एक विलक्षण यायावर: रवीन्द्रनाथ @ डॉ. सुधीर सक्सेना

डॉ. सुधीर सक्सेना
आमि एक जाजाबोर
हां, मैं हूं एक यायावर
हम सब हैं यायावर
वह भी था यायावर
विलक्षण जाजाबोर रवीन्द्रनाथ
गुजरा इस पृथ्वी से
उन्नीसवीं शती के लगभग मध्य से
बीसवीं शती के लगभग मध्य तक
चलता रहा अहर्निश अविराम
आठ दशक जारी रहा
शब्दों से, रंगों से, रेखाओं से, सुरों से
आचार से, विचार से, भावों से, भंगिमाओं से
अनथक उसका सविनय संग्राम
वह देखो कैलेंडर में फड़फड़ाती है
7 मई, सन् 1861 की तारीख
किंचित पीताभ नहीं, चमकीली नीलाभ
पश्चिम बंग में कलकत्ते में अभिराम
एक नहीं, उगे दो सूर्य
एक प्राची में, दूसरा ठाकुरबाड़ी, जोड़ासांको में
दोनों के मुख सुंदर, अम्लान
धरा पर अद्भुत युगल-विहान
खगकुल ने छेड़ा नव मधुर गान
एक रवि गगन में
दूसरा शारदा-देवेन्द्र के प्रांगण में
डूबा पहला रवि सांझ गए
पर दमका दूजा आलोकित दिग-दिगंत
प्रतिदिन उज्ज्वल से उज्ज्वलतर
उज्ज्वलतर से उज्ज्वलतम
चौदह की वय में
‘बनफूल’ से शुरू हुई यात्रा
कालांतर शब्दों में जुड़ी रेखाएं, जुड़े रंग
कंठ से फूटा सुमधुर संगीत निर्झर
पांव नहीं थमे
पगों की परिधि में दोनों गोलार्द्ध
श्रीलंका, रूस, इराक, फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी, जापान
अमेरिका, कनाडा, पेरू, मलेशिया, हॉलैंड, इटली, ईरान…
सरहदें मिटीं, जन्मा विश्वकवि
उमगी ज्ञान और संवेदना के गोमुख से
विश्वकविता की अमिय धार
सींचे विश्व के प्राण
शुष्क मनों में अभिनव रस का संचार
जुड़े बर्नार्ड शॉ, बर्ट्रैन्ड रसेल, यीट्स, रोम्या रोलां, एजरा पाउंड, आइंस्टीन से तार…
एक दिवस मिले दो महानुभाव
गही बांहें
मिले रवीन्द्र से मोहनदास
कि मोहन से रवीन्द्रनाथ
नदी से नहीं,
सिंधु से भेंटा सिंधु
समेटे अनगिन धाराएं
क्षुब्ध नहीं, शांत गहन-गंभीर
विचलित दोनों ही
धरती, समाज और इतिहास के विकार से
आतुर, कटिबद्ध लड़ने को अंधकार से
ज्योतिपुंज मिले दो ऐसे
कि रवीन्द्र हुए गुरुदेव
और महात्मा मोहनदास
लौकिक कायाओं में अलौकिक प्रकाश
देखा धरा ने
भिन्न होकर भी दोनों अभिन्न
दोनों ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिए,
जे पीर पराई जाने रे’ के वैष्णव जन
गुनगुनाए गुरुदेव:
‘जीवन जखन शुकाय जाय, करुणा धाराय एशो’
की महात्मा ने ‘सबको सन्मति’ की प्रार्थना
कहा गुरुदेव ने ‘जोदि तोर डाक शुने केओ ना आशे’,
किंतु दृश्य नितांत विलोम
नंगे फकीर के साथ चल पड़ा ज़माना
देखा गुरुदेव ने धवल स्वप्न
रचा नया नीड़ अभिनव
वो देखो, जाजाबोर!
फलक पर दिपदिप दिनांक
13 नवंबर, सन् 1913
गीतांजलि पर नोबुल निसार
भारत को प्रथम बार
दासता में उन्नत गौरव अपार
किसके हैं रवीन्द्र
शुधू आमार नार्इं, शुधू नार्इं तोमार
वास्तव में आमादेर
राष्ट्र कवि नहीं, विश्व-कवि
द्वीप नहीं, महाद्वीप नहीं
कविता में समग्र धरती की टेर
रचा एक नहीं, दो राष्ट्रों का गान
कहीं नहीं कोई ‘कंफर्ट-जोन’
किसी विधि अनीति नहीं स्वीकार
कभी नहीं निश्चल, कभी नहीं मौन, सर्वदा प्रतिकार
जालियांवाला नरमेध पर लिखा वायसराय को पत्र
लो, यह रहा ‘नाइटहुड’का खिताब
थिरका अधरों पर मानवमुक्ति का मंत्र
‘विचित्रा’ में आज भी धरी हैं कुर्सी ओकांपे-प्रदत्त
जिस पर बैठ बरसों-बरस रचा प्रति-संसार
कहा, मिथ्या नहीं, वास्तव है जगत
सत्य जीवन, सत्य सर्वोपरि, सत्य ही ईश्वर
सृजन मानव मन का श्रृंगार
कैसा अद्भुत जीवन
वर्ष, मास, दिवस, प्रहर, पल-प्रतिपल
कुछ भी नहीं अहेतुक
आराधना शब्दों से सत्य की
उसी की इबादत रंगों-रेखाओं से
सहेतुक जीवन
साधना सत्य की, सुंदर की, शिव की अविराम
मृत्यु नहीं चाहता कवि
चाहता है फिर-फिर जनम
चाहता है जीना धरा पर बारंबार
उसे फ़कत अंध से, कलुष से, असत से
हिंसा से, अनीति से विराग
धरती से, जीवन से, प्रकाश से
वायु से, वनस्पतियों से, भद्रता से, शांति से,
गौरव से, गरिमा से, स्मित से उसका आत्मीय राग
कहो तो, जाजाबोर!
कहां है वह लोक,
जहां चित्त भयग्रस्त नहीं
जहां बहती हो मुक्ति की मुक्त पवन मंद?
जब तक क्षुद्रता चलेगी इतराती-इठलाती
दीखेगा कवि विषण्ण
स्मृति में जीवित वह, जीवित उसकी रचनाएं चितचोर
धरती के स्वप्न में विचरता है
नाम उसका रवीन्द्रनाथ ठाकुर
विश्वव्रती विलक्षण जाजाबोर।
परिचय:
- डॉ. सुधीर सक्सेना। हिन्दी के वरिष्ठ कवि, लेखक, अनुवादक एवं पत्रकार। जन्म लखनऊ में। विज्ञान एवं पत्रकारिता में डिग्रियां, लोक प्रशासन एवं हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधियां तथा रूसी भाषा एवं ट्राइबल आर्ट्स एण्ड कल्चर में डिप्लोमा। आज़ादी की लड़ाई में आदिवासियों की शिरकत पर शोध कार्य पर पीएच.डी.।
- गद्य-पद्य के अनेक संकलन प्रकाशित।
- कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित।
- संप्रति ‘दुनिया इन दिनों’ पत्रिका के प्रधान संपादक।
- संपर्क: फ्लैट नं. 8, पॉकेट 8 बी, सेक्टर-4, डीडीए फ्लैट्स, रोहिणी, दिल्ली- 110084.
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