नवी’ को नोबेल @ डॉ. सुधीर सक्सेना

‘नवी’ को नोबेल
• डॉ. सुधीर सक्सेना
नाम: नवनीतम ‘नवी’ पिल्लई। उम्र : 80 वर्ष। शिक्षा : एलएलएम, कानून में पीएचडी। पहचान : न्यायविद और मानव अधिकार कार्यकर्ता। सरोकार: रंगभेद, लैंगिक विषमता, अन्याय और जातीय नरसंहार के विरूद्ध संघर्ष। संकल्प : वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का खात्मा। उपलब्धि : रंगभेद, नस्लभेद, लैंगिक अत्याचारों और जातीय नरसंहार के खिलाफ जद्दोजहद के लिये सन 2026 का शांति के लिये नोबेल पुरस्कार।
यह है नोबेले-विजेता नवी पिल्लई का संक्षिप्त परिचय, अलबत्ता यह उनके जीवट, संघर्ष, दुश्वारियों से भरी जीवन-यात्रा, कष्टों और अदम्य साहस को समुचित व्यक्त नहीं करता। विभिन्न संकायों के लिये नोबेल की घोषणा नियमित वार्षिक प्रसंग है, किंतु इस बार शांति के लिये नोबेल हेतु नवी का चयन सर्वथा नये मानक रचता है। यह अकारण नहीं है कि नवी के नाम की घोषणा होते ही महाबली अमेरिका के आत्ममुग्ध राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खीझ सामने आई है और खीझ की रौ में उन्होंने और इस्रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (बीबी) ने नोबेल कमेटी और नार्वे को आड़े हाथों लिया है। ऐसा करते हुये ट्रंप और बीबी भूल गयें कि नोबेल के लिए चयन में नार्वे सरकार की कोई भूमिका नहीं है। यही नहीं, नेता द्वय ने अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत की मुश्कें कसने की भी बात कह डाली। गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय अदालत ने गाज़ा में नरसंहार के लिये बीबी को युद्ध अपराधी घोषित कर उनके नाम वारंट जारी कर रखा है। तय है कि खुन्नस से भरे ट्रंप और उनके पिछलग्गू बीबी को अंतरराष्ट्रीय अदालत की जज को नोबेल दिया जाना रास नहीं आया है। यह भी गौरतलब है कि ट्रंप शांति के लिये नोबेल के प्रबंल दावेदार हैं और वह गत वर्ष भी वेनेजुएला में नेता प्रतिपक्ष सुश्री मारिया कोरिना मचाडो को नोबेल मिलने से क्षोभ ओर रोष से भर उठे थे। सुश्री मचाडो ने बाद में ट्रंप को नोबेल राशि देने की नाटकीय घोषणा भी की थी। इस पृष्ठभूमि में नवी के चयन से नोबेल की साखा और प्रतिष्ठा में निश्चित ही इजाफा हुआ है।
नवी पिल्लई तमिल मूल की भारतवंशी है। उनके पुरखे सन 1890 के दशक में गन्ने के खेतों और चाय तथा रबड़ के वागानों में बतौर गिरमिटिया मजदूर काम करने दक्षिण अफ्रीका गये थे। शुगर मिल में हुई दुर्घटना में नवी के दादा ने अपने दोनों हाथ गंवा दिये थे। पिता बस ड्राइवर थे और परिवार के भरणपोषण के लिए मच्छी भी मारते थे। मां संथम्मा नायडू और पिता नारायण सामी की इस संतान का जन्म 23 सितंबर, सन 1941 को नटाल प्रांत में डर्बन में चेयरवुड में हुआ। घर अभावों का पर्याय था। फीस और किताब-कॉपियों के लिए पैसे जुटाना कठिन था। संथम्मा फेंकी गयी कॉपियों के कोरे पन्नों को फाड़कर उन्हें स्टैपल कर बेटी के लिए कॉपी बनातीं थीं। बच्ची मेधावी थी। डर्बन के भारतवंशियों ने चंदा कर बच्ची की मदद की, जिससे वह पढ़ सकी। पढ़ाई में नवी भारतीयों के लिए नजीर थी। सन 1963 में उसने बीए किया और 1965 में एलएलबी। रंगभेद के खिलाफ संघर्ष का सूत्रपात भी तभी हुआ। वह अटार्नी बनी। पढ़ाई की ललक शेष थी, फलत: 1981 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से एलएलएम किया और 1988 में थीसिस पूरी की। इस तरह नटाल की पहली अश्वेत वकील, पहली अटार्नी बनी और डॉक्टरेट ऑफ जुडीशियल साइंस प्राप्त पहली अश्वेत और पहली भारतवंशी होने का गौरव अर्जित किया। इस बीच सन 1962 में नवी की मुलाकात एक नृत्य समारोह