कोरबा की जैबुननिशा को मिला हाईकोर्ट से न्याय, भतीजा का दावा किया गया खारिज..!

बिलासपुर। हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि कोई मुस्लिम अपनी एक तिहाई से ज्यादा जायदाद वसीयत के ज़रिए किसी को नहीं दे सकता, जब तक कि बाकी वारिसों की रजामंदी न हो। यह फैसला एक विधवा की याचिका पर आया, जिसे निचली अदालतों ने उसके पति की जायदाद में हिस्सा देने से इनकार कर दिया था। मामला कोरबा जिले का है। 64 साल की जैबुननिशा ने अपने पति अब्दुल सत्तार लोधिया की जायदाद पर अधिकार मांगते हुए कोर्ट में याचिका दायर की। उनके पति की मौत 2004 में हुई थी। पति की मौत के बाद भतीजे मोहम्मद सिकंदर ने अपने पक्ष में एक वसीयत प्रस्तुत की, जिसमें कहा गया था कि सारी जायदाद उसे ही मिलेगी। सिकंदर ने खुद को ‘पालक बेटा’ बताया था। जैबुननिशा ने इस वसीयत को फर्जी बताया और कहा कि यह उनकी रजामंदी के बिना बनाई गई थी। उन्होंने निचली अदालतों में केस दायर किया, लेकिन दोनों अदालतों ने उनकी याचिका खारिज कर दी।

निचली अदालतों का फैसला पलटा

जस्टिस बिभू दत्ता गुरु की सिंगल-जज बेंच ने सुनवाई के बाद निचली अदालतों का फैसला पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने विधवा के कानूनी हक को सुरक्षित रखने में गलती की। कोर्ट ने मुस्लिम लॉ के सेक्शन 117 और 118 का हवाला देते हुए कहा कि वसीयत के जरिए जायदाद देने की एक सीमा है।

एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सिकंदर की वसीयत असली भी होती, तब भी वह जायदाद का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा नहीं मांग सकता था। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया वारिसों के हक की हिफाजत मुस्लिम कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है। एक तिहाई से ज्यादा की वसीयत वारिसों की मौत के बाद की रजामंदी के बिना प्रभावी नहीं हो सकती।’

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