समुद्र में डूबी द्वारिका के रहस्य से उठेगा पर्दा, शुरू हो रहा अभियान

नईदिल्ली। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) समुद्र में डूबी भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका और बेट द्वारका के तमाम रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए अब तक के सबसे बड़ा अभियान शुरू करने जा रहा है। अभियान मार्च में शुरू होने की संभावना है। इसका मकसद द्वारका के अवशेषों की खोज, उनका काल निर्धारण और पुरातात्विक तथा वैज्ञानिक अध्ययन करना है।

समुद्र की सतह पर बिखरे प्राचीन शहर की परत के नीचे के भी अवशेषों का उत्खनन कर जानकारी जुटाई जाएगी। इस अभियान में अरब सागर में समाहित द्वारका के 3.218 किमी चौड़े और 6.437 किमी लंबे क्षेत्र का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया जाएगा। एएसआई की ‘अंडरवाटर आर्कियोलॉजी विंग’ (यूएडब्ल्यू) के पुनर्गठन के बाद यह पहला बड़ा अभियान है। समुद्र में डूबी भगवान श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका और बेट द्वारका भारतीयों के लिए कौतूहल का विषय रहा है। समुद्र में विलुप्त शहर को लेकर करोड़ों लोगों की तमाम जिज्ञासाएं हैं। एएसआई की नई पहल और व्यापक क्षेत्र में अध्ययन से कई अनोखी जानकारी के सामने आने की उम्मीद है। भारत सरकार ने पिछले दिनों एएसआई के एडीजी (पुरातत्व) प्रो. आलोक त्रिपाठी के नेतृत्व में यूएडब्ल्यू का पुर्नगठन किया है। ताजा अभियान के बारे में प्रो. आलोक त्रिपाठी ने कहा कि यह सबसे बड़ा और व्यापक क्षेत्र में होगा। पांच पुरातत्वविदों की टीम ने पहले चरण में शुरुआती अध्ययन किया है। इसकी रिपोर्ट तैयार हो रही है।

मल्टीबीम सोनार, इकोसाउंडर जैसे उपकरणों का उपयोग

प्रो. आलोक त्रिपाठी के अनुसार, समुद्र के अंदर द्वारका के रहस्यों को जानने के लिए ‘मल्टीबीम सोनार’ और ‘इकोसाउंडर’ का उपयोग किया जाएगा। मल्टीबीम सोनार समुद्रतल की जानकारी और डेटा जुटाने का अत्याधुनिक उपकरण है। इसकी मदद से समुद्र की सतह का थ्रीडी चित्र भी तैयार किया जाएगा। द्वारका प्राचीन काल में व्यापार का केंद्र व बंदरगाह भी या था। अध्ययन में इस बारे में भी नई जानकारियां सामने आ सकती हैं।

एएसआई टीम को तल में काम करने का प्रशिक्षण मिलेगा

दूसरे चरण के पुरातात्विक अभियान को शुरू करने से पहले एएसआई की टीम को समुद्र तल में काम करने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। समुद्र तल पर पुरातात्विक काम करना मुश्किल व चुनौती पूर्ण होता है। काम करने की सीमाएं होती हैं, जिससे गति भी धीमी होती है। यू ए डब्ल्यू इसके लिए तैयारी कर रहा है। यूएडब्ल्यू में पहली बार काफी संख्या में महिला पुरातत्वविद भी शामिल हैं।

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