सर्बिया : छोटा देश, बड़ा संदेश @ डॉ. सुधीर सक्सेना

सर्बिया : छोटा देश, बड़ा संदेश
• डॉ. सुधीर सक्सेना
देश छोटा है; चौतरफा अन्य देशों के भूखंडों से घिरा हुआ यानि भूआवेष्टित। आबादी तकरीबन पैंसठ लाख। इतिहास के थपेड़ों के बीच मानचित्र में उभरे इस योरोपीय राष्ट्र में युवकों ने कमाल कर दिखाया। चौदह सालों से जमे-जमाये कठोर और सुदृढ़ निजाम को उखाड़ फेंकना आसान न था, लेकिन छात्रों ने अपनी एकजुटता, संघर्षशीलता और आंदोलनधर्मिता से संसदीय चुनावों में सर्वथा नयी इबारतें लिखीं। फलत: स्टुडेंट्स-लिस्ट के उम्मीदवारों के लिये संसद में प्रवेश और सरकार के गठन के द्वार खुल गये। छात्रों की चुनौती अपनी जगह थी, लेकिन राजनीतिक पंडितों को यह यकीन न था कि छात्र समूहों द्वारा चुने हुये समाज के विभिन्न तबकों-अध्यापकों, डॉक्टरों, श्रमिकों और इंजीनियरों आदि के गैर पेशेवर उम्मीदवार वर्कर्स पार्टी के पेशेवर प्रत्याशियों को धूल चटा देंगे।
मगर ऐसा हुआ और डंके की चोट पर हुआ। सर्बिया में क्रांति बंदूक की नली से नहीं, वरन मतपेटियों से निकली। प्रतिरोध की जीत हुई और सत्ता की हार। यह कू-दे-ता नहीं था। निरंकुश, दमनकारी और भ्रष्ट सत्ता हारी और शांतिप्रिय, परिवर्तनकामी और अहिंसक सत्याग्रही जीते। यह भारत से हजारों मील दूर एक छोटे से योरोपीय राष्ट्र की परिघटना है। देश छोटा है, किंतु संदेश बड़ा 56 वर्षीय राष्ट्रपति अलेक्सांद्र बुचिश के हाथों से अब सत्ता फिसल चुकी है। जनादेश ने छह फुट पांच इंच लंबे चश्मीश बुचिश का कद छांट दिया है। अब वह निवर्तमान या भूतपूर्व राष्ट्राध्यक्ष हैं। तय है कि उनकी करतूतों की जांच होगी, उन पर मुकदमा चलेगा और उन्हें और उनके सहयोगियों को सजा भी मिलेगी। जनादेश इतना स्पष्ट था कि उन्होंने सारे चुनाव परिणाम घोषित होने से पेशगी ही अपनी हार कूबूल कर ली। 250 सांसदों के सदन के नतीजों के ऐलान के अधबीच में ही बुचिश ने कहा -“जाहिर है कि हमने यह चुनाव गँवा दिया है।”
सर्बिया के साथ जातीय संघर्ष, नरसंहार और विनाश की दारूण-गाथा जुड़ी हुई है। यूगोस्लाविया के के विघटन के बाद बाल्कन क्षेत्र में विपदाओं की बाढ़ आ गयी। ऐसे में सन 2006 में सर्बिया स्वतंत्र गणतंत्र के रूप में मानचित्र में उभरा और बीस सालों के गणतांत्रिक इतिहास में चौदह साल सत्ता की बागडोर बुचिश के हाथों में रही। दरअस्ल, बुचिश एक महत्वाकांक्षी, धूर्त और अनुदार राजनेता हैं। उन्होंने 23 वर्ष की वय में राजनीति में कदम धरे और अति उग्रवादी सर्बियन रेडिकल पार्टी ज्वाइन की। सन 2008 में उन्होंने तोमिस्लाव निकोलस के साथ सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी की स्थापना की। सन 2012 से 2023 तक वह इसके अध्यक्ष रहे। सर्बियन रेडिकल पार्टी के सांसद की हैसियत से कानून में स्नातक बुचिश सन 1998 में सूचना मंत्री बने तो पूत के पांव पालने में दिख गये। वह 2000 में स्लोबोदान मिलोशेविक के पतन तक इस पद पर रहे और उन्होंने पत्रकारों पर कई दमनात्मक कानून थोपे और विदेशी टीवी चैनलों पर पाबंदी लगा दी। उनका दमन और उत्पीड़न का निरंकुश रवैया मुसलसल जारी रहा। सन 2012 में वह उपप्रधानमंत्री बने और 2014 में पीएम। सन 2017 और फिर 2022 में वह राष्ट्रपति चुने गये। इसी साल पीएम बनने के मकसद से उन्होंने इस्तीफा देकर चुनाव का दाँव खेला और स्टूडेंट लिस्ट के हाथों मुंह की खाई। बुचिश के पतन का कारण बनी एक नवंबर 2024 को नोवी साद रेलवे स्टेशन की दुर्घटना। कैनोपी गिरने से 16 लोगों की मौत के हादसे ने छात्रों को भड़का दिया। भ्रष्टाचार, नागरिक अधिकारों के हनन और संस्थानों के राजनीतिकरण के मुद्दों से आंदोलन को विस्तार और बल मिला। नवकुबेर मिरोस्लाव मिस्कोविच की पुत्र मार्को के साथ भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तारी, रिहाई और सरकार द्वारा हर्जाना देने के प्रसंग को अवाम ने स्वांग माना। बुचिश की घृणित मानसिकता का परिचय सेब्रेनिका कत्लेआम के बाद तब मिला, जब उन्होंने कहा – किल वन सर्ब, वी विल किल हंड्रेड मुस्लिम्स।” जाहिर है कि वह इस्लामोफोबिया से ग्रस्त हैं और उनके भीतर एक कातिल विद्यमान है। दमन-उत्पीड़न के चलते उनके राजकाल में सर्बिया में भारी विदेशी निवेश, जीडीपी में वृद्धि और सफल विदेश नीति के दावों का मतदाताओं पर कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने स्टूडेंट लिस्ट को भरपूर समर्थन दिया। यूं तो छात्रों का नेतृत्व किसी एक हाथ में नहीं था, अलबत्ता नोवी साद में मेडीसिन के प्रोफेसर एलिजा स्रदानोविच ने उन्हें बखूबी गाइड किया। बुचिश ने आंदोलनकारी छात्रों को ‘ब्लाकेडर्स की संज्ञा दी, लेकिन नागरिकों के असंतोष और रोष की वाणी बनकर उभरे छात्र चुनाव में सर्ब अवाम की आंखों के तारे बनकर उभरे। छात्रों के नारे या सर्बिया, या माफिया, ज्ञान शक्ति है और सर्बिया हमारे साथ बढ़ रहा है, काम कर गये। अवाम ने निजाम बदलने के ध्वजवाहकों का साथ दिया। नतीजा सामने है। बेल्ग्रेड और सर्वत्र अपूर्व जश्न का माहौल। इतिहास से सबक नहीं लेने वाले बुचिश धराशायी हो गये। देखना दिलचस्प होगा कि संकटों के दौर से गुर रहे दुनिया के देश सर्बिया के सबक से क्या सबक लेते हैं?
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