आ गया मानसून @ डॉ. सुधीर सक्सेना

आ गया मानसून

डॉ. सुधीर सक्सेना

आ गया मानसून। मानसून आ गया है। करीब एक पखवाड़े की लुकाछिपी के बाद अंतत: मानसून आ गया। इतराते-इठलाते मेघ पाहुने आखिरकार नाज-नखरे के साथ प्रकट हुए। धरती पुलक से भीग गई। यह अनहोनी नहीं है। यह सदियों से चला आया चक्र है। अनहोनी तब होती है, जब चक्र खंडित होता है और बादल रूठ जाते हैं, धरती की त्वचा में पपड़ियाँ पड़ जाती हैं और जीव-जंतु तुषार्त और व्यग्र हो जाते हैं। बहरहाल, किंचित विलंब ही सही, धरती और धरती के प्राणियों की प्रतीक्षा के मोद से भरे बादल आए, बरसे और कृतकृत्य हुए।
किसी ने कहा, ‘अहा, बारिश आ गई।’ अंग्रेजीदाँ बोले, ‘इट्स रेनिंग।’ मेरे जर्मन-भाषी मित्र ने दूरभाष पर कहा, ‘एस रेग्नेट।’ तो मराठी माणूस चहका, ‘पाऊस आला।’ कोकणस्थ ने भी कहा, ‘हओ, पाउस आला।’ मेरी बंगालन सखी ने आसमान से हुई रस-वृष्टि में आपादमस्तक भीग जाने के बाद संदेशा भेजा, ‘बृष्टि एलो।’ फोन की घंटी घनघनाई! मस्क्वा से मेरे मित्र का प्रश्न था, ‘प्रिश्योल दोश्द?’ मैंने सानंद कहा—‘दा।’ दोस्त मेरे आनंद में शरीक हुआ।
मानसून आता है, तो लोगबाग खुश होते हैं। मानसून हमारा शब्द नहीं है, अलबत्ता अब पूरे मुल्क में चलन में है। हम भारतीयों ने इसे हृदय से अपना लिया है। यह हमारी सहृदयता का सरस प्रमाण है। अब यह पराया या अजनबी नहीं रहा। अरबी मूल का यह शब्द ब्रिटिश इंडिया में चलन में आया। बीती सदी के शुरू में लार्ड कर्जन ने कहा था कि इंडिया में फसल मानसून की बिसात पर खेला जाने वाला जुआ है। लार्ड कर्जन गए, उनके सजातीय गए, लेकिन मानसून का इंतजार तब भी था, आज भी है और कल भी रहेगा। यह मानसून की सनातन महत्ता है। वर्षा द्वैत के अद्वैत और अद्वैत के द्वैत में परिवर्तन का दश4न है। मानसून का आना इंतजार की घड़ियों का खत्म होना है। मानसून प्रतीक्षा के उपरांत मिलन के पर्याय का घोतक है। यह अनिर्वचनीय आनंद की मंगल-वेला है।
खानखाना कहते हैं—
दादुर, मोर, किसान मन, लग्यो रहै घन माहिं।
रहिमन चातक रटनि हूँ, सरवर को कोउ नाहिं॥
