सामयिकी: घर्षण छत्तीसगढ़ में, आँच केरल में @ डॉ. सुधीर सक्सेना

डेक्कन-डायरी
घर्षण छत्तीसगढ़ में, आँच केरल में
• डॉ. सुधीर सक्सेना
किस्सा क्रिया की प्रतिक्रिया का है। घर्षण छत्तीसगढ़ में हुआ और उसकी तीखी आंच महसूस की गयी वहां से सैकड़ों मील दूर धुर दक्षिण में स्थित केरल में। छत्तीसगढ़ में अगस्त के अंतिम सप्ताह में दो ईसाई ननों की गिरफ्तारी से केरल अशांत हो उठा। ईसाई समाज और धर्मगुरूओं में तीक्ष्ण प्रतिक्रिया को आश्यचर्यजनक और अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता, किंतु केरल में कांग्रेस या वाम ही नहीं, हिंदुत्व की ध्वजवाहक भारतीय जनता पार्टी के शिविर में भी गजब की हलचल हुई। केंद्रीय पेट्रोलियम राज्य मंत्री और केरल के इकलौते बीजेपी सांसद सुरेश गोपी जमानत पर रिहा नन के घर गये। सूबे के पार्टी अध्यक्ष ने बयान जारी किया और ईसाई बिरादरी की मनुहार के दृश्य देखने को मिले।
सवाल उठता है कि ये माज़रा क्या है? उससे भी बड़ा प्रश्न है कि ये माजरा क्यों है? जो हुआ उसका सबब क्या है? वाकया करीब दो जुम्मा पहले का है। हुआ यह कि छत्तीसगढ़ पुलिस ने 25 जुलाई को दुर्ग रेलवे स्टेशन पर केरल की दो ननों-वंदना फ्रांसिस और प्रीता मैरी को गिरफ्तार किया। उनके साथ नारायणपुर के आदिवासी युवक सुकमन मंडावी को भी बंदी बनाया गया। ये गिरफ्तारियां किन्हीं रवि निगम की एफआईआर और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के हंगामे के बाद हुईं। ननों पर आरोप लगाया गया कि वे तीन आदिवासियों को बलात या प्रलोभन से धर्मान्तरण के लिये आगरा ले जा रही हैं। यह इस्तेगासा संदेह और आशंका पर आधारित था, लेकिन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। गौरतलब है कि जिन तीन आदिवासी युवतियों को धर्मान्तरण के लिये ले जाने की बात कही गयी, उन्होंने धर्मांतरण के मुद्दे से लगातार इंकार किया। उन्होंने कहा कि वे अभिभावकों की अनुमति से ट्रेनिंग और रसोई में सहायिका के तौर पर रोजगार के लिए जा रही थीं। बहरहाल, पुलिस ने इन बातों पर गौर नहीं किया। बताया जाता है कि असीसी सिस्टर्स ऑफ मैरी इमैक्युलेट की इन ननों और उनके समर्थकों को बजरंग दल की ज्योति शर्मा नामक नेत्री ने डराया धमकाया। आदिवासी युवतियों से भी बयान बदलने को कहा गया, लेकिन वे अडिग रहीं। इस बीच यह खबर जंगल की आग की नाईं फैल गयी। केरल में ईसाई धर्मगुरूओं ने मोर्चा बांधा। कांग्रेस और वाम सांसद सक्रिय हुये। मामले को संसद में उठाने की कोशिश हुई। विफल रहने पर सांसदों का एक समूह 28 जुलाई को धरने पर बैठा। रायपुर में फादर सेबेस्टियन पूमट्टम की कोशिश बेकार रहीं। इधर केरल से सांसद जॉन ब्रिटास और जेबी मेथर दुर्ग पहुंचे। केरल में 29 जुलाई को त्रिशूर में आर्कबिशप के नेतृत्व में रैली निकली। गौरतलब है कि त्रिशूर इकलौते बीजेपी सांसद सुरेश गोपी का निर्वाचन क्षेत्र है। राजनीतिक समीकरणों के तहत बीजेपी की केरल ईकाई के अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर भी सक्रिय हुये। दिल्ली में सांसदों के एक समूह ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की। घड़ी की सुइयों के तेजी से घूमने के इस दौर में आश्चर्यजनक तौर पर सुरेश गोपी का कोई बयान सामने नहीं आया। मामला और पेचीदा तब हो गया जब 30 जुलाई को दुर्ग सेशन कोर्ट ने मामले से यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि मानव-तस्करी का यह मामला उसके न्याय की परिधि में नहीं आता, लिहाजा आरोपियों को एनआईए अदालत का रूख करना चाहिये। हाँ, दुर्ग केंद्रीय कारागार के अधिकारियों ने लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के आगंतुक सांसदों को आश्वासन जरूर दिया कि रूग्ण ननों को जिला चिकित्सालय में शिफ्ट कर दिया जायेगा। गौरतलब है कि केरल से एनके प्रेमचंद्रन, बिन्नी बेहनन, फ्रांसिस जार्ज, सप्तगिरि शंकर उलाका जैसे प्रतिष्ठित नेतागण 29 जुलाई को ही रायपुर पहुंच गये थे। उधर केरल में बयानों की बाढ़ आ गयी थी। चुनाव की पूर्व वेला में इसे ईसाई विरोधी कृत्य के रूप में देखा जा रहा था।
