भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन: उत्थान और पतन की अकथ-कथा @ डॉ. सुधीर सक्सेना

भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन
उत्थान और पतन की अकथ-कथा
• डॉ. सुधीर सक्सेना
शुरूआत सचमुच शानदार थी। भारत ब्रिटेन का उपनिवेश था; दमन, शोषण और दीनता का शिकार दास राष्ट्र। महात्मा गांधी विश्व-इतिहास के अलीक-योद्धा के तौर पर परिदृश्य में उभर रहे थे। सारा राष्ट्र आजादी के लिये व्यग्र था। ऐसे में एक नये वैचारिक-आंदोलन ने भारत में प्रवेश किया और सर्वथा अलहदा मिजाज की एक पार्टी ने भारत में जन्म लिया। इसमें केन्द्रीय और अग्रणी भूमिका थी एमएन राय यानि मानवेंद्र नाथ राय की, जिन्हें सोवियत संघ जैसे विशाल राष्ट्र के सर्वेसर्वा बलादिमीर इलिच लेनिन का संग-साथ और विश्वास हासिल था। हुआ यह कि 17 अक्टूबर, सन 1920 को पामीर पार ताशकंद में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की दूसरी कांग्रेस की बैठक हुई और इसने भारत में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गठन की पूर्वपीठिका रच दी। विचार मंथन और सांगठनिक प्रयासों के बाद अंतत: 25 दिसंबर, सन 1925 को भारत के मैनचेस्टर कानपुर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ। इसके शुरूआती नेताओं में एमएन राय के अलावा अबनि मुखर्जी, मोहम्मद अली और शफीक सिद्दिकी प्रमुख थे।
25 दिसंबर, सन 2025 से काल गणना करें तो भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की एक सदी पूरी हो चुकी है। इस मान से यदि एक शती के वृत्तांत यानि कम्युनिस्ट आंदोलन के हश्र को बांचें तो बहुत दिलचस्प चटख और धूमिल रंगों का कोलाज उभरता है। बालीवुड की फिल्म की तर्ज पर हम इसे राइज एण्ड फाल आफ कम्युनिस्ट मूवमेंट-कम्युनिस्ट आंदोलन का उत्थान और पतन भी कह सकते हैं। इस वृत्तांत में लंबे रक्तिम संघर्ष हैं और गर्वीली सफलतायें भी। वहां विफलतायें हैं और बिखराव भी। वहां विमर्श है और विभ्रम भी। संघर्ष, निष्ठा, समर्पण, बलिदान और अनेक महत्वपूर्ण योगदानों के बावजूद इसकी अंतत: शोकांतिका में परिणिति विस्मयकारी है, जो बहुतों को शोकाकुल करती है, तो बहुतों को हर्षित भी। क्या वजह है कि ऐसा हुआ? क्या ऐसा होना वृहत्तर समाज के स्वास्थ्य और भविष्य के लिहाज से सुखद है अथवा इसे विडंबना या त्रासदी माना जाये।
विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन और भारत के रिश्तों से शुरू करें तो कई अहम निष्कर्ष निकलते हैं। आंदोलन के प्रणेता कार्ल मार्क्स पहले मनीषी हैं, जिसने सन 1857 के अंग्रेजों द्वारा प्रचारित गदर को स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी। मार्क्स की भारत के इतिहास में गहरी रूचि थी और वह भारत की आजादी के हिमायती थे। इसमें कोई शक नहीं कि बीसवीं सदी विश्व स्तर पर वाम विचारों की सदी थी और इसने सभी महाद्वीपों में करोड़ों लोगों को वैचारिक तौर पर प्रभावित और आंदोलित किया। श्रमिकों, लेखकों और कलाकारों पर इसका प्रभाव अभूतपूर्व था। श्रम की महत्ता और गरिमा का पाठ प्रस्तुत कर इसने अनेक देशों में कू-दे-ता (तख्तापलट) की स्थितियां पैदा कीं; साहित्य कला और संस्कृति में नये आंदोलन उपजाये, पूंजीवादी-ईमान को डगमग किया, श्रमिकों के लिए बेहतर वातावरण सृजित किया, पारंपरिक रूढ़ियों के प्रति असंतोष उपजाया, उपनिवेशवाद के खिलाफ अलख जगाई और युवा वर्ग की आंखों में नये सपने आंजे। उसने गैर-बराबरी के खिलाफ बराबरी, शोषण के खिलाफ मुक्ति और दासता के खिलाफ स्वतंत्रता की हिमायत की। यह विश्व इतिहास में परंपरा और रूढ़ियों के खिलाफ विचलन और हस्तक्षेप का सर्वथा भिन्न और अपूर्व उपक्रम था। हम स्तालिन, गोर्की, चेखव, माओ, होची मिन्ह, चेग्वेरा, कास्त्रो, नाजिम, हिकमत, फैज, रेजिस द ब्रे, चार्ली चैप्लिन आदि की बात न कर यदि भारतीय परिदृश्य पर भी दृष्टिपात करें तो बड़े और सितारा नेताओं, कवियों, कलाकारों, दार्शनिकों और कार्यकर्ताओं में कौन है, जिसे सोवियत क्रांति अथवा साम्यवादी विचारों व आंदोलनों ने प्रभावित नहीं किया? पं. नेहरू से लेकर भगत सिंह तक, रबींद्रनाथ ठाकुर से लेकर प्रेमचंद तक, राजकपूर से लेकर बलराज साहनी तक, माखनलाल चतुर्वेदी से लेकर गणेश शंकर विद्यार्थी तक नामों की एक अछोर कतार है, जिन्हें साम्यवादी विचारों ने आलोड़ित किया। शहीदे आजम भगत सिंह तो फांसी के तख्ते की ओर जाने से कुछ क्षण पहले तक लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे….
