…… आपके हसीन रूख पे @ डॉ. सुधीर सक्सेना

आज से करीब चालीस साल पहले की बात है। वह एक गुलाबी सर्द सांझ थी। अंधेरा, मीनारों, गुंबदों, नीचे-ऊंचे मकानों के छज्जों और सड़कों पर उतर आया था। शायद सन 85 या 86 । बिला शक गैस त्रासदी की स्याह वर्ष सन-84 गुजर चुका था। ‘माया’ से संबद्धता मेरे बिलासपुर से भोपाल आने का सबब बनी थी। वहां अरपा नदी थी। यहां भोपाल ताल। नये-नये लागों से मेल-मुलाकातें हो रही थीं। कहना गलत न होगा कि मैं ताल-तलैयों के शहर में बाद में पहुंचा, मेरी ख्याति पहले पहुंची। यह ख्याति कलम से उपजी थी। ‘माया’ लोकप्रिय पत्रिका थी। यह हिन्दी पट्टी सियासत, विशेषकर सियासत की पार्श्व-घटनाओं में रूचित थी। हमारी टीम खबरों में आगे और खबरों के पीछे की खबरों को समेटती थी। उन्हीं दिनों एक अधिवक्ता मित्र की मार्फत एक सुदर्शन व्यवसायी मित्र से मुलाकात हुई। गौर वर्ण। आकर्षक देहयष्टि। ग्रीफ नाक नक्श। हद दर्जे की नफासत। और सबसे बढ़कर ग़ज़ब का आत्मविश्वास…
यह शख्स था जगदीश अरोड़ा.! जगदीश कुमार अरोड़ा। चटख रंगा का पतलून। सफेद रंग की पूरी आस्तीन की कमीज। कलाई में घड़ी। घनी काली जुल्फें। आंखें बोलती हुई सी। हमारी उम्र लगभग बराबर थी। कुछेक माह का फर्क होगा। हम दोनों उम्र के मान से चौथी दहाई के शुरूआती दौर में थे। मैं पत्रकारिता में था और वह शराब के कारोबार में। हममें बस एक ही साम्य था कि हम दोनों ही उड़ान भरने को बेताब थे। मैं शब्दों के आकाश में, वह कारोबारी – आसमान में। बहरहाल हमें बेतकल्लुफ होते देर न लगी। वक्त के साथ हमारी दोस्ती परवान चढ़ी। हम दोनों बिजनेस के बारे में ज्यादा बातें नहीं करते थे, किंतु उसकी कामयाबी की सूचनायें बातचीत में बरबस खुदबुदाती रहती थीं। किसी नयी ईकाई का शुभारंभ होता अथवा कोई नया ब्राण्ड लांच होता तो वह खुशी से छलकते स्वरों में बताता। उसका दफ्तर बदला। अरेरा कॉलोनी से उठकर वह एमपी नगर गया। उसका घर पहले अरेरा कॉलोनी में था। वहां से वह भोपाल के उपांत केरवां डेम के नगीच मंडोरा में चला गया। अपना आशियाना उसने बड़े चाव से बनवाया। सुरूचि सम्पन्न कोठी। कलात्मक साज-सज्जा। खूबसूरत स्थापत्य।
जगदीश स्वयं स्थपति है। सोम समूह का वास्तु उसकी देन हे। उसकी सोच, उसकी अवधारणा, उसके स्वप्न, उसकी चाहत, उसके अरमान सब इसमें गुंथे हुये हैं। इन्हें परत-दर-परत अलग करके नहीं देख सकते। सोम की संरचना में इन सबका मेल-मिलाप है। उसने एक लंबा और कठिन सफर तय किया है। उसकी अपनी कहानी में सोम का सफरनामा सबसे लंबा अध्याय या सर्ग है।
मैं जब जगदीश को देखता हूं तो मुझे हमारे राष्ट्रपति रहे डॉ. एपीजे कलाम की बायोग्राफी याद आती है। आप ‘विंग्स ऑफ फायर’ पढ़िये। डॉ. कलाम सपनों पर बड़ा जोर देते हैं। स्वप्न….. स्वप्न…. और स्वपन…..। जीवन में कुछ ‘बड़ा’ कर गुजरने के लिये सपने जरूरी हैं। वे सचमुच बदनसीब हैं, जो सपने नहीं देखते हैं। ख्वाबों की तामीर के पहले ख्वाब देखना जरूरी है।
