किस्सा थलपति के सीएम बनने का @ डॉ. सुधीर सक्सेना

तमिलनाडु : पेंच से पेंच निकालने का खेल
डॉ. सुधीर सक्सेना
सिनेमा से सियासत में आये 51 वर्षीय विजय जोसेफ चंद्रशेखर अंतत: जुम्मे के रोज तीन पार्टियों के समर्थन से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने में कामयाब हो गये। चार मई के नतीजों से उनकी बांछे खिलना स्वाभाविक था, अलबत्ता उनके और कुर्सी के दरम्यां दस कदमों का फासला था। एकबारगी शपथ लेने के बाद इसे पूरना कठिन नहीं था, किंतु राज्यपाल राजेन्द्र अर्लेकर की शपथ-पूर्व बहुमत की तस्दीक की शर्त ने उन्हें राजभवन से बैरंग लौटने को विवश कर दिया। इससे उनके लाखों समर्थकों और विधायकों में जहां मायूसी फैली, सियासत की मुंडेर पर अटकलों के सब्जों के उगने का क्रम तेज हो गया। इसके बाद घड़ी के काँटे तेजी से घूमे और काँटे से काँटा निकालने का दिलचस्प खेल देखने को मिला।
नयी सरकार के गठन में राज्यपाल के पहले नुकीले काँटे ने एक साथ आशंकाओं और संभावनाओं को जन्म दिया। देखते-देखते कई काँटे उग आये। सबसे बड़ा काँटा था दोनों द्रविड़ दलों के एक मंच पर आने का, लेकिन लंबी पारी खेलने के अनुभवी खिलाड़ी एवं पूर्व सीएम स्तालिन ने इस काँटे को यह कहकर दूर कर दिया कि वह विपक्ष में बैठने के जनादेश का पालन करेंगे। बड़े दिल का परिचय देते हुए उन्होंने थलपति को शपथ दिलाने का समर्थन करते हुये यहां तक कहा कि द्रमुक आगामी छह माह तक कोई विरोध या आंदोलन नहीं करेगी। उनके अपने पारंपरिक बैरी से हाथ मिलाकर और ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ को बढ़ावा देने का कोई प्रश्न ही नहीं था।
जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है, कांग्रेस ने वक्त के तकाजे को बूझा और दुविधा के बजाय तुरंत फैसला लिया। राहुल गांधी ने कहा कि यह जनादेश युवकों की बढ़ती आवाज को दिखाता है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। कांग्रेस ने बाहरी समर्थन के बजाय भागीदारी को चुना। यकीनन कर्नाटक, तेलंगाना, केरलम के बाद तमिलनाडु में सत्ता में आने से उसे नयी गिजा मिलेगी। इस सारे प्रसंग का अहम पहलू यह भी है कि विजय और उनके पिता के मन में कांग्रेस के प्रति स्वाभाविक आसक्ति है और टीवीके की सत्ता को वे भाजपा की परछाईं से भी दूर रखना चाहते थे। यह अकारण नहीं है कि बीजेपी की प्रांतीय ईकाई की उपाध्यक्ष खुशबू सुंदर ने थलपति के पक्ष में बयान दिया और कमलहासन और प्रकाश राज जैसी हस्तियों ने थलपति को सीएम पद की शपथ दिलाने का समर्थन किया।

तमिलनाडु में चले घटनाक्रम का एक बड़ा खटकेनुमा पेंच यह था कि कहीं राज्यपाल अर्लेकर दिल्ली की शह पर तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन न लगा दें। दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों-सीपीआई और सीपीएम ने इस पेंच को समझ लिया। दोनों ही दल चाहते थे कि तमिलनाडु में जनादेश लागू हो और राज्य सरकार दिल्ली के रिमोट से नहीं चले। इसीलिये राष्ट्रपति शासन, खरीद फरोख्त और अवसरवादिता को रोकने के ऐलान के साथ उन्होंने बाहर से समर्थन की घोषणा की। दो सीटों की बाकी कमी वीसीके (विदुथलाई चिरूथिगल काची) ने पूरी कर दी। बताते चलें कि वीसीके ब्लैक पैंथर्स और दलित पैंथर्स की तर्ज पर गठित पार्टी है। सन 1990 के दशक में दलित नेता के तौर पर उभरे इसके संस्थापक अध्यक्ष थोल तिरूमावलवन के बारे में कयास लगाया जा रहा है कि वह लोकसभा से इस्तीफा देकर विजय-सरकार में शामिल हो सकते हैं। इस सारे कथाक्रम का एक और बड़ा पहलू यह है कि नतीजों की छॉव में अन्नाद्रमुक ने बीजेपी से रिश्ते एक बार फिर तोड़ लिये हैं। यह भी खबर है कि राहुल पर्दे के पीछे से थलपति को लगातार गाइड कर रहे हैं।
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