मीनू मसानी : खोये अवसरों की कहानी का नायक @ डॉ. सुधीर सक्सेना

• डॉ. सुधीर सक्सेना
हमारी समवयस्क पीढ़ी के कुछ ही लोगों को उनकी याद होगी, अन्यथा अधिकांश लोग उन्हें भूल चुके हैं। जिन लोगों के ज़ेहन में उनकी याद बची है, वह भी स्वतंत्र पार्टी से उनके रिश्तों के कारण। लोग बहुमुखी प्रतिभा के धनी मसानी को भूल चुके हैं, जबकि उनके संगठन कौशल का लोहा उनके विरोधी भी मानते थे। वे लोक नायक जयप्रकाश नारायण के साथ कांग्रेस समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य थे, बंबई के महापौर थे, संविधान-सभा और संसद के सदस्य थे। यही नहीं, वह आला दर्जे के वकील, प्रखर पत्रकार और बेहतरीन लेखक भी थे। भारत के संविधान के मसविदे से उनका गहरा रिश्ता रहा। वह नेहरू सरकार में खाद्य मंत्री रहे और ब्राजील में भारत के राजदूत भी। वे लहरों के खिलाफ तैरने के आदी थे और जोखिम उठाने में लासानी।
20 नवंबर, 1905 को बंबई में जनमें मीनू सरकारी अफसर और ख्यात लेखक सर रूस्तम मसानी के बेटे थे। पिता उन्हें ‘बड़ा आदमी’ बनाना चाहते थे। उन्होंने उसे कैथेड्रल स्कूल भेजा, जहां प्रिंसिपल थे मिस्टर सैवेज। ठेठ नाम के अनुरूप सख्त। स्कूल में सीनियरों की धौंसबाजी भी कम न थी। बहरहाल, वहां से वह भरड हाईस्कूल में गये और फिर एल्फिंस्टन कॉलेज में। मीनू बचपन में हर बात खोद-खोद कर पूछने के आदी थे। इस आदत से उन्हें साथी-संगाती और नाते-रिश्तदार ‘मिस्टर व्हाई’ कहकर बुलाने लगे। मीनू पढ़ाई से जी न चुराते थे। वह सीढ़ियां फलांगते गये। एक दिन उन्होंने स्वयं को लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स में पाया। यह प्रतिष्ठित संस्थान था और वहां पढ़े छात्रों को सम्मान से देखा जाता था। मीनू ने लंदन में वकालत की परीक्षा पास की और 1928 में भारत लौट आये।
मीनू विलायत से पढ़कर आये थे। पिता का अपना प्रभामंडल था। आला ब्रिटिश अफसरों से उनके रिश्ते थे। पिता रूस्तम मसानी उन चुनिंदा आरंभिक भारतीयों में एक थे, जो बंबई के म्युनिस्पल कमिश्नर बने थे। पुत्र यानि युवा मीनू की गतिविधियां उनसे छिपी न रह सकीं। पुत्र को पिता के नक्शे-पा चलना गवारा न था और पिता के लिये पुत्र की हुकूमत विरोधी सक्रियता नाकाबिले बर्दाश्त थी। पुत्र की समाजवादी रूझान पिता को पसन्द न थी। ये बातें पिता-पुत्र में अलगाव का कारण बनीं। लेकिन घर से बहिर्गमन बाद की बात है, मीनू लॉ-ग्रेजुएट होकर लंदन से लौटे तो उन्हें एफ. कोल्टमैन जैसी प्रतिष्ठित शख्सियत का सहयोगी बनकर काम करने का सुनहरा अवसर मिला।
मीनू भारत आए तो घटनाएं तेजी से घट रही थीं। आजादी की लड़ाई दिनों-दिन तेज होती जा रही थी। मुक्ति संग्राम का नेतृत्व अब गांधी के हाथों में था। मीनू इस पुकार को अनसुनी न कर सके। वे सविनय अवज्ञा आंदोलन में कूद पड़े। सन 1933 में हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें नासिक जेल में रखा गया, जहां जयप्रकाश नारायण, अशोक मेहता, अच्युत पटवर्धन और युसूफ मेहर अली सरीखे आजादी के मतवाले कैद थे। प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि यूसुफ मेहर मीनू के अभिन्न मित्र थे और नेहरू-दंपत्ति से उनके प्रगाढ़ रिश्ते थे। कालांतर में उन्होंने कहा भी कि जवाहरलाल हमेशा उनके प्रति दयालु रहे।
