बोर्ड ऑफ पीस : ट्रंप का नया ‘ट्रंप-कार्ड’: डॉ. सुधीर सक्सेना

• डॉ. सुधीर सक्सेना
संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बोर्ड ऑफ पीस की शक्ल में अपना ट्रंप-कार्ड यानि तुरूप का पत्ता चल दिया है। बोर्ड ऑफ पीस यानि पीस क्लब को शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं मिलने से खफा ट्रंप का अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का उपक्रम माना जा रहा है। उन्होंने पैंसठ देशों के राष्ट्राध्यक्षों को इससे जुड़ने का न्यौता भेजा है और इसका सदस्यता शुल्क होगा एक अरब डॉलर। ट्रंप इस क्लब के चेयरमैन हैं और इसकी कार्यकारिणी में उनके दामाद जोरड कुश्नर और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर समेत अनेक राजनयिक और धन्नासेठ शामिल हैं। गौरतलब है कि यूएसए के दूसरी बार निर्वाचित राष्ट्रपति ट्रंप ने स्वयं को वेनेजुएला का राष्ट्रपति घोषित करने के साथ ही ग्रीनलैंड पर दावा ठोंक रखा है और वह कनाडा को अमेरिकी राज्य के तौर पर देखने का सपना पाले हुये हैं।
बोर्ड ऑफ पीस की स्थापना की गाथा गत वर्ष युद्ध जर्जर गाजा में शांति-स्थापना की पहल से होती है। अक्टूबर, सन 2023 से प्रारंभ युद्ध में इस्रायली कार्रवाई से फलस्तीन को बड़े पैमाने पर तबाही का सामना करना पड़ा। अगस्त-सितंबर में ट्रंप ने टोनी ब्लेयर के सहयोग से गाजा में आंतरिक प्रशासन और आर्थिक बहाली की योजना प्रस्तुत की। प्रस्ताव को इस्रायल और हमास ने कुबूल कर लिया। 12 अक्टूबर को ब्लेयर फलस्तीन के उपराष्ट्र‌पति हुसैन अल शेख से जोर्डन में मिले। वार्ता सफल रही और उसी शाम ट्रंप ने गाजा-युद्ध के खात्मे और बोर्ड ऑफ पीस के गठन का ऐलान कर दिया। गाजा में युद्ध विराम एक बड़ी घटना थी, लिहाजा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव क्रमांक 2803 के जरिये इसका स्वागत किया। जश्न के तौर पर 13 अक्टूबर, 25 को मिस्र में शर्म-अल-शेख में बैठक हुई। इसी क्रम में हमास के प्रवक्ता हाजेम कासिम की शीघ्र टेक्नालाजिकल कमेटी के गठन का बयान सामने आया। ट्रंप का अभियान बाला-बाला चलता रहा और अंततः 14 जनवरी को ट्रंप ने विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों को बोर्ड ऑफ पीस से जुड़ने का दावतनामा भेज दिया। अगले ही दिन उन्होंने दंभोक्ति की कि बोर्ड ऑफ पीस दुनिया में कभी भी और कहीं भी गठित किसी भी संगठन से अधिक प्रतिष्ठापूर्ण उपक्रम है। उन्होंने कहा कि इसका मकसद होगा संकटग्रस्त इलाकों में शांति स्थापना, भरोसेमंद और वैध-प्रशासन की बहाली तथा स्थायित्व को बढ़ावा। सहज समझा जा सकता है कि ट्रंप संयुक्त राष्ट्र संघ के समांतर एक पृथक वैश्विक संगठन की इमारत की ईंटे चिन रहे हैं।
बोर्ड आफ पीस की कार्यकारिणी से इस संभावना को बल मिलता है कि ट्रंप इसे निजी क्लब के तौर पर चलाना चाहते हैं। उनका यह उपक्रम शांति स्थापना से अधिक अपनी ताकत और दबदबा बढ़ाने का हथकंडा अधिक लगता है। तो क्या वे यूएनओ को दरकिनार करना चाहते हैं। उन्होंने चेहरे चुन लिये है। इनमें उनके मित्र है, मंत्री हैं और सलाहकार हैं। वह अकारण नहीं है कि इसे उनके अहंकार या दंभ से जोड़कर देखा जा रहा है। मध्यपूर्व में यूएनओ के समन्वयक रहे निकोलाई म्लादेनोव इसके डायरेक्टर जनरल होंगे। कार्यकारिणी के अन्य सदस्य हैं अमेरिका के सेक्रेट्री ऑफ स्टेट मार्को रूबियो, मध्यपूर्व में विशेष दूत स्टीव विटकोफ दामाद कुशनर, ब्रिटन के पूर्व पीएम टोनी ब्लेअर, अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के मार्क रोवान, राजनीतिक सलाहकार रॉबर्ट गैब्रिएल और वर्ल्ड बैंक के भारतीय मूल के अध्यक्ष अजयपाल सिंह बंगा।

ट्रंप के न्यौते पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने शिरकत की तस्दीक की हैं, वहीं तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगान की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है। अल्बानिया के पीएम एदी रामा ने भी आमंत्रण स्वीकार कर लिया है और इसे विश्व मंच पर अल्बानिया की बढ़‌ती प्रतिष्ठा का द्‌योतक बताया है। अजरबैजान ने जहां इंकार कर दिया है, वहीं फ्रांस के इमैनुएल मैक्रों ने ट्रंप को ठेंगा दिखा दिया है। बड़ी संख्या में मुस्लिम और यहूदी आबादी के अलावा समता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व में फ्रांसीसी निष्ठा जग जाहिर है। अमेरिका का स्टेचू ऑफ लिबर्टी फ्रांस का ही उपहार है। दूसरे योरोपियन यूनियन का हिमायती फ्रांस अमेरिका का पिछ लग्गू नहीं बनना चाहता। मैक्रों के इंकार से क्षुब्ध ट्रंप का नजला फ्रेंच वाइन और शैंपेन पर गिरा है और उन्होंने इन पर टैरिफ दो सौ फीसद बढ़ा दिया है।
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