सुशासन के दावों को निगम के चेक ने किया बाउंस! ₹3000 की सहायता के लिए दर-दर भटक रहे शोकाकुल परिवार

बैंक काट रहा चार्ज, निगम लगवा रहा चक्कर, ‘श्रद्धांजलि योजना’ बनी परेशानी की वजह
एक तरफ लाखों दीपों की रोशनी में ‘सेवा संकल्प’, दूसरी तरफ सरकारी सहायता के लिए भटकते शोकाकुल परिवार
कोरबा 24 सितम्बर 2026। प्रदेश में सुशासन के दावों और सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े प्रचार के बीच नगर निगम कोरबा से सामने आई तस्वीर इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। जिला प्रशासन द्वारा हाल ही में लगभग एक लाख दीप प्रज्वलित कर ‘सेवा संकल्प अभियान’ की शुरुआत की गई, लेकिन उसी प्रशासनिक व्यवस्था के नीचे जरूरतमंद और शोकाकुल परिवारों को अपने हक की महज ₹3000 की सहायता राशि के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। हालात ऐसे हैं कि मृतक के परिवार को सहारा देने वाली ‘श्रद्धांजलि योजना’ अब खुद परिजनों के लिए परेशानी का सबब बनती दिखाई दे रही है।
सहायता देने निकला निगम, उल्टा परिवार की जेब पर पड़ा बोझ !
जिस योजना का उद्देश्य किसी परिवार में मृत्यु होने के बाद उसे तत्काल आर्थिक संबल देना है, उसी योजना के तहत जारी किए गए ₹3000 के चेक बाउंस होने की शिकायतें सामने आई हैं। इतना ही नहीं, शिकायतकर्ताओं के अनुसार चेक बाउंस होने के कारण बैंक द्वारा उनके खातों से शुल्क के रूप में अतिरिक्त राशि भी काटी जा रही है।
यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि संबंधित परिवार पहले ही अपने सदस्य की मौत के सदमे से गुजर रहा होता है। ऐसे में ₹3000 की सहायता पाने के बजाय उसे बैंक, नगर निगम और अधिकारियों के चक्कर काटने पड़ें तो यह व्यवस्था की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल है।
चेक जारी करने से पहले हस्ताक्षर तक नहीं जांचे गए ?
श्रद्धांजलि योजना के अंतर्गत नगर निगम क्षेत्र में निवास करने वाले परिवारों को परिजन की मृत्यु के बाद ₹3000 की सहायता राशि दिए जाने का प्रावधान है। लेकिन प्राप्त शिकायतों के मुताबिक निगम द्वारा जारी कुछ चेक बैंक में जमा होते ही वापस हो रहे हैं।

वार्ड क्रमांक 11 की निवासी धनकुंवर, पति स्वर्गीय पंचू लाल यादव का मामला इसी कथित अव्यवस्था की तस्वीर सामने रखता है। धनकुंवर के अनुसार पति के निधन के बाद उन्हें नगर निगम से ₹3000 का चेक मिला। उन्होंने चेक बैंक में जमा किया। अगले दिन बैंक पहुंचने पर उन्हें बताया गया कि चेक वापस आ गया है। बैंक मेमो में कथित तौर पर ‘सिग्नेचर मैच नहीं होना’ चेक वापसी का कारण बताया गया। धन कुंवर का कहना है कि वह पिछले तीन दिनों से निगम कार्यालय के चक्कर लगा रही हैं, लेकिन समस्या का समाधान होने के बजाय उन्हें बाउंस हुआ चेक ही वापस मिला। उनके अनुसार बैंक खाते से ₹300 अथवा ₹600 की राशि भी काटी गई है।

यानी एक ओर पति को खोने का दुख, दूसरी ओर आर्थिक सहायता के नाम पर बाउंस चेक और तीसरी ओर सरकारी कार्यालयों की दौड़। क्या यही संवेदनशील प्रशासन है ?
मां की मौत के बाद मिला चेक भी बाउंस, अब कलेक्टर कार्यालय जाने की सलाह!
वार्ड क्रमांक 5 निवासी सौरभ जेम्स ने भी इसी प्रकार की शिकायत की है। उनके अनुसार पिछले माह की 31 तारीख को उनकी माता जी का निधन हुआ था। नगर निगम द्वारा उन्हें ₹3000 का एक्सिस बैंक का चेक दिया गया। उन्होंने चेक अपने खाते में जमा किया, लेकिन चेक बाउंस होकर वापस आ गया। समस्या जानने के लिए जब वे एक्सिस बैंक पहुंचे तो उन्हें सेल्फ चेक लेकर आने की बात कही गई।