घटनाक्रम दर्शाता है कि केरल के सांसदों की सामूहिक सक्रियता और उससे बढ़कर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से भेंट रंग लाई। बिलासपुर स्थित एनआईए अदालत ने दो अगस्त को तीनों आरोपियों को जमानत पर रिहा कर दिया। आठ दिनों बाद डरी सहमी मलयाली ननों को जेल से छुट्टी मिली। छूटने पर उन्होंने दहशत में होने तथा बेवजह फंसाने की बात कही। दिलचस्प बात यह है कि ननों की गिरफ्तारी और रिहाई की दरम्यानी अवधि में सुरेश गोपी त्रिशूर में किसी भी स्थानीय कार्यक्रम में शरीक नहीं हुये। इस पर केरल स्टूडेंट्स यूनियन के जिला अध्यक्ष गोकुल गुरूवायूर ने त्रिशूर ईस्ट पुलिस में केन्द्रीय मंत्री गोपी के ‘गुमशुदा’ होने की शिकायत दर्ज करा दी। अंततोगत्वा गोपी तब प्रकट हुये, जब ननें रिहा होकर गृह नगर पहुंची। गोपी सुरेश और राजीव चंद्रशेखर दोनों ने ही केरल के सांसदों को शाह के आश्वासन का गुणगान किया और मोदी-शाह की शान में कसीदे काढ़े। जब ननों के परिजनों ने एफआईआर के खात्मे की मांग की तो गोपी सुरेश ने कहा कि मामला कानूनी है और न्यायालय के विचाराधीन है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय पर जब बजरंग दल को शह देने का आरोप लगा तो उन्होंने दो टूक कहा कि मामले के न्यायिक प्रक्रिया के अधीन होने से वह कुछ नहीं कर सकते।
ऐसा नहीं है कि प्रीति और वंदना की रिहाई के साथ ही बात आई गई हो गयी है। मानसून सत्र में यह घटना केरल में चुनाव तक सुलगती गीली लकड़ियों सी धुंआती रहेगी। आरएसएस केरल में पैठ को बेताब है, तो बीजेपी किला भेदने को। यह चुनावी गणित का ही प्रभाव है कि मंत्रीद्वय रोषी आगस्टीन और पी. राजीव तथा विधायक सनी जोसेफ कन्नूर में नन के घर गये। ईसाइयों को ‘माइनॉरटी विदिन माइनॉरिटीज’ की संज्ञा दी जाती है, लेकिन संपूर्ण भारत में एक छत्र राज को लालायित बीजेपी मिजोरम, नगालैंड, गोवा और केरल जैसे राज्यों में ईसाइयों की उपेक्षा नहीं कर सकती। केरल में ईसाइयों की आबादी करीब 18 प्रतिशत है। त्रिवेंद्रम, कोल्लम और अलेप्पी जैसे तटीय क्षेत्रों में वे बहुमत में है और कोट्टायम, इदुक्की, एर्णाकुलम, वायनाड, कोझीकोडे, कन्नूर आदि में उनकी सघन आबादी है। उनका रूख चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है। छत्तीसगढ़ में ननों की गिरफ्तारी के प्रसंग ने ईसाई मतदाताओं के मन में बीजेपी के प्रति खटास पैदा की है। बिशप गीवरगीज जैसे धर्मगुरू जब आरएसएस के एजेंडे की बात करते हैं, तो बेहद तल्ख होते हैं। ह्यूमन राइटस वाच, अल्पसंख्यक आयोग ओपेन डोर्स और आल इंडिया माइनारिटीज कौंसिल आदि की रिपोर्टें मंगलौर तथा अन्यत्र घटित घटनाएं, फादर स्टेंस तथा स्टेन स्वामी के हादसे और कतिपय उग्रपंथी हिंदु नेताओं के बयान उन्हें सशंक और भयभीत करते हैं। देश में यत्र-तत्र उन्हें प्रार्थना या असेंबली से रोकने और सामाजिक बहिष्कार के साथ-साथ उनके सदस्यों और प्रार्थना गृहों पर हमले की घटनाएं हुई हैं। सन 1971 में देश में उनकी आबादी 2.53 फीसद थी, जो सन 1991 में घटकर 2.43 और 2011 में 2.3 फीसद रह गयी। इसके बाबजूद बीजेपी को उनकी सापेक्ष महत्ता का आभास है। इसी का नतीजा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत वर्ष क्रिसमस पर अपने आवास पर समारोह आयोजित कर कार्डिनल ओसवाल्ड ग्रेसियस, आर्कबिशप अनिल कूटो, बिशप पालस्वरूप, रोबी कन्नम चिरा आदि को आमंत्रित कर प्रभु यीशु का गुणगान किया था। देखना होगा कि केरल में ईसाई मतदाता आगामी चुनाव में क्या रूख अख्तियार करते हैं, किंतु एक बड़े नेता की इस टिप्पणी ने उनकी मन:स्थिति का यह कहकर आभास दे दिया है कि बड़े दिन पर जब बीजेपी के कार्यकर्ता ईसाई बस्तियों में केक लेकर जायें तो उन्हें सवालों का सामना करना होगा।
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