भारत के ‘वाटर-बम’ से पाक भयभीत@ डॉ. सुधीर सक्सेना

हेग (नीदरलैंड) स्थित स्थायी कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (पीसीए) ने सिंधु जल विवाद में पाकिस्तान के पक्ष में फैसला दिया है, अलबत्ता भारत की ‘वाटर-बम’ स्कीम ने पाकिस्तान की रगों में सिहरन पैदा कर दी है। अगर भारत की यह दूरगामी महत्व की सिंचाई-सह-सामरिक योजना साकार हो गयी तो पाकिस्तान की अवाम बूंद-बूंद को तरसेगी और वहाँ खेती और निस्तार के लिए पाकिस्तान भारत के रहमोकरम पर होगा। फकत 56 करोड़ रुपयों की लागत की यह योजना ऐसा अचूक हथियार साबित होगी, जिसका पाकिस्तान के पास कोई तोड़ नहीं है। लद्दाख के एलजी विनय कुमार सक्सेना ने इस आशय की स्कीम दिल्ली में जल शक्ति मंत्रालय को भेजी है, जिसके साकार होने का अर्थ होगा पाकिस्तान में नाहिए-नाहिए। इस स्कीम के तहत भारत सिंधु के विराट नद पर एक साथ 36 बाँधों को बाँधेगा। इसमें लेह में सात और कारगिल में 29 रॉक डैमों का प्रस्ताव है। लेह में सिंधु नदी पर और कारगिल में सिंधु की प्रमुख और शक्तिशाली सहायक नदी सुरू पर आरसीसी डैम प्रस्तावित है।
हेग स्थित मध्यस्थता न्यायालय के सितंबर को इस आशय के फैसले कि भारत सिंधु जल संधि को एकतरफा स्थगित (निलंबित) नहीं कर सकता और संधि पूरी तरह से लागू है, भारत संधि का पालन करने का बाध्य हो जाता है। इसमें पाकिस्तान की ओर प्रवाहित नदियों पर पनबिजली परियोजनाओं के अभिकल्पन और संचालन से जुड़ी जिम्मेदारियाँ शामिल हैं। पाँच सदस्यीय कोर्ट ने भारत की उन सभी दलीलों को खारिज कर दिया है, जिनकी बिना पर वह करीब दशक पुराने जल-बंटवारा समझौते को स्थगित रखने का सही ठहरा रहा था।
कोर्ट के इस एकतरफा फैसले पर पाकिस्तान में बल्ले-बल्ले और शाबा-शाबा का शोर स्वाभाविक है, लेकिन भारत के सिंधु जल विवाद को हेग की कोर्ट के अधिकार क्षेत्र के बाहर मानते हुए उसे खारिज करने से मामला सर्वथा नयी परिस्थिति में पहुँच गया है। इससे पूर्व चीन भी पीसीए के उस निर्णय को खारिज कर चुका है, जो दक्षिण-चीन सागर के विवाद पर फिलीपींस के पक्ष में था। भारत भी 30 से अधिक प्रकरणों में पक्षकार रहा है, लेकिन यह पहला मौका है, जिसमें उसने हेग की अदालत को धता बता दी है। जाहिर है कि इससे पाकिस्तान की जीत बेमानी हो जाती है। ऊपर से भारत की सिंधु नदी पर बांधों की संख्या बढ़ाने की सुगबुगाहट ने पाक के पेट में मरोड़ पैदा कर दी है। इस्लामाबाद में जल संसाधन विशेषज्ञ हसन अब्बास का समझौता टूटने में भी कोई तात्कालिक खतरा नजर नहीं आता और उनका कहना है कि चिनाब पर भारत की भंडारण क्षमता एक मिलियन एकड़-फीट (405,000 हेक्टेयर-फीट) है, जो पाकिस्तान की मौसमी सिंचाई की जरूरतों के मान से बहुत कम है। अब्बास कहते हैं कि यदि भारत पानी नहीं बहने देगा, तो वह खुद ही बाढ़ की चपेट में आ जाएगा, क्योंकि भारत के बांध रन-ऑफ-रिवर हाइड्रोपावर प्लांट हैं, जिनमें पानी जमा करने की क्षमता बहुत कम होती है। एक बार बांध के भर जाने पर पानी छोड़ना इकलौता उपाय होता है। अब्बास ने पाक के जल प्रबंधन की आलोचना करते हुए कहा कि पाक को बड़े बांधों के बजाय सरल समाधानों को तरजीह देनी चाहिए।
ऐसा नहीं है कि पाक-हुकूमत भारत के खतरनाक पंजे का सामना नहीं कर रही है। पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी का कहना है कि भारत का रवैया तकनीकी या प्रशासनिक विवाद नहीं है, बल्कि पानी का हथियार के तौर पर इस्तेमाल है। गौरतलब है कि पाकिस्तान कई बड़ी जल-परियोजनाओं पर काम कर रहा है। इनमें दासू और दियामेर-भाशा योजना प्रमुख हैं। खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की दासू पनबिजली परियोजना प्रमुख है। स्कंदन पर्वत श्रृंखला की दियामेर-भाशा योजना गिलगित-बाल्टिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा की सीमा पर 272 मीटर ऊंचा विशाल बांध है। पानी का टोटा होते हुए भी विशाल बांध बांधना आश्चर्य की बात है।
इस सारे प्रकरण का ताजा और महत्वपूर्ण पहलू है लद्दाख के एलजी का बांधों की श्रृंखला का प्रस्ताव, जिससे इस्लामाबाद की पेशानी पर बल पड़ते जा रहे हैं। दिल्ली जितनी जल्दी इस प्रस्ताव को हरी झंडी देगा, पाकिस्तान की धुकधुकी उतनी ही ज्यादा बढ़ेगी।
