दतिया- उपचुनाव:अतीत, आँसू और अंतर्घात @ डॉ. सुधीर सक्सेना

दतिया- उपचुनाव
अतीत, आँसू और अंतर्घात
• डॉ. सुधीर सक्सेना
प्रचलित कहावत है कि झांसी गले की फांसी, दतिया गले का हार, मगर सामयिक चुनावी परिप्रेक्ष्य में बात करें तो दतिया भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिये यकसां गले की ऐसी फांस बनकर उभरा है, जिससे उनकी निजात मुश्किल है। मतदान यूं तो 30 जुलाई को है, अलबत्ता इस पूरे पखवाड़े दोनों ही खेमों में आशंकाएं खुदबुदाती रहेंगी।
घटनाक्रम ऐसा रहा है कि दतिया में सब कुछ सामान्य नहीं है। लिहाजा यह चुनाव भी फकत एक उप-चुनाव न रहकर महत्वपूर्ण हो उठा है। इसके दिल्ली और भोपाल समेत सबके आकर्षण और दिलचस्पी की वजह है मध्यप्रदेश के पूर्व गृहमंत्री और पार्टी के महत्वाकांक्षी कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा। नरोत्तम करीब डेढ़ दशक प्रदेश के मंत्री रहे और अपनी अनेक खूबियों के कारण सुर्खियों में भी। नरोत्तम ने बहुत जतन से दतिया में अपनी जगह बनाई और उसे अपनी जागीर में बदल दिया। उन्होंने नामा और नाम कमाया, कुर्सी पाई, शीर्ष नेतृत्व का विश्वास अर्जित किया। साथ ही दंभ और अहंकार के साथ-साथ बेजा अड़ी की फितरत भी अख्तियार की। अपनी बयानबाजी, साधनों की विपुलता और तेज रफ्तार से वह एक साथ विवादों और संभावनाओं के नायक बने। निर्वाचन से सत्तारूढ़ कमलनाथ सरकार को गिराने में उनकी पर्दे के पीछे अहम भूमिका रही। उन्होंने मप्र में कांग्रेस को कार्यकर्ताविहीन करने की दंभोक्ति भी की और सेंसरबोर्ड के स्वयंभू सदस्य तथा सामाजिक दरोगा बनकर उभरे। उन्होंने दतिया में पैर जमाये और दिल्ली को साधा। कह सकते हैं कि प्रदेश में दंत कथाओं के नायक बन गये। एक वक्त वह था कि वह मध्यप्रदेश के गृहमंत्री थे और उनके दामाद राजधानी भोपाल के कलेक्टर। विगत चुनाव तक उनकी सूबे की सियासत में तूती बोलती रही और उनका यही पक्ष कतिपय बड़े नेताओं को बरबस खटकने लगे। पार्श्व में समीकरण बने और केंद्रीय गृहमंत्री के प्रिय पात्र होने के बाबजूद पार्टी ने टिकट वितरण में नरोत्तम को धता बता दी। बताते हैं कि इसमें स्पीकर नरेन्द्र सिंह तोमर, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत कतिपय दमदार नेताओं, सर्वे-रिपोर्ट और पर्दे के पीछे के सूत्रधार-संगठन की अहम भूमिका रही। फलत: दतिया से आरएसएस की पृष्ठभूमि के एक स्थानीय अल्पज्ञात नेता आशुतोष तिवारी को प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। नरोत्तम और उनके समर्थकों के लिये यह ऐलान वज्रपात से कम न था, अत: दतिया में भूचाल आ गया। समर्थकों ने उग्र प्रदर्शन किया और राजमार्ग पर यातायात बाधित। प्रशासन को लाठीचार्ज और आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा। दिल्ली की भृकुटि में बल पड़े। ‘सबोटाज’ की आशंका गहन हुई। नरोत्तम दिल्ली और भोपाल में तलब हुये। दतिया में बीजेपी के जिलाध्यक्ष और अनेक पदाधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया। घड़ी की सुइयां घूमीं और अंतत: नरोत्तम ने दतिया की आमसभा में आशुतोष तिवारी को विजयी बनाने के लिये ‘दरवज्जे-दरवज्जे’ जाकर वोट मांगने की दुहाई देनी पड़ी। उन्होंने यह किया जरूर, मगर उनकी आह और मन की आहत अवस्था किसी से छिपी नहीं रह सकी। लोगों ने करनी और भरनी की कहावत दोहराई और भार्गव समाज के सदस्य के कारावास और तिवारी-परिवार के पिता-पुत्र के हादसे की कथा याद दिलाते हुये उनके कृत्यों को इस सबक से जोड़ा।
‘ये आंसू मेरे दिल की जुबान हैं’ की तर्ज पर यह आकलन मुश्किल है कि नरोत्तम आशुतोष के लिये कितनी ईमानदारी से काम करेंगे, किंतु यह तय है कि इस चुनाव में दादा के आंसू परोक्ष भूमिका अवश्य निभायेंगे। ब्राह्मण समुदाय की उपेक्षा का मुद्दा भी हवा में तैर रहा है। आशुतोष यद्यपि ब्राह्मण हैं, किंतु ब्राह्मण-समाज में उनकी गहरी पैठ नहीं है। यदि ब्राह्मणों की उपेक्षा के मुद्दे ने जमीन पकड़ी तो खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है। कांग्रेस ने यहां से दतिया राजघराने के अनुभवी पूर्व एमएलए घनश्याम सिंह पर दाँव लगाया है, जो सरल स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों की दिक्कत यह है कि दतियामें लड़ाई आमने-सामने की अथवा सीधी नहीं, बल्कि त्रिकोणीय है। आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव के मैदान में होने से संघर्ष तिकोना हो गया है। दामोदर पिछले कई माह से गांव-गांव का दौरा कर चुनाव की सघन तैयारी करते आ रहे हैं और उनकी चुनौती को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। प्रदेश के मुख्यमंत्री का सजातीय होना कई दिलचस्प कयासों को जन्म दे रहा है।

दतिया विधानसभा क्षेत्र के समीकरणों पर गौर करें तो किसी भी प्रमुख प्रत्याशी की राह निष्कंटक नहीं है। दतिया में यह उप चुनाव बाधा-दौड़ सरीखा है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों को ही अंतर्घात का डर है। बीजेपी जहां नरोत्तम फैक्टर से आशंकित है, वहीं कांग्रेस भी असंतोष से मुक्त नहीं है। कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता अवधेश नायक की भूमिका को लेकर है। अवधेश उभरते हुये स्थानीय युवा नेता हैं और कांग्रेस के टिकट के दावेदार थे। उनके बजाय घनश्याम को टिकट थमाने से वह खिन्न हैं। पिछले चुनाव में उनके बजाय राजेंद्र भारती को टिकट मिली थी और दिग्विजय सिंह के कहने पर अवधेश टिकट वंचित रहे थे। इस बार भी दिग्विजय ने उनके आरएसएस से ‘लिंक’ की बिना पर उन्हें उम्मीदवार नहीं बनने दिया। बहरहाल, अवधेश की नाराजगी इतनी मायने रखती है कि दिग्विजय सिंह ने दतिया में भरी सभा में अवधेश से ‘माफी’ मांगी। अवधेश ने दिग्गी राजा की इस सार्वजनिक क्षमायाचना को राजा साहब का ‘बड़प्पन’ करार दिया। किंतु अभी तक इसका संकेत नहीं दिया है कि इस चुनाव में वह किसी का साथ देंगे अथवा निष्क्रिय नहीं रहेंगे?

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