लॉ छात्रों की अटेंडेंस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कम उपस्थिति वालों को परीक्षा में बैठाने पर दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर रोक

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों की अनिवार्य उपस्थिति को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए Delhi High Court के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को कम उपस्थिति वाले छात्रों को परीक्षा में बैठने से रोकने पर प्रतिबंध लगाया गया था. शीर्ष अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों सहित कई संस्थान इस फैसले से प्रभावित हो रहे हैं और शैक्षणिक अनुशासन बनाए रखना बेहद जरूरी है.
न्यायमूर्ति Vikram Nath और न्यायमूर्ति Sandeep Mehta की पीठ ने स्पष्ट किया कि उसका यह आदेश भविष्य में लागू होगा. अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई तय की है. यह आदेश उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया गया जिनमें Bar Council of India यानी बीसीआई की याचिका भी शामिल है. बीसीआई देश में कानूनी शिक्षा को नियंत्रित करने वाली शीर्ष संस्था है.
बीसीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट के नवंबर 2025 के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि केवल उपस्थिति कम होने के आधार पर छात्रों को परीक्षा देने से नहीं रोका जा सकता. इस फैसले के बाद कई छात्र अदालतों में याचिकाएं दाखिल कर परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगने लगे थे.
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि यदि छात्र कक्षाओं में ही उपस्थित नहीं होंगे तो शिक्षकों और विश्वविद्यालयों की भूमिका क्या रह जाएगी. अदालत ने कहा कि सभी नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज इस स्थिति से प्रभावित हो रही हैं. पीठ ने सवाल किया, “अगर छात्र अनिवार्य उपस्थिति नहीं चाहते तो उन्होंने दाखिला ही क्यों लिया?”
अदालत ने बीसीआई अध्यक्ष Manan Kumar Mishra से यह भी पूछा कि हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने में लगभग छह महीने का समय क्यों लगा. वहीं Narsee Monjee Institute of Management Studies की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता Mukul Rohatgi ने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला छात्रों को कक्षाएं छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करता है और इसे तुरंत रोका जाना चाहिए.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को छात्र “फ्री पास” की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. अदालत ने कहा कि फैसले ने छात्रों को कक्षाओं में जाने से नहीं रोका, लेकिन व्यवहारिक रूप से इसका गलत संदेश जा रहा है.
यह पूरा मामला 2016 में तीसरे वर्ष के लॉ छात्र सुशांत रोहिल्ला की आत्महत्या से जुड़ा है. आरोप था कि आवश्यक उपस्थिति पूरी नहीं होने के कारण उसे सेमेस्टर परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया था. इस घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था और बाद में मामला दिल्ली हाईकोर्ट को स्थानांतरित कर दिया गया था.