में परनजोथी गैबी एंथोनी से हुई। सन 65 में दोनों का विवाह हुआ, किंतु यह पता चलने पर कि वह माँ नहीं बन सकेंगी, उन्होंने ईश्वरी और कामिनी नायक दो कन्याओं को गोद ले लिया। अश्वेत गांधी नेल्सन मंडेल के संघर्ष में पिल्लई दंपत्ति सहभागी बने। नवी और गैबी का दांपत्य जीवन करीब तीन दहाई चला। सन 90 के दशक में गैबी को हिरासत में लिया गया। इस बीच गैबी मद्यप हो चले थे। इसी दोर में उनकी मौत हो गयी। यह 1995 का साल था कि नवी हाईकोर्ट के लिए मनोनीत हुईं। सन 1995 में ही मंडेला और न्याय मंत्री दुल्लाह उमर ने उन्हें यूएनओ में नामांकित किया और वह सुरक्षा परिषद के रवान्डा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल ट्रिब्यूनल में नामजद हुईं। इसी क्रम में वह म्यांमार में नरसंहार के लिए गठित आपराधिक न्यायालय की तदर्थ जज भी रहीं। कोर्ट कचहरी से नवी का पहला परिचय पांच वर्ष की अल्पायु में तब हुआ था, जब उनकी मां द्वारा उन्हें पिता को देने के लिए प्रदत्त पांच पौंड किसी ने चुरा लिये थे। नवी बहैसियत गवाह कोर्ट में प्रस्तुत हुईं। चोर को सजा तो हुई, लेकिन पांच पौंड की रकम नहीं मिली। बहरहाल, अपने साहस, संकल्प, निर्भीक आचरण और बेबाक फैसलों से वह न्यायपालिका में शिखर तक पहुंचीं और उन्होंने पद की गरिमा में अभिवृद्धि की। रंगभेद और जीनोसाइड के खिलाफ संघर्ष की उनकी टेक आज भी कायम है। सन 1995-2003 में वह अंतरराष्ट्रीय पंचाट की जज और चार साल प्रेसीडेंट रहीं। फिर सन 2003-12 में वह अंतररार्ष्टीय क्रिमिनल कोर्ट की जज रहीं, साथ ही 2008-14 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त भी। उन्होंने फलस्तीन में यूएनओ के स्वतंत्र जांच आयोग की कमान संभाली। अपनी भूमिका के निष्पक्ष और साहसिक निर्वाह में वह अमेरिकी लॉबी की आंखों की किरकिरी बनकर उभरीं और गाजा में जीनोसाइड पर उनकी कठोर भाव-भंगिमा से ट्रंप और नेतन्याहू की भृकुटि में बल पड़ गये।
नवी को जब नोबेल से नवाजने का ऐलान हुआ, वह जर्मनी में न्यूरेमबर्ग में एक कांफ्रेंस में थी, जहां करीब अस्सी साल पहले, क्रूर नाजी नेताओं पर ऐतिहासिक मुकदमे ने आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कानून की नींव रखी थी। जब उनके सहयोगियों ने तालियां बजाई तो उन्होंने कहा “क्या यह सच है? मुझे लगा कि यह कोई मजाक होगा।” उन्होंने मजे लेते हुए कहा – ‘यदि आप थोड़ी देर और तालियां बजायेंगे तो मैं यह पुरस्कार ट्रंप के साथ बाँट सकती हूँ।” बहरहाल, नौ अक्टूबर को नोबेल समिति ने अपने बयान में कहा कि शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के प्रयास के लिए 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार नवनीतम ‘नवी’ पिल्लई को देने का निर्णय लिया गया है। दक्षिण अफ्रीका के डरबन में रंगभेद के दौर में भारतीय तमिल मूल के परिवार में जनमी पिल्लई वकील और कानून के क्षेत्र में अग्रणी बनीं, जिन्होंने गहरे संरचनात्मक भेदभाव, अलगाव और बहिष्कार का सामना किया। यकीनन यह प्रशस्ति भारतीयों के लिए गर्व का विषय है। इसमें अश्वेत गांधी मंडेला और उनके मूल्यों का भी उल्लेख है। नवी भारत आ चुकी है और उन्होंने मानवाधिकारों के उल्लंघन और लैंगिक अत्याचारों पर चिंता व्यक्त की थी। उनका सम्मान उम्मीद की किरण है और अराजक और उन्माद ग्रस्त समय में उम्मीद की नयी लौ बालता है। उनका चयन शेखीखोर ट्रंप के लिए सबक है और निरंकुश साम्राज्यवादियों के लिए चुनौती। वह कहती हैं कि मेरा काम तब तक खत्म नहीं होगा, जब तक विश्व में मानवाधिकारों का उल्लंघन जारी है।
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