पल्प का रोचक आख्यान @ डॉ. सुधीर सक्सेना

किताब के बहाने
पल्प का रोचक आख्यान
• डॉ. सुधीर सक्सेना
बेगमपुल मेरठ में है और दरियागंज दिल्ली में। दोनों के दरम्यान करीब सौ किमी का फासला है। यह फासला मायने नहीं रखता। न कल मायने रखता था और न आज रखता है। इसे तय करना कभी दुरुह न रहा, लेकिन यहां हम बेगमपुल से दरियागंज का जिक्र निहायत भिन्न सन्दर्भ में कर रहे हैं। और उसका मौका जुटाया है व्यंग्यकार-लेखक – संपादक यशवंत व्यास ने देसी पल्प की दिलचस्प दास्तान के जरिये। पल्प यानि लुग्दी और पल्प लिटरेचर यानि लुग्दी साहित्य, जिससे हिन्दी का भद्र लोक या बौद्धिक वर्ग प्रायः नाक-भौंह सिकोड़ता रहा है। इस बिरादरी का इसे चोरी-छिपे पढ़ने का वास्ता भले ही रहा हो, लेकिन इसका जिक्र वह बड़ी हिकारत से करता रहा है। यह संदर्भ इसलिये कि यशवंत में पल्प की दुनिया के भेद को बेधने के साथ ही उसके रेशे-रेशे को उधेड़ने का साहसिक जतन किया है और वह भी आख्यान की शैली में। उनकी कलम कितनी रवाँ है, यह सिर्फ उनके साथ पेंचदार गलियों और कुल्हियों वाली पल्प की दुनिया से गुजर कर जाना जा सकता है। उन्हें इस भूलभुलैया का जुगरा किया ज्ञात है और तमाम चेहरों से वाकफियत होने के साथ-साथ उनके पास इत्ते हवालों और किस्सों का पिटारा है कि पूछिये मत।
तो एक है बेगमपुल (मेरठ) और एक है दरियागंज (दिल्ली) दोनों पल्प की दुनिया के ऐसे आला मरकज है कि उनके बयान और बखान के बिना यह दास्तान लिखी ही नहीं जा सकती। यशवंत ने आख्यानेतर प्रसंगों को इस खूबी से आख्यान के रंगीन धागों में पिराया है कि आप न ठिठकते हैं और न ऊबते हैं। यशवंत पुरस्कृत और समादृत लेखक-पत्रकार है और चार दशकों से प्रिंट और डिजिटल माध्यमों में आवाजाही कर रहे हैं। खबर है कि वह फिलवक्त डिजिटल और प्रिंट के साझे की दोस्ताना कारीगरी पर कुछ अनूठे प्रयोगों में मुब्तिला है। बहरहाल, किस्सा-कोताह यह कि जिंदगी के उपन्यास में सिर्फ अनिश्चितता निश्चित है और उससे ज्यादा अनप्रेडिक्टेबल’ और कुछ नहीं है। यही अनिश्चिता, अनहोनी और आकस्मिकता रहस्य-रोमांच, भेद, जिज्ञासा, भय और भुरभुरी के स्रोत हैं।
दास्तान का पहला बयान है: रेशमी उजाला है, मखमली अंधेरा। दिल्ली की एक मुबारक सुबह लेखक चार सौ पार नॉबेल लिख के लिकसा 85 वर्ष की उम्र के वेदप्रकाश, कांबोज से क्या मिलता है, रील-दर-रील चलने लगती है। यशवंत आद्योपांत अदब की रबायत नहीं छोड़ते। अंदाजेबयां की बानगी देखियेः वो कोविड की दो लहरों से निपट चुके। समय की एक नई-नई खुली सुबह भी।’ कांबोज से आयाज कर यशवंत हमें चैप्टर-दर-चैप्टर आइकनों से मिलाते चलते हैं। कुछ प्रसंग बड़े मार्मिक हैं। वे हमें कभी विस्मित करते हैं तो कभी विचलित, स्तब्ध या शोकमग्न। बेशक बीते सालों में पापुलर की चमक बढ़ी है। लेखन में उसका बाजार मुख्यधारा में एक नहर की तरह खुला है और बेस्टसेलर की ललक पवित्र इलाकों में भी खुलकर नाच रही है। बकौल यशवंत, “कभी उत्तर हिन्दुस्तानी फपुलर उपन्यास के धंधे की पहली भट्टी इलाहाबाद में भभकी थी, दिल्ली का तंदूर बाद में गर्म हुआ और फिर शिफ्ट हुआ था मेरठ पर बनारस का बीता ठाठ इसमें कौन भूले?
