ईरान बनाम इस्रायल-अमेरिका, पाक की हांडी में सुलह की खिचड़ी @ डॉ. सुधीर सक्सेना

ईरान बनाम इस्रायल-अमेरिका
पाक की हांडी में सुलह की खिचड़ी
• डॉ. सुधीर सक्सेना
अपनी सामरिक गणित के फेल हो जाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मध्यपूर्व के दिनोंदिन पेचीदा और विकराल होते जाते बखेड़े से पाँव बाहर खींचने के फेर में हैं। दिलचस्प तौर पर इसके लिये उन्होंने अपने पिट्ठू पाकिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष असीम मुनीर को चुना है और फिलहाल इस्लामाबाद में दोनों जंगजू पक्षों के दरम्यां सुलह की बातचीत चल रही है। इस्लामाबाद में चूल्हे पर हांडी चढ़ा दी गई है। बिला शक अमेरिका किसी भी विधि इस तरह पाँव पीछे खींचना चाहता है कि उसकी नाक बची रहे और उसके शर्मनाक और अपमानजनक अभियानों की फेहरिस्त में वियेतनाम और अफगानिस्तान के बाद ईरान का नाम न जुड़े। ट्रंप के पांच दिनों के इकतरफा युद्धविराम और ईरानी ठिकाने पर ताजा हमले के लिये इस्रायल को डंपटने के पीछे यही भेद छिपा है।
इस बात में शक नहीं है कि ट्रंप अपने ही खब्त की गिरफ्त में हैं। वह कब क्या कर बैठेगें, वह खुद नहीं जानते। उनके मन में वैश्विक मर्यादाओं और राष्ट्रों की संप्रुभता के प्रति कोई सम्मान नहीं है। निस्संदेह, उनकी मुहिम गैरजरूरी थी और नितांत विफल रही है। 28 फरवरी को छेड़ी गई इस मुहिम के पहले ही दौर में धार्मिक नेता अयातुल्लाह खामेनेई को उनकी मांद में मार गिराने तक सब ठीक था, लेकिन उसके बाद ट्रंप के सारे पांसे और अंदाजे गलत निकले। मोज्तबा खामेनेई पर वार और लारीजानी की हत्या व्हाइट हाउस की ‘भूल गलती’ सिद्ध हुई। विज्ञान में स्नातक और इमैनुएल कांट के दर्शन पर पीएचडी किये लारीजानी सूझबूझ भरे ऐसे परिपक्व और प्रभावशाली नेता थे, जिनसे बातचीत की जा सकती थी, लेकिन उनकी हत्या के बाद नेतृत्व इस्लामी गार्डों की उस छितरी हुई टोली के हाथ में चला गया, जिसमें कोई ऐसा चेहरा नहीं था, जिसका सैन्य बल और अवाम में रसूख हैं। इस बीच ईरान ने अड़ोस-पड़ोस के अमेरिकी पिट्ठुओं बहरीन, सऊदी, अरब, अरब अमीरात, कतर और ओमान तथा सुदूर दियागोगार्सिया में अड्डों पर प्रहार कर अपनी अचूक मारक क्षमता का बखूबी एहसास करा दिया। दूसरे इस्रायल के आयरन-डोम यानि लौह गुंबद या छतरी का बहुप्रचारित और गालबजाऊ मिथ भ्रांति सिद्ध हुआ। मध्यपूर्व के मुल्कों के निर्लवण-संयंत्र ईरान की सीधी जद में थे और होर्मुज जलडमरूमध्य का तुरूप का पत्ता ईरान की जेब में। तीन हफ्ता से ज्यादा की जंग ने तस्दीक कर दी थी कि ईरान घुटने नहीं टेकेगा और उसे तबाही गवारा है, मगर शिकस्त नहीं। यह भी साफ हो गया कि न तो कोई ईरानी ‘गुल्लू’ बनने को तैयार है और न ही आर्य मेहर रजाशाह पहलवी के साहेबजादे की तेहरान वापसी में ईरान अवाम की कोई रूचि है। उलटे जियोनवादी आक्रमण ने ईरानी अवाम को मुसीबातें और दमन के बावजूद इस्लामी सत्ता के पक्ष में एकजुट कर दिया।
