वेनेजुएला के बाद क्या क्यूबा की बारी है….@ डॉ. सुधीर सक्सेना

विश्व-रंग
वेनेजुएला के बाद क्या क्यूबा की बारी है
• डॉ. सुधीर सक्सेना
”अमेरिका की आँखों में
मिर्ची सा लगता है
हवाना के सिगार का धुआँ”
(लंबी कविता ‘बीसवीं सदी इक्कीसवीं सदी से’)
यह आज की बात नहीं है, बल्कि बीती कई दहाइयों से अमेरिका के लिये बुकनी सा कष्टप्रद यह सिलसिला जारी है। दरअसल यह तकलीफदेह क्रम सन 1959 में फिदेल कास्त्रो के कू-दे-ता के जरिये सत्ता में आने के ऐन दिन से शुरू हो गया था। फिदेल को अपदस्थ करने अथवा मारने की सीआईए की सारी कोशिशें विफल रहीं। अमेरिका उनकी मुश्कें नहीं कस सका। उलटे फिदेल वैश्विक नेता के तौर पर उभरते गये और उन्होंने दुनिया भर के मुक्तिकामी जनों को आकर्षित किया। श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में भारत और क्यूबा के संबंधों को नयी ऊंचाई और सान्द्रता मिली। शीतयुद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ के विघटन के बाद क्यूबा को मुसीबतों से दो-चार होना पड़ा। रही सही कसर अमेरिका की आर्थिक पाबंदियों ने पूरी कर दी। जारी वर्ष के प्रारंभ में वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो के निर्लज्ज अपहरण से अनेक छोटे और निर्बल राष्ट्र सकते में आ गये। यूं तो ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के अभीष्ट की पूर्ति के लिये ही अमेरिका ने इस्रायल के सहयोग से 28 फरवरी को ईरान पर धावा बोला था और उसे अली खामेनेई समेत अनेक बड़े ईरानी नेताओं को मारने में कामयाबी भी मिली, अलबत्ता उसकी मंशा पूरी नहीं हुई। अब यह सवाल सारी दुनिया में खतरे की घंटी की मानिंद घनघना रहा है कि क्या वेनेजुएला और ईरान के बाद अब बारी क्यूबा की है? इस प्रश्न का उत्तर तलाशना कठिन इसलिये नहीं है क्योंकि जिद्दी और अड़ियल डोनाल्ड ट्रंप अपनी खब्त में कुछ भी कर सकते हैं। दूसरे सीआईए के डायरेक्टर जॉन रैटक्लिफ के 14 मई को हवाना की यात्रा और खुलेआम अंतिमेत्थम ने अमेरिका-क्यूबा के कसैले संबंधों मंह इजाफा कर एक करोड़ से कुछ अधिक क्यूबावासियों की रगों में सिहरन पैदा कर दी है।
आज नहीं, अर्से से क्यूबा के नसीब में चैन नहीं है और अमेरिकी धौंस, दबंगई और दादागिरी से उसकी मुसीबतों की गठरी भारी होती जा रही है। राजधानी हवाना समेत पूरा क्यूबा अंधेरे में डूबा हुआ है। क्यूबा अभूतपूर्व ऊर्जा संकट से गुजर रहा है। डीजल और पेट्रोल का भंडार खत्म हो गया है। उसका अपना तेलशोधक संयंत्र फरवरी में आग की भेंट चढ़ गया। तेल की आपूर्ति के लिये उसका मुख्य आलंबन वेनेजुएला था, मगर अब वेनेजुएला अमेरिका का बंधक राष्ट्र है। ऊर्जा संकट का असर, शिक्षा, आहार, चिकित्सा आदि की प्रणालियों पर भी पड़ रहा है। हालत यह है कि राजधानी हवाना में नागरिकों को बाईस-बाईस घंटे ब्लैक आउट का सामना करना पड़ रहा है स्वास्थ्य सेवाएं ठप्प हैं और लोगों को खाना पकाने के लाले पड़ गये हैं। फलत: असंतोष गहरा रहा है और मुसीबतज़दा लोग सड़कों पर उतर रहे हैं।