पल्प पर बात करते हुये यशवंत फिर-फिर फ्लैश बैक में जाते हैं और अचानक कहीं दूर का ओझल सिरा पकड़ लेते हैं। उनका यह करतब कथानक में हलचल और रोचकता पैदा करता है। वह सन 1410 में जर्मनी के मेन्ज कस्बे में कारीगर जान गूजफ्लेश गुटनबर्ग की बात करते हैं और चीन के पई शेंग को भी याद करते हैं। इस तरह वह हमारे ज्ञान-कोष को भी समृद्ध करते हैं। वह ब्लू बुक, पैंसी मैग्जींस और दमड़ी उपन्यासों से होते हुये पल्प पबिकाओं तक पहुंचते हैं। वह बीसवीं शती के शुरू के दौर को याद कहते हैं, जब फ्रैंक मुनसे रेल रोड मैग्जीन शुरू करता है और टारजन और जोरो जैसे नायक देता है। ‘द स्ट्रेंड’ से शरलाक होम्स का जन्म होता है। इस पर यकीं कीजिये कि पल्प में इफारत बिक्री में कमाई से नामी-गिरामी ललचाये और उन्होंने छद्म नामों से पल्प में रगड़ाई और करवाई की। बाद में एक ही पटैंट नाम से कई-कई लोगों ने लिखा और प्रकाशकों ने तिजोरियां भरीं।
पहले विश्वयुद्ध के बाद पल्प का विस्फोट हुआ। डेशियल हेमेट और रेमंड चांडलर जैसे नाम उभरे। डिटेक्टिव, हॉरर, थ्रिलर पाठकों की लत बन गये। हॉरर, स्पाइसी के बाद हीरो पल्प छपा। फैंटम और स्पाइडर कॉमिक्स में प्रविष्ट हुये। कौन यकीन करेगा कि आइजक असीमोव, राबर्ट हेनलिन, आर्थर क्लार्क, लार्क, रेड ब्रैडबरी और एल. हबार्ड पहले पहल पल्प में छपे थे। ब्रिटिश भारत में फौजियो से भरी ट्रेन से फेंकी सैंडविचों और चाकलेटों के बीच एक बच्चे के हाथों में कॉमिक्स के पन्ने लगे। यही बच्चा बड़ा होकर आबिद सुरती बना, जो ‘धर्मयुग’ में ढब्बू जी के जरिये लाखों बच्चों का चहीता बन गया। अर्से बाद दरीबें का नारंग पुस्तक भंडार पल्प के कर्णधारों की दस्तक का दरवाजा बना। अर्से बाद मुंबई में मैरीन ड्राइव के नगीच स्लम्स या गामदेवी में बच्चे देर रात गये झुंझार या धनंजय को खोजते थे, क्योंकि बाबूराव अरनालकर के ये नायक अंधेरे में निकलते थे।

आख्यान का दूसरा बयान हमें इतिहास के गलियारों में ले जाता है कि कब लंदन और न्यूयार्क की पुलिस फोर्स बनी? दो सौ साल भी नहीं हुये जब अपराधी और अपराध शास्त्री यूजीन फ्रांस्ता विडोक ने फ्रांस में सत्र 1833 में पहला डिटेक्टिव ब्यूरो बनाया था। उसके चरित्र ने विक्टर ह्यूमो, बाल्जाक और एडगर एलन पो जैसों को प्रेरित किया। सत्र 1841 में पहला प्राइवेट डिटेक्टिव डुपिन प्रकट हुआ। उसके रचयिता थे एडगर एलेन पो। इसी कड़ी में चार्ल्स डिकंस को रचा। गौरतलब है कि रचना (शरलॉक) ने रचयिता (डॉयल) से ज्यादा ख्याति पाई। अगर शरलॉक नहीं होता तो डॉयल कहीं ऊंचे मयार के लेखक होते। बहरहाल, डॉयल से फोरेंसिक साइंस को बड़ी मदद मिली। गिनीज बुक की माने तो शरलॉक की लोकप्रियता शेक्सपियर के हेमलेट से ज्यादा है। उसका मुकाबला गर किसी से है तो ड्रैकुला से। अध्ययन बताता है कि शरलॉक का बुद्धिलब्ध आइंसटीन से ज्यादा है। प्रसंगवश रूस की बात करें तो बोरिस अकुनिज की ईजाज इरेहस्त फैंदोरिन के कारनामे गजब की सनसनी