जगदीश ने ख्वाब देखा, लेकिन उसने खुली आंखों से ख्वाब देखा और उसे साकार किया। वह ऐसा कर सका, क्योंकि वह सबको साथ लेकर चला। वह जानिबे मंजिल अकेला चला, लेकिन लोग जुड़ते गये और उसने एक कारवां की शक्ल अख्तियार कर ली। आज की तारीख में सोमग्रुप एक ग्लोबल कारवाँ है। इसकी पहचान वैश्विक है।
जगदीश अपनी माँ और अपने पिता से बड़ी मोहब्बत और बड़ी इज्जत करता रहा है। आज भी मम्मी-डैडी की स्मृति हर सू उसके साथ रहती है उससे वह विलग नहीं होता। अपने घर का नामकरण भी उसने किया है ‘वात्सल्य।‘ यह उसकी भावनाओं का द्योतक है। वह रिश्तों को निभाना जानता है। अब्दुर्रहीम खनखाना का दोहा उसकी सीढ़ी है। रहीम कहते हैं : रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। जगदीश भाई भी ऐसा कुछ नहीं करते कि धागे में गाँठ की नौबत आये। हाँ, उन्होंने जिंदगी में खूब रिश्ते बनाये हैं और उन्हें भरसक निभाया है। आज उनके ‘मेरे अपनों’ की कमी नहीं है।
जगदीश भाई शराब के धंधे में हैं। शराब के साथ शोखी, नशा और रूमानियत जुड़ी हुई है। सोम का संदर्भ समकाल को वैदिक काल से जोड़ा है। प्राचीन भारत में सोम का पान प्रचलित था। जगदीश का उपक्रम प्राचीन संदर्भ का पुनर्नवा करने का प्रसंग है। आज उसके ब्रांड पूरी दुनिया में सकाये जाते हैं। उसने कामयाबी की उन बुलंदियों को छुवा है, जो बिरलों को जीते-जी नसीब होती है।
शराब, प्रकृति और स्त्री पर कवियों ने कितना कुछ कहा है। मेरे तईं ये तीनों ही मदिर है। मुझे शराब पर यह शेर निहायत पसंद है – ‘तर दायनी पे शेख हमारी न जाइयो। दामन निचोड़ दूं तो फरिश्ते वज़ू करें। यूं तो जिगर मुरादाबादी भी कहते हैं : -हजो ए मये ने ऐ शेख, तेरा भरम खोल दिया। तू तो मस्जिद में है नीयत तेरी मैखाने में।“ अब आप ही अंदाज लगायें कि कितनी पाक, पुरअसर और पुरलुत्फ चीज है यह।

सोम समूह के बहुत सारे ब्राण्ड बाजार में हैं। नाम गिनाना यहां जरूरी नहीं, लेकिन मुझें ‘भीमबैठका’ का इंतजार है। यह में प्रागैतिहासिक काल से जोड़ता है। अभी 9 मई को भोपाल में करवाँ बाँध के समीप उसने सोग्र ग्रुप का 38वां स्थापना दिवस वृहत्तर परिवार के साथ मनाया। मुझे पता तो था कि मेरा दोस्त टेनिस और घुमक्कड़ी का शौकीन है, लेकिन यह न ज्ञात था कि वह कुशल गायक भी है। वहां फर्माइश पर उसने अपने कॉलेज के दिनों का गीत गाया : ‘आपके हसीन रूख पे आज नया नूर है……।’ मैं कहना चाहूंगा “जगदीश भाई, प्यार, सदाशयता और नेकी के कारण आपके चेहरे पुरजो नूर है, वह सदा बना रहे। आप सेहतयाब रहें। और कामयाब और फतेहयाब हों। मंजिले और भी है। चश्मेबद्दूर……

Spread the word