क्यूबा के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो बीते करीब पांच शतियों में उसके संघर्ष की तस्वीर उभरती है। 20 अक्टूबर, सन 1492 को कोलंबस की खोज के बाद यह कैरेबियन-द्वीप समूह स्पेन का उपनिवेश रहा। सन 1868 में इसने स्वतंत्रता की घोषणा की और सन 1895 में आजादी की लड़ाई छेड़ी। सन 1898 में उसे मान्यता तो मिली, लेकिन वह अमेरिका के चंगुल में फँस गया। इसका अंत अंतत: मई, 1902 में हुआ, जब वह गणतंत्र बना। लेकिन यह सौभाग्य भी अधिक दिन टिका नहीं। सन 1933 में कूदेता से बातिस्ता सत्ता में आये और करीब पाव सदी क्यूबा ने उनकी तानाशाही झेली। इससे उसे आखिरकार सन 1959 में फिदेल कास्त्रों ने मुक्ति दिलाई। फिदेल अपनी पॉलिसी से अमेरिका की आँखों की सबसे कर्री किरकिरी बनकर उभरे। अमेरिका ने उन्हें हटाने और निपटाने के लाख जतन किये, लेकिन उसकी दाल नहीं गली। फिदेल दशक-दर-दशक उसकी छाती पर मूंग दलते रहे। उन्होंने महाबली अमेरिका की नाक तले कम्युनिस्ट रिजीम खड़ी कर दी। सन 1962 का मिसाइल प्रसंग दुनिया भूली नहीं है। यह शीत युद्ध का चरम प्रसंग था। बहरहाल, कास्त्रों ने शिक्षा, चिकित्सा और आवास पर खूब ध्यान दिया। मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सस्ते मकानों से उन्होंने क्यूबा का हुलिया बदल दिया। उन्होंने अफ्रीकी देशों व अन्यत्र डॉक्टरों की टोलियां भेजीं और दुनिया में अमेरिकी शिकंजे को तोड़ने का भरसक प्रयास किया। फलत: विश्व में मुक्ति कामी का जनता का यह लाड़ला नायक अमेरिका के लिये ‘मोस्ट वांटेड’ और खलनायक हो गया। उसके कृत्यों में सोवियत संघ उसका सरपरस्त और सहयोगी रहा। आज भी रूस और चीन उसके सहयोगी राष्ट्र हैं। रूस ने इसी साल 30 मार्च को एक लाख टन कच्चा तेल भेजा और चीन ने 80 मिलियन डॉलर की मदद और 60 हजार टन चांवल देने का ऐलान किया। इसी क्रम में कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद ने आठ मिलियन और फिर साढ़े पांच मिलियन डॉलर की मदद की घोषणा की।
क्यूबा के खिलाफ वाशिंगटन के दबाव के चलते लातिनी अमेरिकी देशों में क्यूबा से कन्नी काटने का दायरा बढ़ता जा रहा है। मेक्सिको की क्लाडिया शीनबाम क्यूबा समर्थक हैं, लेकिन फरवरी में तेल से लदे दो पोत भेजन के पश्चात उन्होंने ट्रंप की नाराजगी के भय से क्यूबा को मदद से हाथ खींच लिये हैं। अर्जेंटिना के राष्ट्रपति जेवियर मिलेई अमेरिका के समर्थन में हैं, तो ब्राजील के लूला डि’सिल्वा असमंजस में। चीले के गैब्रियल बोरिस ने क्यूबा पर पाबंदी को आपराधिक करार दिया था, लेकिन नये राष्ट्राध्यक्ष जोस अंतोनिया ने दो टूक कह दिया है कि क्यूबा को मदद से वहां तानाशाही के पाये मजबूत होंगे। अमेरिकी दबाव का असर अन्यत्र भी हो रहा है। निकारागुआ ने क्यूबनों के लिए वीजा फ्री एंट्री बंद कर दी है, तो ग्वाटेमाला ने क्यूबा की मेडिकल ब्रिगेडों की चरणबद्ध वापसी का कदम उठाया है। इसी क्रम में इक्बेडोर ने क्यूबा के राजदूत वसीलो गुटीरेज को देश निकाला दे दिया है। ट्रिनिडाड-टोबैगो की कमला प्रसाद बिसेसर ने मानवीय सहायता की बात करते हुये पुछल्ला जोड़ दिया है कि वह तानाशाही का समर्थन नहीं कर सकतीं। योरोपीय राष्ट्र पुर्तगाल ने तो दो कदम आगे बढ़कर क्यूबा में टूरिस्ट-ऑपरेशंस बंद कर दिये हैं।
