कोरबा ब्रेकिंग: एक और किसान ने जहर सेवन किया, जिले में दो दिन में दो घटनाएं

कोरबा ब्रेकिंग
एक और किसान ने जहर सेवन किया
कोरबा जिले में दो दिन में दो घटनाएं
धान नहीं बिकने से परेशान एक और किसान ने किया जहर सेवन
ग्रामीण क्षेत्र के अस्पताल में किया गया भर्ती, हालत गंभीर
विस्तृत विवरण की प्रतिक्षा है
आपको बता दें कि रविवार और सोमवार की दरम्यानी रात कोरबा जिले में समर्थन मूल्य पर धान नहीं बिकने से हताश एक आदिवासी किसान ने कीटनाशक का सेवन कर आत्महत्या करने की कोशिश की है। समय पर परिजनों को जानकारी मिल जाने और उपचार प्राप्त हो जाने से किसान की जान बच गई है।
घटना हरदीबाजार थाना क्षेत्र के पुटा गांव की है। यहां के आदिवासी किसान सुमेर सिंह गोंड ने रविवार और सोमवार की दरम्यानी रात करीब 11 बजे के आसपास कीटनाशक दवा का सेवन कर लिया। इस बात की जानकारी उसकी पत्नी मुकुंद बाई को हुई तो उसने तुरंत पड़ोसियों को घटना की जानकारी दी। आसपास के लोग मौके पर पहुंचे और उन्होंने बिना देर किए सुमेर सिंह को ले जाकर हरदी बाजार के स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया। यहां प्राथमिक उपचार किया गया और उसके बाद मेडिकल कॉलेज अस्पताल कोरबा रिफर कर दिया गया। सुमेर सिंह का अस्पताल में इलाज जारी है। उसके स्वास्थ में सुधार हो रहा है।
परिजनों ने बताया कि सुमेर सिंह का पुटा गांव में 3.75 एकड़ कृषि भूमि है। इस वर्ष उसका नाम समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के लिए पंजीकृत किसानों की सूची से हट गया है। जबकि पिछले अनेक वर्षों से समर्थन मूल्य पर उसके धान का उपार्जन किया जाता रहा है।
इस बात की जानकारी सुमेर सिंह को धान उपार्जन केंद्र पहुंचने पर हुई। उपार्जन केंद्र में उसे संशोधन कराने और अपना नाम सूची में शामिल करने के लिए कहा गया। इसके बाद सुमेर सिंह का दफ्तर दफ्तर फेरे लगाने का सिलसिला शुरू हुआ। डेढ़ माह से वह पटवारी और तहसीलदार कार्यालय के बीच भटकता रहा। थकहार कर उसने 30 दिसम्बर 2025 को कलेक्टर जनदर्शन में आवेदन दिया। इसके बाद 06 जनवरी 2026 को दोबारा कलेक्टर जनदर्शन में गया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। इस हालात ने उसे निराश और हताश कर दिया। इसी हताशा में उसने कीटनाशक का सेवन कर आत्महत्या करने का प्रयास किया।
आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ के किसानों के धान का उपार्जन राज्य सरकार समर्थन मूल्य पर करती है। राज्य की भाजपा सरकार पिछले 2 वर्षों से 3100 रुपए प्रति क्विंटल की दर से प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान का उपार्जन कर रही है। पिछले वर्ष तक किसानों का पंजीयन मैन्युअल किया जा रहा था। लेकिन इस वर्ष शासन ने पंजीयन की प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया है। इसी तरह ऑनलाइन टोकन की व्यवस्था भी की गई है। लेकिन किसानों का आरोप है कि निजी स्तर पर ऑनलाइन टोकन बन ही नहीं रहा है। उपार्जन केंद्र में ही टोकन बन रहा है। इसी तरह कंप्यूटरीकरण की वजह से अनेकों किसानों का नाम पंजीकृत सूची से विलोपित हो गया है और अनेकों किसानों के धान के फसल के रकबा में भी कटौती हो गई है। किसान अपनी इन समस्याओं के निराकरण के लिए शासकीय दफ्तरों का चक्कर काटने के लिए मजबूर हो गए हैं लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा है।
धान उपार्जन के लिए शासन ने सभी केन्द्रों में प्रतिदिन धान खरीदी की सीमा (लिमिट) भी तय कर दी है, जिसके कारण किसानों को अपना धान बेचने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। इसके अलावा उपार्जन केन्द्रों की व्यवस्था और प्रशासनिक बेरुखी से भी किसान बेहद परेशान और हताश हैं।