विज्ञान इसकी पुष्टि करता है कि मेंढक वर्षा ऋतु आने पर परम प्रसन्न होते हैं। पावस के आने पर मोर का नृत्य उनके उल्लास का परिचायक है। और किसान? वर्षा उसके लिए सर्वस्व है। वह उसी से निहाल होता है। एक और जीव है, जिसका पावस से विचित्र नाता है। वह है चातक। हिन्दी और संस्कृत वाङ्मय में चातक का जिÞक्र अनगिनत बार हुआ है।
मानसून का क्या अभिप्राय है? अरबी में मौसिम मौसम के लिये प्रयुक्त होता है। पुर्तगाली में यही मान्साओ है और डच भाषा में मॉनसन।
सागर से जमीन की ओर प्रवाहित नम हवाओं के लिये प्रयुक्त यह शब्द अब हमारा प्रिय और व्यवहृत शब्द है। दिशाएँ ऋतुनिष्ट होती हैं। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली गीली हवा वर्षा का निमित्त बनती है। जलागारों या स्रोतों से वाष्पीकृत बूँदें वाष्परूप में नहीं रहना चाहतीं, वे द्रवीभूत होना चाहती हैं। उनकी इसी नैसर्गिक चाहत की परिणति है वर्षा।
सौभाग्य देखिये कि भारत में अनुमानत: तीन-चार माह वर्षा होती है, किन्तु विश्व में सर्वाधिक वर्षा का कीर्तिमान भारत के नाम दर्ज है। चेरापूँजी को कौन नहीं जानता? सन 1860-61 में 26971 मि.मी. वर्षा से विश्व-कीर्तिमान स्थापित कर चुके चेरापूँजी को पूर्वी खासी पहाड़ियों में स्थित मवसिनराम ने इस गौरव से अपदस्थ कर दिया है। कुप्पीनुमा पहाड़ियों में स्थित मवसिनराम में ढाई सौ से तीन सौ दिन सालाना औसतन 467 इंच बारिश होती है। चेरापूँजी और मवसिनराम दोनों ही मेघालय में स्थित हैं। दुनिया में अटाकामा सबसे कम वर्षा का इलाका है, तो मेघालय अधिक वर्षा के मामले में अग्रणी। मेघ मेघालय में धारासार नहीं बरसेंगे तो और कहाँ बरसेंगे?
भारत 80 प्रतिशत से अधिक वर्षा के लिये मानसून का शुक्रगुजार है। मानसून की कृपा है तो भारत में श्री, सुषमा, अन्न-भंडार और सुख-चैन की व्याप्ति है।
भारत में साहित्य, कला और संस्कृति ऋतुओं से जुड़ी हुई हैं। वाल्मीकि-कालिदास से लेकर आधुनिक काल में नागार्जुन तक काव्य-रचना के लिये वर्षा से प्रेरित हुए। वैदिक ऋषि ने पर्जन्य की पिता के रूप में अभ्यर्थना की। आदिकवि वाल्मीकि ने मेघमाला को ऐसी सीढ़ी कहा, जिस पर चढ़कर कुटज और अर्जुन की माला से सूर्य की आराधना कर सकते हैं। ‘रामायण’ में वह लिखते हैं-

