कही-सुनी @ रवि भोई

कही-सुनी (13 SEPT-26) : रवि भोई
संवैधानिक संस्थाओं के लिए मुखिया की तलाश
कहते हैं सरकार तीन संवैधानिक संस्थाओं के लिए मुखिया की तलाश कर रही है। अब सरकार कब तक मुखिया तलाश कर पाती है और किसको ताज मिलता है, इसके लिए अभी इंतजार करना होगा। छत्तीसगढ़ लोकसेवा आयोग में अध्यक्ष का पद खाली हो गया है। कहा जा रहा है किसी रिटायर्ड आईएएस के लिए एक दरवाजा खुल गया है। आयोग की अध्यक्ष रीता शांडिल्य आठ सितंबर को रिटायर हो गईं। 62 साल की उम्र होने के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा। राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष का पद काफी दिनों से रिक्त है। कांग्रेस सरकार में नियुक्त राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष सरजियस मिंज साल 2024 में रिपोर्ट सौंप चुके हैं। बताते हैं रिपोर्ट सौंपने के साथ ही उनका कार्यकाल समाप्त हो गया। विष्णुदेव साय की सरकार ने श्रीनिवास राव मद्दी को राज्य वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया था। श्रीनिवास राव मद्दी ने पदभार संभाला ही नहीं। सरकार ने बाद में उन्हें छत्तीसगढ़ राज्य बेवरेज कार्पोरेशन का अध्यक्ष बना दिया। श्रीनिवास राव मद्दी के इंकार के बाद सरकार ने राज्य वित्त आयोग की सुध नहीं ली। ये दोनों संस्थाएं संवैधानिक प्रावधानों के तहत गठित की गई हैं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही बनाए गए राज्य निर्वाचन आयोग के आयुक्त अजय सिंह भी 66 साल की उम्र पार कर चुके हैं। जानकारों का कहना है कि नियमानुसार राज्य निर्वाचन आयुक्त की अधिकतम आयु सीमा 66 साल है। अजय सिंह की जन्मतिथि 12 फ़रवरी 1960 है, ऐसे में वे फरवरी में ही निर्धारित आयु सीमा को पार कर चुके हैं। पर जब तक नए राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति नहीं हो जाती, तब तक पद पर बने रहेंगे।
रील में मशगूल कलेक्टर साहिबान
चर्चा है कि छत्तीसगढ़ के कई जिलों के कलेक्टर साहब पदभार ग्रहण करने के बाद रील में ही मशगूल हैं। जिले में कुछ काम हुआ कि नहीं कि सोशल मीडिया में फोटो और रील बनाकर डालना उनकी आदत में शुमार हो गया है। कलेक्टर महोदयों में यह ट्रेंड सरकार के भीतर ही कुछ लोगों को नहीं भा रहा और कानाफूसी हो रही है। कहते हैं छत्तीसगढ़ के फील्ड अफसरों की आत्म प्रशंसा की गूंज दिल्ली में भी सुनाई देने लगी है और शीर्ष स्तर पर मंथन होने लगा है। प्रशासनिक अफसरों के लिए आत्म प्रशंसा वर्जित माना जाता है। जिलों में या फील्ड में काम का श्रेय सरकार को जाता है, भले ही कलेक्टर या कोई अन्य अफसर करे। एक जमाना था जब प्रशासनिक अफसर किसी भी तरह की पब्लिसिटी या बयान से बचते थे। मंत्री या जनप्रतिनिधि ही आगे आते थे। इन दिनों तो कुछ काम हुआ कि सोशल मीडिया में प्रशासनिक अफसर का फोटो आ जाता है। चर्चा है कि कलेक्टरों का फील्ड दौरा भी न के बराबर हो गया है। सुनने में आ रहा है कि 10 बजे आनलाइन हाजिरी के चक्कर में कलेक्टर फील्ड की जगह दफ्तर की तरफ पहले दौड़ते हैं। लोग कह रहे हैं कि इसके चलते कलेक्टर न स्कूलों की समस्या देख पा रहे हैं और न ही सड़क, बिजली और पानी समस्या को सुलझा पा रहे हैं।
मंत्री जी की खरी-खरी
कहते हैं कि मैदानी इलाके के एक विधायक महोदय अपने एक रिश्तेदार का तबादला कराने एक मंत्री जी के पास पहुंचे। मंत्री जी ने विधायक महोदय को ट्रांसफर के लिए डिस्काउंट रेट बता दिया। विधायक जी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि अपने परिचित के ट्रांसफर के लिए कीमत चुकानी पड़ेगी। अब मंत्री जी की बात सुनकर विधायक जी ने माथा पकड़ लिया और वे अब घूम-घूमकर अपना दुखड़ा रो रहे हैं। मंत्री जी के विभाग में धड़ल्ले से ट्रांसफर हो रहे हैं। ऊपर से नीचे तक ट्रांसफर हो रहे हैं। मंत्री जी जिस संस्था की पैदाईस हैं, उस संस्था के लोगों को भी नहीं छोड़ते हैं। हल्ला है कि मंत्री जी के विभाग में जिला स्तर के शीर्ष पद पर ट्रांसफर का रेट तीस लाख तक है। नीचे के पद के लिए बोली तीन लाख से शुरू होती है। सरकार ने तबादले पर प्रतिबंध लगा रखा है, पर समन्वय की चाबी से ट्रांसफर- पोस्टिंग का दरवाजा खुल जाता है।