साबित हुये। उनके नावेलों की तीस देशों में देा करोड़ प्रतियां पढ़ी जा रही हैं। क्राइम की बात हो और अगाथा क्रिस्टी की बात न हो, भला कहां मुमकिन है। तो उनका जासूस फिलिप मारलोवे का। इसी कड़ी में आगे आते हैं चांडलर के मुरीद इयान फ्लोमिंग, जिन्होंने जेम्स बाँड का आविष्कार किया। तदंतर डेशियल हेमेट और जेम्स एम कैन के बाद नाम आता है जेम्स हेडली चेइज़ का। यशवंत कहते हैं- “चेइज एक चमत्कार था। “चेइज कभी अमेरिका में नहीं रहा, लेकिन उसने अमेरिकी अंडरवर्ल्ड का धुआंधार चित्रण किया। जानना दिलचस्प है कि एलेन लेन ने सन् 1935 में ग्रीष्म में पेंगुइन की शुरूआत की थी और शुरूआती दस पेपरबैंकों में आगाथा की द मर्डर आन द लिंक्स भी थी। इसी पेंगुइन का अध्ययन कर लौटे दीनानाथ मल्होत्रा ने भारत में हिन्द पॉकेट बुक्स की नींव डाली। मजा देखिये कि सन् 2021 में हिन्द पॉकेट बुक्स उसी पेंगुइन में समाहित हो गयी।ये प्रसंग इसलिये वर्णित कि यशवंत पल्प के बहाने हमें इतिहास की वीथिकाओं में ले जाते हैं। इससे कथ्य उबाऊ और नीरस होने से बचता है और हम पन्ना दर पन्ना बेखटके आगे बढ़ते हैं। बाद के बयानों में देवकीनंदन खत्री हैं, उनके बेटे दुर्गाप्रसाद खत्री हैं, गोपालराम गहमरी हैं, किशोरीलाल गोस्वामी हैं, बंगला पल्प के हस्ताक्षर हैं और इब्ने सफी हैं। यशवंत कहते हैं- “शोहरत और वाकमाल लिखावट में इब्ने सफी की कुल कमाई इतनी ऊँची थी कि उनके दीये की लौ देखकर न जाने कितने रोशन दहो गये। किताब का पांचवा बयान ‘क्या गहमरी का हंसराज उठकर सारदेन्दु का ब्योमकेश बक्शी हो गया’ दृष्टव्य है और यशवंत की शोध-वृत्ति और दृष्टि का परिचय देता है। यशवंत ने लगभग भुला दिये गये गहमरी के बारे में उपयोगी और कीमती जानकारी परोसी है। ऐसे ही इब्ने सफी पर बयान उदासी के साथ समाप्त होता है, जब हम पाते हैं कि उप्र में नारा में जनमे असगर अहमद नारवी उर्फ इब्ने सफी के न तो मकान का नामोनिशां है और न ही निकहत पब्लिकेशंस या जासूसी दुनिया का।
किताब में कुल 14 बयान हैं। बयान यानि अध्याय। ये बयान एक से बढ़कर ऐ हैं। वहां परशुराम शर्मा, ओम प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश शर्मा हैं, दत्त भारती, कुशवाहा कांत, प्यारेलाल आवारा और सुरेन्द्र मोहन पाठक हैं। यशवंत ने सुरेन्द्र मोहन पाठक, जिन्होंने जेम्स हेडली चेइज के अनुवादों से इंडस्ट्री में अलग रास्ता खोला और सन 1971 में शुरू विमल सीरीज और तदनंतर सुनील सीरीज से बाजार में धाक जमा ली, के बारे में काफी विस्तार से लिखा है। इसमें शक नहीं कि सुरेन्द्र मोहन के पास बेहतर भाषायी संस्कार और कथा-विन्यास है और इसके बूते उन्होंने लोकप्रियता के नये आयाम स्थापित किये हैं। बहरहाल, यशवंत की मार्फत हम योगेश मित्तल नामक धुरंधर प्रेत लेखक (घोस्ट राइटर) को जान पाते हैं, जिन्हें 25 ज्यादा नामों से लिखने का कमाल हासिल था। कुमार कश्यप, मस्मूर जालंधरी, आरिफ मारहवी, जमील अंजुम, फारुक अर्गेली, प्रदीप शर्मा, आनंद प्रकाश जैन, केवल कृष्ण कालिया इसी कुल के सदस्य रहे। घोस्ट राइटर्स पनपे इसलिये कि भूत-लेखन से उजरत ज्यादा मिलती थी। कौन मानेगा कि कर्नल रंजीत, मनोज, केशव पंडित, रीमा भारती, चंदर, रघुनाथ, राजहंस सबके सब ट्रेडमेन हैं। लिखे कोई, चमके कोई।
