पोड़ीबहार तालाब सामूहिक श्रमदान से बना था बेहतर, अब हालात जस के तस

कोरबा 16 अक्टूबर। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम भले ही कंक्रीट के जंगल में खो गए हों, लेकिन हमारे पुरखों ने प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हुए जो जल स्रोत हमें दिए थे, उनकी उपेक्षा करना हमारे लिए सबसे बड़ी भूल साबित हो रही है। खासकर शहरों के पुराने तालाब, जो कभी जीवन, उल्लास और संस्कृति के केंद्र हुआ करते थे, आज गंदगी और लापरवाही के बोझ तले दबे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए चीत्कार कर रहे हैं।

शहर के पोड़ीबाहर क्षेत्र में स्थित एक प्रमुख तालाब, जो न केवल स्थानीय निवासियों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि धार्मिक क्रियाकलापों, जैसे कि मुक्तिधाम में तर्पण आदि के लिए भी उपयोग किया जाता है, एक बार फिर चिंता का विषय बन गया है. यह तालाब, जो कभी अपनी सुंदरता और उपयोगिता के लिए जाना जाता था। अब उपेक्षा और गंदगी का पर्याय बन चुका है। कुछ समय पूर्व तक इस तालाब की दशा अत्यंत दयनीय थी। गंदगी के कारण इसका उपयोग मुश्किल हो गया था.लेकिन, इस निराशा के बीच कुछ युवा आशा की किरण बनकर सामने आए. पोड़ीबाहर के इन जागरूक युवाओं ने अपने आस-पास की इस बदहाली को देखा और इसे सुधारने का बीड़ा उठाया। हर सुबह, वे अपने कीमती समय को निकालकर श्रमदान करने लगे। उनकी इस पहल से तालाब का कायाकल्प होने लगा।

इस अभियान में सक्रिय रूप से जुड़े डॉ. राजेश राठौर बताते हैं कि यह केवल एक सफाई अभियान नहीं था, बल्कि एक संवेदनशील सामाजिक पहल थी। उन्होंने कहा, हमारा उद्देश्य सिर्फ तालाब को साफ करना नहीं था, बल्कि समाज को यह समझाना था कि यह हमारा सामूहिक दायित्व है. युवाओं के अथक प्रयासों से तालाब एक बार फिर स्वच्छ और उपयोग लायक हो गया था। इन युवाओं का मकसद सिर्फ शारीरिक श्रम से तालाब को साफ करना नहीं था, बल्कि लोगों के मन में इसके महत्व को लेकर जागरूकता फैलाना भी था। वे चाहते थे कि समाज यह समझे कि तालाब केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण, हमारी संस्कृति और हमारी विरासत का एक अहम हिस्सा हैं। उनकी इस पहल को काफी सराहा भी गया था। दुर्भाग्यवश, यह उम्मीदें ज्यादा दिन नहीं टिक पाईं. युवाओं द्वारा सफाई के बाद यह तालाब एक बार फिर गंदगी से पट गया है। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है और यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि केवल कुछ लोगों के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। जब तक समाज सामूहिक रूप से अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझेगा, और सरकारी तंत्र भी अपनी भूमिका सक्रियता से नहीं निभाएगा, तब तक इन प्राकृतिक धरोहरों का बद्हाल होना तय है।

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