और लेनिन? लेनिन तब नहीं थे, लेकिन बड़ी बात यह है कि लेनिन क्या थे? लेनिन भारत से गेहरे प्रेम में डूबी हुई – महान क्रांतिकारी शख्सियत थे। उन्होंने बंगाल विभाजन के विरोध में लिखा, जालियांवाला कांड की निंदा की, तिलक को मांडले जेल भेजन का विरोध किया, महात्मा गांधी की अगुवाई में आजादी की लड़ाई का समर्थन किया, भारत में अकाल पर अंग्रेज-नीतियों की निंदा की और भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी समेत सैकड़ों युवकों के विचारों को प्रज्वलित किया।
निश्चित ही, लेनिन अपने प्रति भारतवासियों के बेहतर सोच और सलूक के हकदार हैं। बाद के दौर को देखें तो भी सोवियत और फिर रूस के शासक और जन भारत के प्रति प्रेम, सम्मान और सदिच्छा रखते हैं। चाहे बुल्गानिन, ब्रेभनेव, खुश्चेव और कोसीगिन रहे हों या फिर पुतिन। बावजूद इन संदर्भों के भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन बिखरता गया। उन्होंने यत्नपूर्वक ट्रेड यूनियनों को संगठित किया, इंडियन कॉफी हाऊस जैसे दर्जनों संस्थाओं के हेतु बने, सन 1957 में केरल में पहली निर्वाचित सरकार का गठन हुआ, पश्चिम बंगाल में कई दहाइयां उनके लाल झंडे के तले बीतीं, देवेगौड़ा और गुजराल की केन्द्रीय सरकारों में उनकी भागीदारी रही, साहित्य और कला के लोक में उनकी केंद्रीय इयत्ता रही, लेकिन मोटे तौर पर बीती पाव सदी में भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन का शीराजा बिखरता गया। क्यों?

आलेख : डॉ. सुधीर सक्सेना

भारत में कम्युनिस्टों का इतिहास आंदोलनों का इतिहास है। आंदोलन यानि संघर्ष। संघर्ष यानि विचलन। विचलन यानि मौजूदा स्वरूप, मौजूदा ढांचे मौजूदा समीकरणों के स्थान पर नया स्वरूप, नया ढांचा, नये समीकरण। यानि परिवर्तन। यथास्थिति नहीं, बदलाव। जड़त्व नहीं गतिज। नयी वैचारिकी। नया उन्मेष। अब पंरपरा के सन्दर्भ में इन परिवर्तनों की भूमिका पर गौर करें। एक बंद रूढ़िग्रस्त समाज में ग्लासनोस्त (खुलापन) और पिरिस्त्रोइका (पुनर्रचना) की जरूरत, उसके प्रति पारंपरिक सोच और तज्जन्य प्रतिकार पर तवज्जो दें। हश्र के वजूहात स्पष्ट हैं। जहां परिवर्तन के बजाय परंपरा श्रेष्ठ और श्रेयस्कर हो, वहां आप कब तक और कहां तक जूझेंगे? संघर्ष जब थकता है, तो सुविधा मांगता है। हर कौम, नस्ल और समाज का अपना डीएनए होता है। भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा को ‘देशी बागीचे में विदेशी बेल’ या विजातीय प्रजाति माना गया। रूपक गढ़ा गया कि जब मस्क्वा में बारिश होती है तो भारत में कम्युनिस्ट अपनी छतरियां खोल लेते हैं। यह नैरेटिव भी पनपा कि भारतीय कम्युनिस्टों का रिमोट कंट्रोल मस्क्वा और बीजिंग के हाथों में है। भारत में कम्युनिस्टों की विफलता का एक बड़ा मुद्दा उनकी धार्मिक सोच भी रहा। एक धर्मप्राण राष्ट्र में धर्म को अफीम बताना लोगों के गले नहीं उतरा। यह बात भी घर-घर फैलाई गई कि कम्युनिस्ट