मंत्री जी का बिल्डरों से मोह
राज्य के एक मंत्री महोदय का बिल्डरों से प्रेम चर्चा का विषय है। बताते हैं नवा रायपुर के एक प्रोजेक्ट में मंत्री जी ऊर्जा नगरी के एक बड़े बिल्डर के अघोषित पार्टनर बन गए हैं। हल्ला है कि बिल्डर को मंत्री जी की कृपा से नवा रायपुर में प्रोजेक्ट के लिए बड़ा एरिया मिला है। इनके अलावा और भी कई बिल्डरों से मंत्री जी का प्यार और दुलार की हवा बाजार में चल रही है। कहते हैं कि मंत्री जी कई सरकारी जमीन प्राइवेट बिल्डरों को देने के पक्षधर हैं। अब देखते हैं मंत्री जी अपने मकसद में कितने कामयाब हो पाते हैं।कद्दावर मंत्री नई सीट की तलाश मेंहल्ला है कि छत्तीसगढ़ के कुछ कद्दावर मंत्री अपनी वर्तमान विधानसभा सीट को छोड़कर नई सीट की तलाश में लग गए हैं। इन मंत्रियों को अभी से भय सताने लगा है कि 2028 का चुनाव अपनी वर्तमान सीट से कहीं हार न जाएं। सुनने में आ रहा है कि एक मंत्री जी अपनी सीट छोड़कर दूसरे जिले की सीट पर निगाहें जमाना शुरू कर दिया है। दो मंत्री अपने ही जिले में दूसरी सीट में संभावना तलाश रहे हैं। सीट बदलने की कवायद में लगे मंत्रीगण पहली बार जीतकर विधानसभा में पहुंचे हैं। कहते हैं राज्य के मंत्रियों को लेकर लोगों में नाराजगी देखी जा रही है। पिछले दिनों एक मंत्री जी को अपने ही विधानसभा में पार्टी के लोगों के गुस्से से दो-चार होना पड़ा। दो दिन पहले सक्ती में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में दो युवकों ने काला कपड़ा लहरा दिया।
विवेक आचार्य पोस्टिंग से नाखुश
कहते हैं 2006 बैच के आईएफएस विवेक आचार्य छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम के कार्यकारी निदेशक बनाए जाने से खुश नहीं हैं। काफी सालों तक अलग-अलग विभागों में मुखिया की जिम्मेदारी संभाल चुके विवेक आचार्य को वन विकास निगम में मातहत बना दिया गया। वन विकास निगम में प्रबंध संचालक अमरनाथ प्रसाद हैं। अमरनाथ प्रसाद को यह पद अतिरिक्त रूप से सौंपा गया है। वे मंत्रालय में सचिव वन की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। विवेक आचार्य कांग्रेस और भाजपा दोनों शासनकाल में संस्कृति संचालक रहे चुके हैं। इसके अलावा वे पर्यटन निगम के प्रबंध संचालक भी रहे हैं।ज़्यादा जानेंप्रवासी नेटवर्क जुड़ेंडिजिटल कैलेंडर चुनेंराजनीतिक ख़बरें पढ़ेंआईएफएस सोमा दास को पोस्टिंग का इंतजार2002 बैच की आईएफएस सोमा दास भारत सरकार से प्रतिनियुक्ति से लौटकर वन विभाग में ज्वाइनिंग दे दीं हैं, अब उन्हें पोस्टिंग का इंतजार है। सोमा दास पांच साल बाद प्रतिनियुक्ति से लौटीं हैं। वे फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के कोलकाता कार्यालय में रीजनल डायरेक्टर थीं। कहते हैं सोमा दास छत्तीसगढ़ सरकार से ज्यादा भारत सरकार में प्रतिनियुक्ति पर रही हैं। छत्तीसगढ़ सरकार अब सोमा दास के लिए पद की तलाश में है। सोमा दास छत्तीसगढ़ कैडर की आईएफएस हैं। इस कारण फिर से डेप्युटेशन पर जाने से पहले कुछ साल राज्य में सेवा देनी पड़ेगी।
मंत्री के भाई कांग्रेस में
सतनामी समाज के धर्मगुरु बालदास के बड़े बेटे और राज्य के विष्णुदेव साय सरकार में मंत्री गुरु खुशवंत साहेब के बड़े भाई गुरु ढालदास का कांग्रेस प्रवेश को प्रदेश की राजनीति के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है। गुरु ढालदास अभी किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े थे, पर धर्मगुरु बालदास के बड़े बेटे के तौर पर समाज में उनकी पकड़ मानी जा रही है। राज्य में अनुसूचित जाति के लिए 10 सीटें आरक्षित हैं, पर कई सीटें ऐसी हैं जहां अजा वर्ग के मतदाता निर्णायक हैं। राज्य में विधानसभा चुनाव में अभी दो साल से कुछ ज्यादा समय बचे हैं, पर मंत्री के परिवार के एक सदस्य को तोड़कर कांग्रेस राजनीतिक संदेश देने में कामयाब हो गई है।
(लेखक पत्रिका समवेत सृजन के प्रबंध संपादक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
