होर्मुज की किरकिरी और ट्रंप का पसोपेश @ डॉ. सुधीर सक्सेना

इस्रायल- अमेरिका बनाम ईरान

• डॉ. सुधीर सक्सेना
ऐसा लगता है कि सब कुछ जेम्स हेडली चेज के उपन्यास के शीर्षक की तर्ज पर हुआ और डोनाल्ड ट्रंप और बेन्जामिन नेतन्याहू की जुगल-जोड़ी के साथ ‘आ-बला, पकड़ गला’ की उक्ति चरितार्थ हो गयी। एक माह बीत चुका है, लेकिन वर्षों से पाबंदियां झेल रहे ईरान के कस बल ढीले नहीं पड़ रहे हैं। उसने होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी कर रखी है और इस्राइल के फौजी और नागरिक ठिकानों पर रोजाना दस बैलिस्टिक मिसाइलें दाग रहा है। एक अप्रैल को बेत शेमेश पर उसके प्रहार से नौजने ठौर मारे गये और तिफरेत का सीनेगाग नष्ट हो गया। इस बीच इस्राइल की परेशानी इस नाते बढ़ गई है कि 28 मार्च से हूती लड़ाके भी जंग में शामिल हो गये है। हूतियों के दक्षिण इस्राइल में हमलों का स्रोत यमन है, लेकिन उस पर इराक और लेबनान के रास्ते भी आक्रमण शुरू हो गये हैं। गौरतलब है कि इस्रायल का दक्षिण लेबनान पर कब्जा उसकी ग्रेटर इस्रायल मुहीम का हिस्सा है, किंतु संसाधनों की न्यूनता के चलते अनेक मोर्चों का खुलना उसके लिये घातक और और विनाशकारी है। इस्रायल पर इराक और लेबनान की ओर से हमले तथा ‘थ्री एच’-हमस, हूतो और हिजबुल्लाह की साझा सक्रियता बीबी (नेतन्याहू) की पेशानी पर सलों के लिये पर्याप्त है। तेल अवीव, हैफा और येरुशलम पर लगातार द्रोन और मिसाइलें दाग कर ईरान ने आयरन डोम का मिथ ध्वस्त कर दिया है और संख्याबल के आधार पर वह इस्रायल को देर तक छकाने के मूड में है।
35 दिनों से जारी ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के फलस्वरूप सबसे बुरी गत ट्रंप की बनी है। अब साफ हो गया है कि उन्होंने ईरान पर हमला ‘बीबी’ के उकसावे पर खब्त में आकर किया। मिशन की सबसे बड़ी विफलता यह रही कि पहले ही दिन अयातुल्लाह खामेनेई के हलाक होने के बावजूद ईरान में कोई ‘कू-दे-ता’ (तख्तापलट) नहीं हुआ। अयातुल्लाह के उत्तराधिकारी मोज्तबा मस्क्वा में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं और उनकी ट्रंप को नसीहत ने सारे विश्व का ध्यान आकृष्ट किया है। ट्रंप की दुनिया भर में भद्द पिटी है और 80 वर्षीय सनकी राष्ट्रपति के खिलाफ अमेरिकी शहरों में 80 लाख से अधिक लोगों ने प्रदर्शन किया। उनके खिलाफ कांग्रेस में अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात भी चल रही है। उनकी भतीजी की मुखालफत के बाद अब सिनेटर लिंडसे ग्राहम जैसे उनके समर्थक जो कल तक फिल्लिया फड़काने और खरग पर कब्जे की दंभोक्ति कर रहे थे, अब युद्धपोतों से पाल उतारने की बात कर रहे हैं। अमेरिका अब तक जंग पर 36 बिलियन डॉलर फूंक चुका है। नतीजा ढाक के तीन पात। अनेक अमेरिकी मेरिनर ईरान के हत्थे लग गये हैं और 31 मार्च को अमेरिकी युद्ध संवाददाता सुश्री शैली पिट्टसन का बगदाद में अपहरण कर लिया गया। उसके बाद से शैली का कोई अता-पता नहीं है।
अमेरिका-इस्राइल बनाम ईरान जंग को लेकर भविष्यवाणी नामुमकिन इसलिये है, क्योंकि कोई नहीं जानता कि ट्रंप कब क्या कर बैठेंगे? ईरान की शिकस्त और रेजीम चेंज के माम‌ले में हाथ मल रहे ट्रंप अब होर्मुज जलडमरूमध्य के मुद्दे को भी भुलाने को तैयार है और चाहते हैं कि इस मुद्दे को क्षेत्रीय व योरोपीय शक्तियां सुलझायें। उनके शब्दों पर गौर करें। वह कहते हैं: ‘द वार इज गोइंग ग्रेट एंड कमिंग टू ऐन एण्डा’ मुमकिन है कि परमाणु हमला भी उनके दिमाग में हो, लेकिन पैट्रि‌याटिक विजन के यूएनओ में प्रतिनिधि मोहम्मद सफा के इस्तीफे से इस साजिश का भांडा फूट गया है।
जंग का सबसे बड़ा असर है कि अमेरिका पोषित नाटो ने अमेरिका को धता बता दी है। उसके अनन्य सहयोगी ब्रिटेन के कीर स्टार्मर ने सहयोग से साफ इंकार कर दिया दिया है और फ्रांस, जर्मनी, पोलैंड, इटली स्पेन आदि भी उसी रास्ते पर हैं। जर्मनी में तो सारे अमेरिकी फौजियों और साजो सामान की वापसी की मांग उठ‌ रही है। जंग से अमीर-उमराव दुबई और मध्यपूर्व में इंवेस्टमेंट से मुँह फेर लेंगे। ईरान की रणनीति कि उसने अमेरिका के सबसे बड़े एयरक्राफ्ट करियर अब्राहम लिंकन को दूर खदेड़ दिया है और सबसे ताजा खबर है कि तेल अवीव ने मध्यस्थता के लिये बीजिंग से संपर्क साधा है। यकीनन सामरिक और ऊर्जा के मान से दुनिया नये समीकरणों की देहरी पर है।
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