राज में तो सब कुछ सरकारी है। नौकरी भी और बच्चे भी। कम्युनिस्ट आयेंगे तो मंदिर बंद हो जायेंगे और बच्चों को सरकार छीन लेगी। और आपकी संपत्ति भी आपकी नहीं होगी। स्पष्ट है कि ये ‘नैरेटिव’ काम कर गये। एक धर्मप्राण आस्था से परंपराजीवी महादेश में परिवर्तन के ध्वजवाहक सफलता की पताकायें कहां फहराते? मेरा निजी अनुभव है कि परंपरा पोषक कर्मकाण्डी घरों में ‘साला कम्युनिस्ट’ गाली की तरह इस्तेमाल होने लगा। भारतीय समाज में वैसे भी तर्क के लिये कम ठौर रहा है। कम्युनिस्टों की गलती रही या मूर्खता कि वे साम्यवादी सोच या विचारधारा को भारतीय या देशज शब्दावली और सांचे में नहीं ढाल सके और कई बार उन्होंने राष्ट्रीय परिस्थितियों को नजरंदाज कर तदनुरूप निर्णय लेने के बजाय ‘ऊपरी’ निर्देश पर फैसले किये। वे बूर्ज्वा, वर्ग संघर्ष, सर्वहारा की आयातित शब्दावली में उलझे रहे। नतीजतन उनका दायरा सीमित रहा। वे अंदरूनी इलाकों या वृहत्तर भूभाग में जमीन नहीं गोड़ सके।
ऐसा नहीं है कि भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की पंजी में चमकीली घटनाएं या चेहरे नहीं हैं। आज की दलदली राजनीति में कम्युनिस्ट नेता ही हैं, जो भ्रष्टाचार के आरोपों से कभी नहीं बिंघे। ज्योति बसु का प्रधानमंत्री बनने से इंकार भारतीय राजनीति की विरल घटना है। भारत में जब भी आंदोलनों का इतिहास लिखा जायेगा, तेभागा और तेलंगाना आंदोलन, नलगोंडा, वारंगल और खम्मम का कर्ज माफी आंदोलन, नक्सलबाड़ी संघर्ष का भी जिक्र होगा। इसी विचार ने हमें इंकलाब जिंदाबाद, दुनिया के मजदूरों एक हो, हर जोर जुलम की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है, रोटी कपड़ा लेकर रहेंगे जैसे नारे दिये। इसी ने हमें हम होंगे कामयाब और वो सुबह कभी तो आयेगी जैसे गीत और साहिर और शैलेन्द्र जैसे अनेक बड़े गीतकार दिये। इसी ने पत्रकारों को श्रमजीवी के खाने में वर्गीकृत किया। कम्युनिस्टों ने हमें नंबूदरीपाद, बीटी रणदिवे, एके गोपालन, श्रीपाद अमृत डांगे, पीसी जोशी, अजय घोष, हरकिशन सुरजीत, ज्योति बसु, अच्युत मेनन, इंद्रजीत गुप्त, प्रकाश कारंत, वृंदा करात, जैसे बेदाग चेहरे दिये। मगर आज कम्युनिस्ट पार्टियों का फलक बेनूर है। वह बार-बार विघटन और विभाजन की भी शिकार रही। कांग्रेस ने उसे पोसा भी और ग्रसा भी। कम्युनिस्ट पश्चिम बंगाल तो पहले ही गँवा चुके थे, चार मई को उनका केरल का अंतिम लाल किला भी ढह गया। भारत नक्सलमुक्त हो चुका है। एक शती के बाद के पहले वर्ष में उनका यह हश्र भारतीय राजनीति का काबिलेगौर अध्याय और पाठ है, लेकिन चीजें लौटती हैं। नये-नये रंग रूपों में। और फिर विचार मरा नहीं करते। वे फीनिक्स पक्षियों की मानिंद होते हैं। परंतु इतिहासजन्य ताजा सच यही है कि कम्युनिस्ट विचारधारा के लिए भारत की  माटी तो मुफीद थी, लेकिन आबोहवा अनुकूल नहीं बैठी।
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