मैं और मेरी मेज @ डॉ. सुधीर सक्सेना

मैं और मेरी मेज
• डॉ. सुधीर सक्सेना
मित्रवर सूरज प्रकाश ने ‘मैं और मेरी मेज़’ पर लिखने का आग्रह किया। निश्चित ही उनका अभिप्राय लेखन प्रक्रिया और लेखक की जद्दोजहद से है, मगर मेज़ अनेक दिलचस्प संदर्भो के साथ मेरे ज़ेहन में आयत्त है, लिहाज़ा जद्दोजहद से पेश्तर कुछ बातें उसके बारे में कहूंगा और फिर विषय पर।
मेजें अक्सर आयाताकार होती हैं। उनकी लंबाई-चौड़ाई यकसां नहीं होती। होने को वे वर्गाकार भी हो सकती हैं और गोलाकार भी। भारत के औपनिवेशिक -इतिहास में गोलमेज का खासा दखल और महत्व रहा है। रीत्यानुसार मेजें प्राय: काठ की होती हैं, मगर समय के साथ मेजों की दुनिया में धातुओं और पत्थरों का प्रवेश होता रहा। आधुनिक काल में प्लास्टिक, कांच और मिश्र धातुओं का चलन बढ़ा तो मेजें भी अछूती नहीं रहीं। देश-देशांतर में नायाब मेजें बनीं और खूब बनीं, ऐसी – ऐसी मेजें कि आप उन्हें देखें और रीझ जायें वक्त और जरूरत के मुताबिक मेजों के आकार-प्रकार यूं बदले कि उन्हें अलग-अलग खानों में वर्गीकृत किया जा सकता है। मेजों ने मुहावरों की दुनिया को भी छेंका। वे वार्ताओं, संधियों और बैठकों की गवाह बनीं। मैनर्स के बहाने वे तहजीब से जुड़ीं। कुर्सी उनकी जोड़ीदार हुई। कुर्सी और मेज संग साथ शब्दावली में रूढ़़ हुये। यहां बात लेखकीय संदर्भों की हो रही है, तो यह नितांत सच है कि मेजों ने तख्तियों और तख्तों को बखूबी विस्थापित कर दिया और स्टडी रूम, अध्ययन कक्ष और लाइब्रेरियों की उनके बिना कल्पना ही मुहाल हो गया। लेखक के साथ राइटिंग टेबल आ जुड़ी। कल्पना करें तो अलग-अलग आकार-प्रकार की ऐसी राइटिंग टुबलों का कागजों, किताबों, पेपरवेट लैंपदान, डायरियों आदि के ढेर के बिना वजूद मुश्किल है। मेरी मान्यता है कि मेज़ से जुड़ने के लिए लेखक को सलीका और अपने भीतर कीमिया पैदा करना होता है।
स्मृति के गलियारे में हौले-हौले या तेज गति से चलकर जब मैं अपने बचपन में पहुंचता हूँ, तो स्वयं को गंगोजमुनी तहजीब के मरकज लखनऊ में गलियों और कुल्हियों के ठेठ मध्ययुगीन मोहल्ले छाछू कुआं में पाता हूँ। संयुक्त परिवार था। दादी, चाचा-ताऊ, भाई-बहन, मां और कुछ अन्य। नीचे दालान के बाहर बैठक थी और वहां कुर्सी मेज थी। वह हम बच्चों का पढ़ने का ठीहा था। बुजुर्ग सरदार जी भाई और बहन को टयूशन पढ़ाने आती तो वहीं बैठते। मैंने बारहखड़ी वहीं सीखी और वहीं मेज पर तख्ती रखकर इमले का अभ्यास किया। खुशखत की आदत तभी पड़ी। तभी यह बोध उपजा कि अक्षर सुन्दर और सुवाच्य होने चाहिये। मेज पर पाटी रखकर सधे हाथों से चपल ऊंगलियों से सुंदर इबारत लिखना कला है और इस कला को सप्रयास साधना पड़ता है। मेरी कुछ मैत्रियां वर्षों के अंतराल में सघन और सान्द्र हुई हैं। कुछ की हस्तलिपि बड़ी सुंदर है और कुछ की बेढंगी। मित्र रमेश अनुपम की राइटिंग बड़ी सुन्दर है और वह फूल-पत्ती और लकीरों से पत्रों को और सुंदर आकर्षक बना देते हैं। दिल्ली छोड़कर मस्क्वा (रूस) जा बसे अनिल जनविजय के हरूफ भी बड़े-बड़े और सुंदर होते हैं। जब से आँख खुली है ‘शीर्षक आत्मकथा से संप्रति खूब चर्चित लीलाधर मंडलोई के अक्षर