इसके बाद वे बाउंस हुआ चेक लेकर नगर निगम कार्यालय पहुंचे। सौरभ के अनुसार वहां उन्हें बताया गया कि सेल्फ चेक नहीं दिया जा सकता और इस संबंध में कलेक्टर कार्यालय में आवेदन करें।
सवाल फिर वही – मृतक के परिवार को ₹3000 की सहायता देने की जिम्मेदारी नगर निगम की है या परिवार को कार्यालय-दर-कार्यालय भटकाने की ?
एक नहीं, कई शिकायतों का दावा
मामला केवल दो परिवारों तक सीमित है या इससे ज्यादा व्यापक है, यह जांच का विषय है। लेकिन न्यूज एक्शन द्वारा कुछ पार्षदों से चर्चा किए जाने पर उन्होंने भी वार्डवासियों से इसी प्रकार की शिकायतें प्राप्त होने की बात कही। पार्षदों ने निगम द्वारा जारी चेक बाउंस होने को गंभीर विषय बताया और इस संबंध में नगर निगम आयुक्त से शिकायत किए जाने की जानकारी दी। पार्षदों के अनुसार उन्हें कार्रवाई का आश्वासन मिला है।
अब सवाल यह उठता है कि :
- कितने चेक जारी हुए?
- कितने चेक बाउंस हुए?
- कितने परिवारों को भुगतान नहीं मिला?
- बैंक शुल्क के रूप में कितनी राशि कटी?
- इस आर्थिक नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
- और सबसे बड़ा सवाल—जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
‘श्रद्धांजलि ’ योजना या ‘चक्कर लगाओ ’ योजना ?
सरकारी योजनाओं की सफलता का पैमाना बड़े आयोजनों और प्रचार अभियानों से नहीं, बल्कि जरूरत के समय लाभार्थी तक सहायता पहुंचने की गति और व्यवस्था से तय होता है। मृत्यु के बाद किसी परिवार को ₹3000 की सहायता देने वाली योजना में यदि भुगतान का चेक ही बाउंस हो जाए और परिवार को समाधान के लिए कई दिनों तक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें, तो व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जिस हाथ को संकट में सरकार का सहारा मिलना चाहिए था, उसी हाथ में बाउंस चेक थमा दिया जाए तो इससे बड़ा प्रशासनिक विरोधाभास क्या होगा?
दीपों की रोशनी बनाम दफ्तरों के अंधेरे में भटकते परिवार
पिछले सप्ताह जिला प्रशासन द्वारा लगभग एक लाख दीप प्रज्वलित कर सेवा संकल्प अभियान की शुरुआत की गई। उद्देश्य सेवा और संवेदनशीलता का संदेश देना था। लेकिन उसी समय यदि मृतकों के परिजन अपनी सहायता राशि के लिए नगर निगम के चक्कर काट रहे हैं, तो यह तस्वीर ‘दिया तले अंधेरा ’ वाली कहावत को चरितार्थ करती नजर आती है।
एक तरफ दीप जल रहे हैं, दूसरी तरफ शोकाकुल परिवारों की उम्मीद बुझ रही है
सुशासन का अर्थ केवल योजनाओं की घोषणा नहीं है। सुशासन तब दिखाई देता है जब किसी गरीब या जरूरतमंद परिवार को सरकारी सहायता पाने के लिए न तो बैंक के चक्कर लगाने पड़ें, न निगम के और न ही किसी दूसरे कार्यालय के।
अब निगम प्रशासन से चाहिए जवाब, सिर्फ आश्वासन नहीं
इन शिकायतों के बाद नगर निगम प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि श्रद्धांजलि योजना के तहत जारी चेक बाउंस होने के पीछे वास्तविक कारण क्या है। यदि तकनीकी अथवा बैंकिंग स्तर पर कोई त्रुटि हुई है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? प्रभावित परिवारों को उनकी सहायता राशि कब मिलेगी? चेक बाउंस होने पर खातों से काटी गई राशि की भरपाई कौन करेगा? और यदि लापरवाही हुई है तो संबंधित अधिकारी या कर्मचारी पर क्या कार्रवाई होगी?
शोकाकुल परिवारों को आश्वासन नहीं, उनकी सहायता राशि चाहिए। क्योंकि ₹3000 भले ही सरकारी खजाने के लिए छोटी रकम हो, लेकिन किसी जरूरतमंद परिवार के लिए संकट की घड़ी में यही रकम बड़ा सहारा हो सकती है।
अब गेंद नगर निगम प्रशासन के पाले में है—जवाब मिलेगा या फिर पीड़ित परिवारों को एक और चक्कर लगाना पड़ेगा ?
