अखरापाली सहित 12 उपार्जन केंद्रों में उठाव के लिए बाकी है 7500 क्विंटल धान

समय पर शत-प्रतिशत उठाव का प्रशासन का दावा फेल

कोरबा 08 अपै्रल। 15 नवंबर से जिले में शुरू हुई धान खरीदी का काम सरकार की नीति के तहत 31 जनवरी को यूं तो पूर्ण हो गया लेकिन फरवरी में प्रथम सप्ताह में दो दिन इसकी सीमा बढ़ाई गई। इसके बाद और कोई मौके नहीं दिए गए। जिले में 30 लाख मिट्रिक टन धान की खरीदी इस वर्ष हुई। उठाव की समस्या अब भी बनी हुई है। प्रशासन के वे दावे इस मामले में फेल हो गए, जिनमें कहा गया था कि तय सीमा में शत्-प्रतिशत धान का उठाव करा लिया जाएगा। वास्तविकता यह है कि अभी भी अखरापाली और कोरबी सहित 12 खरीदी केंद्रों में 7500 क्विंटल धान उठने की प्रतीक्षा कर रही है।

जानकारी अनुसार अखरापाली में 61762.4 क्विंटल धान की खरीदी हुई थी। इसके विरूद्ध अभी भी 3840 क्विंटल धान का उठाव नहीं हो सका है। इसी तरह कोरबी पोड़ी उपरोड़ा में 1440 क्विंटल धान का उठाव बाकी है। यहां पर 71 हजार 137.4 क्विंटल की मात्रा उपार्जित हुई थी। पसान केंद्र में 43259.2 क्विंटल धान की खरीदी हुई और मौजूद स्थिति में 640 क्विंटल की मात्रा का उठाव नहीं हो सका है। छुरीकला में मौजूदा स्थिति में 280 क्विंटल, बेहरचुआं केंद्र में 210 क्विंटल, सिरमिना में 209.2 क्विंटल धान का उठाव लंबा समय गुजरने के बाद भी नहीं हो सका है। करतला समिति के केरवाद्वारी में 190 क्विंटल धान का उठाव कब होगा इसके लिए यहां के कर्मी प्रतीक्षा कर रहे हैं। श्यांग उपार्जन केंद्र में 160 क्विंटल, बोइदा में 138, मोरगा में 60, पोड़ी और नोनबिर्रा में 40-40 क्विंटल धान की मात्रा अभी भी राइस मिलर्स के लोगों के आने की प्रतीक्षा कर रही है कि वे वाहन के साथ यहां पहुंचे और धान को ले जाएं। समितियों की चिंता इस बात को लेकर है कि उठाव के मामले में विलंब होने से अंतिम मिलान से लेकर प्रोत्साहन राशि लटकेगी और ऐसे में खर्चों का भुगतान करना मुश्किल होगा।

वर्तमान स्थिति में सीजन में काम करने वाले श्रमिकों को पारिश्रमिक देना है, वहीं समिति के दूसरे खर्चे भी हैं जिसकी व्यवस्था का पूरा दारोमदार इसी राशि पर टिका हुआ है। याद रहे खरीदी सीजन की शुरुआत से पहले ही प्रशासन ने त्रिस्तरीय व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों और सहयोगियों की बैठक ली थी। इसमें दावे किए गए थे कि खरीदी के साथ अब उठाव कराने को प्राथमिकता देंगे। पूरे मामले में मार्कफेड का लचर रवैया सामने आया। उठाव के लिए अनुबंध करने वाले मिलर्स ने डीएमओ की एक नहीं सुनी और मनमानी जारी रखी।

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