दिलचस्प तौर पर जवाहर और मीनू के बीच ज्यादा दिनों तक गाढ़ी छनी नहीं और राष्ट्रीय परिदृश्य में मीनू नेहरू के बरक्स प्रतिरोधी की मुद्रा में खड़े नजर आये। वस्तुत: नेहरू उनके प्रति सदा उदार रहे, लेकिन मीनू ने नेहरू की खिलाफत का कोई मौका नहीं छोड़ा। दरअसल दोनों का ‘मानस’ भिन्न था। मीनू पर एचजी वेल्स और जार्ज बर्नार्ड शा का जबरदस्त असर था। दोनों की नसीहतों से मीनू बुतशिकन (मूर्तिभंजक) बन गये थे। सन 1934 में मीनू जेल से बाहर आये तो उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का शुभारंभ किया। पं. नेहरू की शुभेच्छाएं उनके साथ थीं। पं. नेहरू और मसानी के बीच रिश्तों की डोर में कुछ प्रसंगों की अहम भूमिका है। मीनू मसानी सन 1927 में सोवियत संघ गये थे। उनका अभिभूत होना स्वाभाविक था। उन्होंने पं. नेहरू से सोवियत संघ जाने की गुजारिश की। नेहरू गये और मुग्ध हुये। स्तालिन काल में समाजवाद से मीनू का तो मोहभंग हो गया, लेकिन पं. नेहरू का मोह बरकरार रहा। कालांतर में मीनू पं. नेहरू के विरोधी बनकर उभरे और उन्होंने उनकी मुखालफत में कोई कोरकसर न उठा रखी।
मीनू के जेल से बाहर आने के बाद कई घटनाएं घटीं। पिता को संकटों से बचाने के लिए मीनू ने घर छोड़ दिया। वह ‘जन्मभूमि’ में बहुत कम तनख्वाह पर काम करने लगे। मिडिल टेंपल में लजीज दस्तरखान बीते दिनों की बात हुआ। ह्यूज रोड पर सेसिल रेस्त्रां में डबल-रोटी मक्खन पर दिन गुजारने पड़े। मुफलिसी के इन्हीं दिनों में उनकी किताब आई : ‘अवर इंडिया’। यह प्रकाशन में नये अध्याय का सूत्रपात था। ‘अवर इंडिया’ किसी इंडियन लेखक की पहली कृति थी, जिसकी एक लाख प्रतियां बिकीं। इससे जीवन का कुहासा छँटा। टाटा घराने से नौकरी का ऑफर मिला। जब भी उन्हें मोहलत मिलती, वह अपनी सेवायें टाटा घराने को देते। सन 1954 में वह जेआरडी टाटा के शेफ-दे-काबिने भी रहे। आजादी की लड़ाई में अलग-अलग विचारधाराओं के लोग गांधी को प्रभावित करने का यत्न करते रहे, किन्तु गांधी का असर व्यापक था। पूरा देश उनके पीछे चल पड़ा था। सन 1930 के दशक में मीनू को दस दिनों तक रोजाना महात्मा के साथ टहलने का सौभाग्य मिला। युवा मसानी पर महात्मा का जादू चल गया। सिविल नाफरमानी में शिरकत से इसकी तस्दीकी होती है। मसानी विचारों के ऊहांपोह से आजीवन मुक्त नहीं हो सके। सन 44 में उनकी किताब आई : ‘सोशलिज्म रिकंसीडर्ड’। मीनू चोला बदल चुके थे। अब वह समाजवाद के मुखर विरोधी थे। वह जेपी को भी समाजदवाद का आलोचक बनाने की फिराक और कोशिश करने में लगे हुए थे। स्तालिन-काल के स्याह पहलू को उजागर करती आर्थेर की स्टलर की कृति ‘डार्कनेस एट नून’ उन्होंने जेपी को भेजी। सच तो यह है कि मीनू का तटस्थता से कोई सरोकार न था। वह स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते थे। वह जंगजू थे और मानते थे कि अगर स्वतंत्रता एक बार गौण हो गई तो पतन की सीमा नहीं रहेगी। संविधान सभा में मसानी मौलिक अधिकारों की उपसमिति में थे। अपने कर्त्तव्यों और विषय की गंभीरता का उन्हें भान था। आंबेडकर, मसानी, हंसा मेहता, राजकुमारी अमृत कौर आदि विभिन्न धर्मावलंबियों समेत अनेक जन सभी भारतीयों के लिए साझा नागरिक संहिता के हिमायती थे, लेकिन यह