हिन्दी पाठकों को ज्ञात होगा कि गुलशन नंदा का एक जमाना था। अशोक पॉकेट बुक्स ने सन् 1959 में उनका नावेल ‘काली घटा’ छापा था। कीमत थी एक सौ पच्चीस नये पैसे, मगर दीनानाथ मल्होत्रा ने सन् 1972 में नंदा के नावेल ‘झील के उस पार’ का पांच लाख प्रतियों का पहला संस्करण छापा। यह अपने आप में विलक्षण रिकार्ड था।
इस किताब के जरिये आप कई दिलचस्प शख्सियतों से मिलते हैं। मसलन शेखर मल्होत्रा, अमरनाथ वर्मा, गुलशन राय, नरेन्द्र वर्मा, नरेन्द्र गुप्ता, लाला सत्यपाल वार्ष्णेय, ब्रजेश्वर मदान, राजकुमार गुप्ता, गौरीशंकर गुप्ता, सुरेश जैन आदि। चौदह मेंबरों के मेरठ के जैन-परिवार और मशहूर छायाकार प्रदीप चंद्रा को जानना दिलचस्प है। वे उपन्यास के किरदार सरीखे लगते हैं। यशवंत ने आगे के पन्नों में राहुल सांस्कृतायन रांगेय राघव, श्रीलाल शुक्ल, कृश्नचंदर आदि के बारे में भी रोचक सूचनाएं दी हैं। बेशक पल्प में आप सामाजिक लक्षणों को भी चीन्ह सकते हैं। वहां भय, स्वप्न, इच्छाये और दु:स्वप्न है। सनसनी, रोमांच और रोमांस है। सेक्स और सेक्सुअलिटी है। घुमावदार मोड़ हैं। सरलता है। पाठक को और क्या चाहिये। कम दाम में मनोरंजन। सस्ते में टाइम पास। लिबी ब्रुक्स सही कहते हैं कि ये नॉवेल अपने प्लाट और गति की वजह से पढ़े जाते हैं, न कि साहित्यिक नक्काशी के लिये।
यशवंत को पढ़ना नान फिक्शन को फिक्शन से ज्यादा पापुलर बनाने वाले क्राइम रिपोर्टर एस. हुसैन जैदी को जानना भी है। आप यह भी जानेंगे कि शुभा दो व्यक्तित्वों का युग्म है। वे दक्षिण भारत के लेखकों की भी खबर लेते हैं और हसीन दिलरूबा और लेटेस्ट ट्रेंड की भी बात करते हैं। वह इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि न पढ़ा जाए तो लुग्दी और खूब पढ़ा जाये तो जानदार फरफराता हुआ पन्ना। तो फरफराते हुये पन्नों की इस मजेदार दास्तान में कुछ चित्र और छापे भी हैं। लगता है कि यशवंत ने पल्प की दुनिया की दो ढाई साल खाक छानी है। बिला शक उन्होंने इसे लिखा बड़े मनोयोग से है और देशी-विदेशी संदर्भ जुटाकर उसे ‘गुरु’ (वजनी) बना दिया है। एक उपेक्षित या इंग्नोर्ड विषय पर यह रोचक इतिक्त उनकी वर्जित संकायों में प्रवेश की साहसिकता और लेखकीय नवाचार दर्शाता है। यह पल्प का आख्यान भी है और दस्तावेज भी। उनके पास ‘कहन’ की प्रभावी और प्रवाहमान शैली है और यत्नपूर्वक कथ्य जुटाकर उन्होंने कुछ ऐसा कर डाला है कि उन्हें लेखकों की बिरादरी में ‘वस्ताद (उस्ताद)’ अलहदा-सा कहकर चिन्हित किया जा सकता है। यकीनन वह हम लेखकों की दुनिया में ‘मास्टर विद ए डिफरेंस’ हैं।
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