किस्सा कोताह यह है कि क्यूबा की मुसीबतों का अंत नहीं है। कास्त्रो-काल के वैश्विक समीकरण बदल चुके हैं। अमेरिका और क्यूबा के दरम्यां अतीत त्रिभंगी मुद्रा में खड़ा है। अमेरिका निकारागुआ और बोलीविया में विद्रोह को समर्थन और कांगो, इथियोपिया, अंगोला, , मोजंबीक, गीनिया बिसाऊ, यमन, अल्जीरिया, इराक और सीरिया के मामलों में क्यूबा के दखल को भूला नहीं है। उसे सन 1959 का पनामा-प्रसंग भी याद है, जब क्यूबा ने तख्ता पलट के प्रयासों में मुंह की खाई थी। दिलचस्प बात है कि क्यूबा ने तख्ता पलट में मुंह की खाने के बाद भी अमेरिका को मुंह बिराना नहीं छोड़ा।
ये ही वे प्रसंग हैं, जिन्होंने आज नव उपनिवेशवादी अमेरिका की भृकुटि में बल डाल रखे हैं। व्हाइट हाउस आज हवाना से पुराना हिसाब चुकता करने के मूड में है। वह गड़े मुर्दे उखाड़ते हुये सन 1996 के चार विमानों के शूट आउट प्रसंग में तत्कालीन रक्षा मंत्री रऊल कास्त्रो पर अभियोजन के पक्ष में है। रऊल अब 94 वर्ष के हो चुके हैं, लेकिन अमेरिका उनके खिलाफ मुकदमे पर अड़ा हुआ है। क्यूबा भी अमेरिका की मंशा को भाँप रहा है, लिहाजा उसने अपना लहजा नरम कर दिया है। राष्ट्रपति मिगुएल डाएज कैनेल अमेरिकी कार्रवाई को समाज को व्यथित और बंधक बनाने तथा तख्तापलट की कोशिश मानते हुए ‘जीनोसाइड’ करार देते हैं, लेकिन अब वह नि:शर्त बातचीत के लिए तत्पर दीखते हैं। इसी मार्च में उन्होंने 51 राजनीतिक कैदियों की रिहाई भी की है। उधर रैटक्लिफ ने आर्थिक व सुरक्षा के मुद्दों पर ट्रंप की नीति से हवाना को अवगत कर दिया है। क्यूबन-अमेरिकी मूल के मार्को रूबियो ने कहा है कि क्यूबा ने 100 मिलियन डॉलर की अमेरिका की मानवीय सहायता ठुकरा दी है, तो क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिगज पर्रीला ने कहा कि अमेरिका ने ऐसी किसी मदद की पेशकश ही नहीं की।
क्यूबा में अमेरिका की नीयत का पता कतिपय सीनेटरों के बयानों से लगता है। सीनेटर रिक स्कॉट कहते हैं कि क्यूबा में लोकतंत्र की वेला आ गई है, तो लिंडसे ग्राहम कहते हैं कि क्यूबा में वर्तमान सत्ता के दिन इनेगिने हैं। जॉन थूने आक्रमण की पैरवी तो नहीं करते, किंतु ‘सरकार गिरी तो खुश होगी’ कहकर मंशा दर्शा देते हैं। क्यूबन-अमेरिकी मूल के टेड क्रूज ने तो फरवरी में ही कह दिया था कि आगामी छमाही में वेनेजुएला, ईरान और क्यूबा में सत्ता परिवर्तन होगा। क्यूबा के अर्नेस्टो सोबेरान गजमान और लिआनिस टोर्रेस रिवेरा जैसे राजनयिक भले ही मुट्ठियां बांधकर संघर्ष का दम भरें, लेकिन सब जानते हैं कि अमेरिका से रण में मुकाबला कठिन होगा। यूएनओ के महासचिव गुटरेज नाकेबंदी की निंदा करते हुए भी स्वयं को असहाय पाते हैं। अमेरिका रऊल कास्त्रो के पौत्र रऊल गुलिर्मो रोडिग्रेज कास्त्रो पर दांव लगा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप क्यूबा के मैत्रीपूर्ण अधिग्रहण की बात करते हैं तो साफ हो जाता है कि देगची में क्या पक रहा है? बेलोरूस, ईरान, वियेतनाम और अफ्रीक यूनियन भले ही क्यूबा के साथ हो, लेकिन ट्रप का विश्व-जनमत से प्रभावित होना मुमकिन नहीं दीखता। बहुत संभव है कि ईरान का मोर्चा ठंडा पड़ते ही वह वेनेजुएला की तर्ज पर क्यूबा का टेंटुआ दबोच लें।
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