मूर्ख दिवस को कब और कैसे मिली मान्यता? आइए जानते हैं..

मूर्खों के लिए प्रसन्नता और गौरव एक दिन लिए आरक्षित है। इस दिन अच्छे खासे समझदार और प्रतिभाशाली व्यक्ति भी मूर्ख बनने-बनाने में प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। पश्चिमी देशों में यह दिन होता है प्रथम अप्रैल को, जिसका सीधा अर्थ है, अन्य व्यक्तियों को मूर्ख बनाना। एक अप्रैल को मूर्खों के दिन रूप में मान्यता कब और कैसे मिली, इस बारे में विद्ववानों के कई मत हैं। इस दिन का संबंध पुराने कैलेण्डर से जोड़ते हैं, जब वर्ष का आरम्भ जनवरी के स्थान पर अप्रैल से होता था। बाद में जब कैलेण्डर में वैज्ञानिक आधार पर संशोधन किया गया और वर्ष को अप्रेल के स्थान पर प्रथम जनवरी से शुरू करने के आदेश दिए गए तो अनेक व्यक्तियों ने इस परिवर्तन का विरोध किया। चूंकि अंध विश्वासी व्यक्तियों का जोर प्रथम जनवरी के स्थान पर प्रथम अप्रेल पर था, इसलिए उनकी मूर्खता के साथ सहज में ही प्रथम अप्रैल जुड़ गया और वह कहलाया ‘प्रथम अप्रैल के मूर्ख।’ तभी से इस दिन को मूर्ख-दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। एक मान्यता यह है कि प्रथम अप्रैल को मूर्ख-दिवस के रूप में मनाने की परम्परा इटली से शुरू हुई। अधिकांश विद्वान मूर्ख-दिवस का प्रारम्भफ्रॉन्स से मानते हैं। वहां पर नववर्ष के आगमन की खुशी में उत्सव का आयोजन किया जाता था, जो सप्ताह भर चलता था। समारोह के अंत में गर्दभ-सम्मेलन होता, जिसमें लोग अपने चेहरों पर गधे के मुखौटे लगाते और अपने मुंह से गधे की आवाज निकालते। धीरे-धीरे इस प्रकार के उत्सव का आयोजन तो समाप्त हो गया, लेकिन प्रथम अप्रैल को एक दूसरे की खिल्ली उड़ाने और उन्हें मूर्ख बनाने की परम्परा फ्रांस में जारी रही। उसे ‘अप्रैल फिश’ (अप्रैल की मछली) कहा जाता।