रज: प्रशान्त: स हिमोद्यवायु:, निदाघदोष: प्रसर: प्रशान्त:।
स्थिता हि यात्रा वसुधाधिपानां, प्रवासिनां च स्वदेशगमनम्॥

उन्होंने वर्षाजन्य स्थितियों का क्या ही सुंदर वर्णन किया। कविकुलगुरु कालिदास की तो कृति ही ‘मेघदूतम्’ है। ‘ऋतुसंहार’ में उन्हें वर्षा का आगमन ऐसा प्रतीत होता है, मानो पावस जल से भरे बादलों के मतवाले हाथी पर बैठकर, विद्युत्-पताका थामे, मेघों की गर्जना का मृदंग बजाते, राजाओं की भाँति ठाठ-बाट से आ गया हो।
कालिदास के यक्ष और अमरूक-शतक की नायिका की आशा का केन्द्र कोई और नहीं, बादल ही हैं। शूद्रक, भवभूति और जयदेव ने भी मेघों का बखान किया है। आधुनिक युग में निराला ‘अति घिर आए घन पावस के’ लिखते हैं, महादेवी वर्मा कहती हैं—’मैं नीर भरी दु:ख की बदली।’
माखनलाल चतुर्वेदी लिखते हैं- बदरिया थम-थम कर झर री!
सागर को मत भरे अभागन,
गागर को भर री!
नागार्जुन भी अमुल धवल गिरि के शिखरों पर बादल को घिरते देखते हैं। वीरेंद्र मिश्र कजरी को स्वर देने और वाणी को पानी का वर देने को बादल को अर्चना करते हैं। नजीर अकबराबादी बादलों को काव्य के अनुशासन में बांधते हैं। पंडित छन्नूलाल मिश्र गाते हैं?
सावन झर लागे ला धीरे-धीरे..
अकेली डर लागे ला धीरे धीरे। जब वह गाते है तो याद आती है तुलसी की पंक्तियां : घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा। पावस में मेरा कवि मन कहता है- साथ जब होती हो तुम /चाहते चाहते हैं बस/ कि दूर-दूर तलक/ न सायबान हो/ न दरख्त / न ओट/ न छज्जा/ बस, गजब की बारिश हो/ भीगते रहे हम आपादमस्तक/एक साथ सदियों तक।
सुनिये, पं. हृदयनाथ मंगेशकर का मराठी गीत – ती गेली तेव्हा रिमझीम पाऊस निनादत होता। मेघात मिसळली किरणे, हा सूर्य सोडवित होता। आप सुरों की बारिश में भीग जआगे।
यासिन कमाल की शुरू कीदो पंक्तियाँ हैं – बूँदे झर रही हैं, बारिश में भीगने का सुख ही अलग है। प्रिया के साथ भीगने का सुख ही अलग है। सर्वथा अनिर्वचनीय।
भारतीय फिल्मों में बारिश की बूंदें खूब भरी है और वर्षा के अनगिन दृश्य उभरे हैं। याद कीजिये प्यार हुआ, इकरार हुआ गीत या फिर इक लड़की भीगी भागी सी या ओ, सजना बर‌खा बहार आयी। ये सन 1960 के आसपास की फिल्में है जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात भी तभी का है। रिमझिम गिरे सावन, आज रपट जाये, लगी आज सावन की, टिप-टिप बरसा पानी, अबके सावन, बरसो रे मेघा बाद के हैं।
वर्षा- गीतों का यह श्रुति मधुर क्रम जारी रहेगा। आरती मुखर्जी का गाया बंगला गीत ‘वृष्टि, वृष्टि, वृष्टि! ए कोनो अपरूप सृष्टि!’/एतो मिष्टि मिष्टि मिष्टि, आमार हारिये गेले दृष्टि। मैंने लेखिका – गायिका अमृता बेरा के मुख से सुना और मंत्रमुग्ध हुआ। मराठी भी कहाँ पीछे है! गारवा (मिलिंद इंगळे), चिंब भिजलेले (शंकर महादेवन) या श्रावणमासी (स्वप्निल बांदोडकर) को सुनिये। या फिर सुनिये बालगीत’ ये रे ये रे पावसा तुला देतो पैसा पैसा/ पैसा झाला खोटा/ पाऊस आला मोठा। ये गीत आपको भीतर तक भीगो देंगे।
आप हैव यू एवर सीन द रेन अथवा रिदम आॅफ द रेन सुनिये या फिर पर्पल रेन या अंब्रेला। आप सुरों की बारिश में भीगेंगे और चाहेंगे कि भीगते रहे।
निश्चित ही वर्षा एक अनूठा सुख हैं; चाक्षुष भी, ऐंद्रिक भी। भाषायें और संगीत सुर- ताल उसे व्यक्त करने का माध्यम। मानसून हमारा अतिथि है। हम उसके आने की तिथि की आतुर प्रतीक्षा करते हैं। हम अच्छे आतिथेय हों। उसकी अगवानी और अभ्यर्थन करें। हम धरती पर अटाकामा होने से डरें। कोई पूछे : हैव यू सीन द रेन तो हमारा उत्तर स्वीकार में हो। हम वर्षा को भरबांह भेंटें। पावस भी कविता है। प्रकृति की अत्यंत सुंदर कविता। मानसून कितने भी दिनों के लिये क्यों न आये हम भूलें नहीं कि मानसून में जल नहीं, नेह बरसता है, अविरल-अविराम।

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