डिजिटल युग और एआई में हिंदी: चुनौती या नया अवसर.? @ डॉ. आरती पाठक

डिजिटल युग और एआई में हिंदी: चुनौती या नया अवसर
डॉ. आरती पाठक
कालिंदी महाविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली
artipathak@kalindi.du.ac.in
21वीं सदी सूचना प्रौद्योगिकी और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) की सदी है। एक दौर था जब तकनीक और इंटरनेट की दुनिया में अंग्रेजी का एकछत्र राज माना जाता था और यह आशंका जताई जाती थी कि डिजिटल क्रांति भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी को हाशिए पर धकेल देगी। परंतु आज परिदृश्य इसके ठीक उलट है। डिजिटल युग और एआई के इस दौर में हिंदी न केवल अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्ज करा रही है, बल्कि विकास के नए आयाम भी तलाश रही है। ऐसे में यह सवाल बेहद प्रासंगिक हो जाता है कि क्या यह दौर हिंदी के अस्तित्व के सामने कोई संकट खड़ा कर रहा है या फिर यह उसकी प्रगति का एक ऐतिहासिक अवसर है?
निःसंदेह, तकनीक के शुरुआती दौर में हिंदी के सामने चुनौतियाँ कम नहीं थीं। इंटरनेट की बुनियाद और कोडिंग मुख्य रूप से रोमन लिपि पर केंद्रित थी। देवनागरी लिपि के लिए मानक फॉन्ट और सहज कीबोर्ड का न होना एक बड़ी तकनीकी बाधा थी। इसके अलावा, एआई आधारित मॉडलों को प्रशिक्षित करने के लिए उच्च गुणवत्ता वाले डिजिटल डेटासेट की आवश्यकता होती है। इंटरनेट पर मानक और शुद्ध हिंदी सामग्री की सीमित उपलब्धता के कारण शुरुआती वॉयस असिस्टेंट और अनुवाद टूल्स कई बार भाषा के व्याकरण और संदर्भ को सही ढंग से नहीं पकड़ पाते थे।
हालाँकि, जैसे-जैसे तकनीक का प्रसार भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण अंचलों तक हुआ, डिजिटल परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। टेक कंपनियों को यह समझने में देर नहीं लगी कि भारत का असली और विशाल बाज़ार गैर-अंग्रेजी भाषी आबादी में बसता है। आज गूगल, यूट्यूब और विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर सबसे अधिक खोज और कंटेंट की खपत हिंदी में हो रही है।
एआई और वॉयस टेक्नोलॉजी ने तो साक्षरता और भाषा के बीच की दूरी को ही मिटा दिया है। ‘गूगल असिस्टेंट’ या ‘एलेक्सा’ जैसे टूल्स की मदद से जो लोग लिखना या टाइप करना नहीं जानते, वे भी केवल अपनी आवाज़ के बल पर जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। इसने हिंदी भाषी आम जनमानस के लिए सूचना और ज्ञान का अधिकार वास्तव में सुलभ बना दिया है।
इसी प्रकार, एआई आधारित न्यूरल मशीन ट्रांसलेशन ने दुनिया भर के ज्ञान-विज्ञान, चिकित्सा, विधि और प्रशासनिक साहित्य को हिंदी में अनूदित करने की प्रक्रिया को गति दी है। आज डिजिटल युग ने हिंदी कंटेंट क्रिएटर्स, पत्रकारों, ब्लॉगर्स और पॉडकास्टर्स के लिए संभावनाओं के असीम द्वार खोल दिए हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और मीडिया हाउसों में हिंदी की बढ़ती माँग ने युवाओं के लिए रोज़गार के नए और आकर्षक अवसर पैदा किए हैं।
तथापि, इस उजले पक्ष के साथ एक सावधान करने वाला पहलू भी है। एआई और मशीन जनित सामग्री के अति-प्रयोग से भाषा की शुद्धता, उसकी मौलिक आत्मा और व्याकरणिक सौंदर्य के क्षरण की संभावना बनी रहती है। ‘हिंग्लिश’ का बढ़ता प्रभाव और मशीनी अनुवाद का अंधाधुंध उपयोग भाषा के लालित्य को चोट पहुँचा सकता है।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी के विद्वान, भाषाविद और तकनीकी विशेषज्ञ मिलकर काम करें। हमें एआई मॉडलों को समृद्ध, प्रामाणिक और उच्च स्तरीय हिंदी डेटासेट से प्रशिक्षित करना होगा।
निष्कर्षतः, एआई और डिजिटल क्रांति हिंदी के लिए कोई खतरा नहीं, बल्कि एक स्वर्णिम अवसर है। तकनीक ने हिंदी को महज़ साहित्यिक गोष्ठियों और आधिकारिक औपचारिकताओं से निकालकर वैश्विक डिजिटल पटल पर स्थापित कर दिया है। यदि हम भाषा की मौलिकता की रक्षा करते हुए इस तकनीक को पूरी क्षमता से अपनाएँ, तो आने वाले समय में हिंदी विश्व की सबसे सशक्त और ज्ञान-समृद्ध डिजिटल भाषाओं में अग्रगण्य होगी ।
