CBSE की संशोधित टेंडर शर्तों के कारण OSM विवाद में कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना मुश्किल

नई दिल्ली. सीबीएसई की कक्षा 12वीं की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन को लेकर सामने आए ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) विवाद ने अब एक नया मोड़ ले लिया है. बोर्ड जहां मूल्यांकन प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और तकनीकी खामियों को लेकर अपनी सेवा प्रदाता कंपनी को दंडित करने की तैयारी कर रहा है, वहीं सामने आए दस्तावेजों से संकेत मिल रहे हैं कि सीबीएसई के पास कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने का अधिकार अब नहीं बचा है. इसका कारण वह संशोधित टेंडर शर्तें हैं, जिनमें अनुबंध दिए जाने से पहले ब्लैकलिस्टिंग से संबंधित प्रावधान हटा दिए गए थे.

जानकारी के अनुसार सीबीएसई ने अगस्त 2025 में ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली के संचालन के लिए निविदा जारी की थी. इस निविदा में विभिन्न प्रकार की तकनीकी और प्रशासनिक त्रुटियों के लिए दंडात्मक प्रावधान शामिल किए गए थे. शुरुआती टेंडर दस्तावेज में यह स्पष्ट उल्लेख था कि गंभीर लापरवाही या बार-बार होने वाली त्रुटियों की स्थिति में बोर्ड संबंधित कंपनी के खिलाफ प्रदर्शन बैंक गारंटी जब्त करने, अनुबंध समाप्त करने और ब्लैकलिस्ट करने जैसी कार्रवाई कर सकता है.

हालांकि बाद में सितंबर 2025 में जारी एक संशोधन आदेश यानी कोरिजेंडम के जरिए टेंडर की कई शर्तों में बदलाव किया गया. इसी संशोधन में ब्लैकलिस्टिंग से संबंधित महत्वपूर्ण शब्दों को हटा दिया गया. इसके बाद दिसंबर 2025 में हैदराबाद स्थित कंपनी कोएंप्ट एडु टेक को ओएसएम प्रणाली के संचालन का ठेका प्रदान किया गया. दस्तावेजों के अनुसार मूल टेंडर में यह व्यवस्था थी कि यदि किसी गंभीर त्रुटि या लापरवाही का मामला सामने आता है तो सीबीएसई की समिति संबंधित कंपनी को कारण बताओ नोटिस जारी कर सकती है और आवश्यकता पड़ने पर प्रदर्शन बैंक गारंटी जब्त करने, ब्लैकलिस्ट करने तथा अनुबंध समाप्त करने की कार्रवाई कर सकती है. लेकिन सितंबर में जारी संशोधन के बाद ब्लैकलिस्टिंग शब्द को पूरी तरह हटा दिया गया और केवल बैंक गारंटी जब्त करने तथा अनुबंध समाप्त करने का विकल्प ही शेष रखा गया.

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