प्रस्ताव सिरे नहीं चढ़ सका। संविधान-सभा में मीनू की मौजूदगी और भूमिका को लेकर पं. नेहरू अत्यंत सकारात्मक और उत्साही थे और इसका इजहार उन्होंने जेपी से किया भी था, लेकिन बाद में दोनों के दरम्यां फासला बढ़ता गया और मसानी नेहरू के मुखर विरोधी बनकर उभरे। लेखक-संपादक आरएम लाला के मुताबिक जिन चार लोगों के प्रति मीनू के मन में अथाह प्रशंसा का भाव था, वे थे: महात्मा गांधी, जेआरडी टाटा, सी. राजगोपालाचारी और जयप्रकाश नारायण। बताते हैं कि जेपी पर मसानी का काफी असर था। नेहरू और मसानी दो छोरों पर खड़े नजर आये, लेकिन मसानी के इकलौते बेटे जरीर ने नेहरू की बेटी इंदिरा की जीवनी तब लिखी थी, जब मीनू इमर्जेन्सी के दौरान सेंसरशिप के मुद्दे पर इंदिरा गांधी से जूझ रहे थे।
मसानी में अदभुत संगठन कौशल था। सन 1959 में राजाजी ने उनसे नवगठित स्वतंत्र पार्टी का महासचिव बनने का आग्रह किया। एक दशक में ही उन्होंने स्वतंत्र पार्टी को मुख्य विपक्षी दल बना दिया। बिहार, राजस्थान, गुजरात और उड़ीसा में पार्टी को खासी सफलता मिली। सन 67 के चुनाव में पार्टी के 44 सांसद चुने गये। लोकसभा में मीनू विपक्ष के नेता बने। सन 1971 में उन्होंने विपक्ष के साझा कार्यक्रम की असफल चेष्टा की। चुनाव में पराजित मीनू ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी असहमति को दरकिनार कर स्वतंत्र पार्टी को चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल में विलीन कर दिया गया। जेआरडी टाटा ने उन्हें पहले ही चेतावनी दी थी : “मीनू तुम्हारे साथ मुसीबत यह है कि तुम बेवकूफों को नहीं झेल सकते और राजनीति में उन्हें झेलना तो पड़ेगा।”
मीनू अध्ययनशील व्यक्ति थे। नासिक में गिरफ्तारी के आठ माह में उन्होंने करीब सौ किताबें पढ़ीं सन 60 के दशक में उन्होंने पत्रिका निकाली ‘फ्रीडम फर्स्ट।’ सन 1968 में जेआरडी टाटा के सहयोग से उन्होंने लेजली साहनी प्रोग्राम फॉर ट्रेनिंग इन डेमोक्रेसी प्रारंभ किया और अंतिम वर्षों में स्वयं को ‘मृत्यु का अधिकार’ अभियान में झोंक दिया। उन्होंने राष्ट्रीय महत्व के दो मुकदमे लड़े। बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ तो ननी पालकीवाला के साथ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इमर्जेंसी में उन्होंने फ्रीडम फर्स्ट’ के प्रूफ सेंसरशिप के लिए भेजने से इंकार कर दिया। बंबई हाईकोर्ट का फैसला उनके हक में गया। उन्होंने इंदिरा गांधी को जेपी को सहयोगी के तौर पर स्वीकार करने करने की सलाह मई, 1975 में दी थी। सलाह अनसुनी रही। इमर्जेंसी लगी।
सन 1980 के दशक में उन्होंने तीसरी शादी की। लेजली साहनी प्रोग्राम में बीस सालों में उनकी सहयोगी शीला सिंह उनकी आदर्श संगिनी सिद्ध हुई, अलबत्ता उनकी आयु मीनू से बहुत कम थी। उन्होंने मीनू की अथक सेवा की। बुढ़ापे में मीनू की बीनाई और स्मरण शक्ति बहुत कम हो गयी थी। वे अपने जीवन को ‘खोये अवसरों की कहानी’ मानने लगे थे। मीनू, जिसे किशोरवय में ही वर्सोवा में खतरनाक लहरों के खिलाफ तैरने की आदत पड़ गयी थी, पकी उम्र में बरसों असाध्य रोगों से जूझते रहे।
सन 1998 में सदी की अवसान काल में उन्होंने इस दुनिया से विदा ली।

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