ये ही वे सन्दर्भ हैं, जिनके चलते ट्रंप ने पहले तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगान को टटोला। बात बनी नहीं तो उनकी नज़र पाकिस्तान के सीडीसी मुनीर पर गयी। मुनीर ने एर्देगान से बात की और फिर तार जुड़े काहिरा यानि मिस्र से। सौ करोड़ डॉलर की बोली लगी। हामी के बाद ईरानी मजलिस के स्पीकर गालीबफ पर मध्यस्थों की नजर गयी। इस बीच रूस के राष्ट्रपति पुतिन अपने तईं सक्रिय थे1 उन्होंने यूएई, कतर और ईरान से संपर्क साधा। दूरभाष पर मैराथन चर्चा हुई। पुतिन ने स्पष्ट कर दिया कि रूस ईरान को तबाही के रास्ते पर नहीं छोड़ सकता, क्योंकि वह उसका रणनीति साथी और मित्र है। इस बीच रूसी विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव के इस आशय के बयान ने अमेरिका-इस्रायल की पेशानी पर सलें डाल दीं कि वे ईरान की मिसाइल समेत सामरिक क्षमता को कमतर न आंके। इस बात की तस्दीक हो गई है कि लावरोव ने ईरानी विदेश मंत्री अरागाची से फोन पर लंबी बातचीत की। बहरहाल, घड़ी के कांटे ऐसे घूमे कि आईआरजीसी की रजामंदी से गालीबफ को इस्लामाबाद लाया गया। ताबड़तोड़ दो दौर की बातचीत हुई। मेज के दूसरी ओर ट्रंप के दामाद कुश्नर और विटकोफ बैठे तो गालीबफ भड़क गये। उन्होंने दोनों को दफा करने की दो टूक में संकोचनहीं किया। उन्होंने आगे की वार्ता के लिए वांस का नाम सुझाया। वांस यानि ट्रंप के डिप्टी जेडी वांस। जाहिर हे कि तेल अवीव और वाशिंगटन को वांस का नाम रास नहीं आया, क्योंकि वांस अपेक्षत: नरम हैं।
फिलवक्त काठ की हांडी चूल्हे पर है और अमेरिकी तैयारी भी जारी है। अतिरिक्त मरीन भेजे जा रहे हैं। ईरानी विदेश मंत्री अरागाची को दरकिनार करने के अपने निहितार्थ है। ईरान हर्जाने और अनाक्रमण संधि पर मान सकता है। ट्रंप सांसत में हैं। 13 हजार करोड़ रोजाना फूंक रहे ट्रंप ने 20 लाख करोड़ की कांग्रेस से डिमांड की है। यदि सुलह होती है तो भय में गोंते खा रहे अमेरिका के पिट्ठू मुल्क चैन की सांस लेंगे। ईरान पाक नगीच आये तो बलूचिस्तान का मसला ठंडा होगा। मिस्र शरणार्थियों से बचेगा और तुर्किये अनेक बवाल से बड़ी बात की पाकिस्तान को अपनी पीठ थपथपाने और शेखी बघरने का मौका मिलेगा। गौरतलब है कि ईरान के सुप्रीम लीडर मोज्तबा खामेनेई का इलाज मसक्वा में चल रहा है। दिल्ली में ईरान के राजदूत डॉ. हकीम इलाही भारत की जनता के बेइंतहा समर्थन से भावविगलित हैं। दिल्ली में शोक सहानुभूति और एकजुटता के इजहार के लिए ईरानी दूतावास के सामने जिस तरह लंबी कतारे लगीं, उसने भारत और ईरान के प्राचीन रिश्तों पर मोहर लगा दी।
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