है कि इससे जार्जिया मेलोनी के लिये परेशानियां बढ़ेंगी। इन सारे प्रदर्शनों और आंदोलनों के पीछे बदतर शिक्षा प्रणाली, कमरतोड़ मंहगाई, ऊर्जा संकट और अंधाधुंध आव्रजन का हाथ है। रूस-उक्राइना और ईरान-अमेरिकी जंग तथा शरणार्थियों की बाढ़ से स्थितियां बिगड़ी हैं। फ्रांस में मैक्रों और स्पेन में सांचेज की आव्रजन नीति जेरे-बहस से है और कसौटी पर भी। आगामी चुनाव में वह मुख्य मुद्दा होगी।
फ्रांस को योरोपीय राष्ट्रों में प्रतिरोध के पर्याय राष्ट्र के तौर पर देखा जाता है और उसने यह पहचान सैकड़ों वर्षों की परंपरा से अर्जित की है। ताजा आंदोलन और तज्जन्य अशांति से मध्यमार्गी मैक्रों कमजोर हुये हैं और इसका लाभ धुर वाम प्रतिद्वंद्वी ज्यां लूस मालेनकों को मिल सकता है, जिन्होंने प्रदर्शन का समर्थन किया, हिंसा की निंदा नहीं की और सरकार को आड़े हाथों लिया। राजनीतिक समीक्षकों की राय में घटनाक्रम से धुर दक्षिणपंथी मारीन ली पें लाभ उठा सकते हैं। मैक्रों के पूर्व पीएम एदुआर्दो फिलिपे, जो आगामी चुनाव में मध्य-दक्षिण धुरी के प्रत्याशी होंगे, मानते हैं कि इस आंदोलन का सिरा सीधी सड़क नहीं, अपितु छह-लेन राजमार्ग पर खुलता है। इसमें शक नहीं कि फ्रांस और पड़ोसी देशों में जीवन यापन कठिन होता जा रहा है। आवास और ऊर्जा महंगी हैं। स्कून भवन जर्जर और शिक्षक अपर्याप्त। बेरोजगारी और भ्रष्टाचार चरम पर है। फ्रेंच प्रधानमंत्री सेबस्टियन लेकोर्नू कहते हैं कि आंदोलन वाम प्रायोजित है और सरकार चोरों, लुटेरों और ठगों के आगे घुटने नहीं टेक सकती। यह अकारण नहीं है कि सर्बिया में विश्वविद्यालयीन छात्र भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनरत हैं। वहां पापुलर बल्कान नेता अलेक्सान्द्र वूसिस का विरोध हो रहा है। वहां 27 अक्टूबर को इलेक्शन हैं। अल्बानिया में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद जारेड कुश्नर पर सरकार मेहरबान है। सांचेज और मेलोनी से ट्रंप के रिश्ते जगजाहिर हैं। ट्रंप अनेक योरोपीय देशों के संकट के लिए इस्लामी शरणार्थियों को दोषी मानते हैं। ट्रंप का कहना है कि फ्रांस को मुस्लिम आव्रजन के लिए अपनी सीमाएं बंद कर देनी चाहिए।
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आलेख : डॉ. सुधीर सक्सेना
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