सुस्पष्ट और सलीकेदार नहीं होते, लेकिन उन्हें बांचने में दिक्कत नहीं होती। बेहतरीन गद्य-लेखक तेजिंदर की हस्तलिपि का क्या कहना। मैं उसका मखौल उड़ाता और वह मेरी फब्तियों के मजे लेता। किसी चींटे को स्याही में डुबोकर कागज पर छोड़ दो तो टेढ़ी-मेढ़ी आकृतियां बनेंगी और वे आकृतियां तेजिंदर की हस्तलिपि से मेल खाती होंगी। मेरी इस टिप्पणी पर तेजिंदर खूब हँसा करता था। मुझे लगता है कि गहरी संवेदना से ओतप्रोत तेजिंदर की तरल आत्मीयता से कागज पर उसके अक्षर डबडबा जाते होंगे। हस्तलिपि का संवेदनशीलता या आत्मीयता या मन:स्थिति से क्या वास्ता व रिश्ता है, यह शोध का विषय हो सकता है; दिलचस्प और मजेदार।
लेखन और मेज में अन्योन्याश्रित संबंध है। वांग्मय में मेज का योगदान अतुल्य है। मित्रगण यहां मेज को व्यापक सन्दर्भों में लें। बिलाशक मेज पर बैठने के पहले तैयारी करनी होती है। मूड त्रिस्तरीय होता है। मेज के पहले, मेज पर और मेज के बाद। मेज के पहले यानि प्रीपरेटरी। रूसी में पदगतोवचिल्नीय। मेज पर यानि लिखते वक्त और मेज के बाद यानि लेखन के उपरांत। लिखने के लिये मेरी कुछ शर्ते हैं। कहें तो खब्त। कागज कोरा होना चाहिये। साइज ए फोर। जेके बॉन्ड हो तो अत्युत्तम। हाशिये का या रूलदार कागज तभी त्याग दिया था, जब बीती सदी की आठवीं दहाई के शुरूआती वर्षों में आगरा कॉलेज में विज्ञान में स्नातक का छात्र था। उसके पहले हम लोग नीली स्याही इस्तेमाल करते थे। वह कलम-दावात का दौर था। फिर बॉल पेन और रिफिल का दौर आया। उन्हीं दिनों हम कुछ मित्रों ने काली स्याही तथा ब्लैक रीफिल का प्रयोग शुरू किया, जो आज तक बदस्तूर जारी है। सफेद बुर्राक कागज पर काली स्याही खूब उभरती है। अक्षर भले लगते हैं। खूब सारे पेन और काली रिफिलें मेरा शगल हैं। काली रिफिल न हो तो मूड नहीं बनता। मेज की दराज में प्राय: उनका स्टाक रहता है; बफर स्टॉक। कागज भी थोक में। मेज पर किताबों और डायरियों का ढेर। थोड़ा बेतरतीब। एक-दो पेपरवेट। एक ब्लैक स्टोन पेपरवेट बरसों से मेज की शोभा है। उसे मेरे पारिवारिक मित्र जशपुर राजपरिवार के दिलीप सिंह जूदेव ने गिफ्ट किा था, जब वह सांसद थे।
स्याही या रोशनाई की बात चली तो प्रसंगवश यह जिक्र दिलचस्प है कि यशस्वी कथाकार मित्र शशांक हरी स्याही का उपयोग करते हैं। बहरहाल, मेज दिनचर्या में शुमार है। शायद ही कोई दिन जाता होगा, जब कुछ घंटे उसकी सोहबत में न बीतें। मेज बुलाती है। बाँधती है और मुक्त भी करती है। मुझे मेज पर बैठने के लिए तैयारी करनी होती है। यह तैयारी लेखन पूर्व की तैयारी होती है। साहित्रकारिता के तकाजे अलग-अलग होते हैं। कविता बहुधा कम समय लेती है। अनुभूतियां जब सांद्र हो जाती हैं, उनका उद्रेक स्वाभाविक है। कविता की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं होती। कविता भावों या विचारों की संक्षिप्त और कलात्मक अभिव्यक्ति है। वह भाषा में आदमी होने की तमीज है। धूमिल का कहना सही है कि कविता समूचा आदमी चाहती है अपनी खुराक के लिए। यह बात कविता ही नहीं, अन्य विधाओं पर भी लागू होती है। लेखन तल्लीनता मांगता है। उसे एकाग्रता चाहिये। रचते समय वह ‘ट्रांस’ में रहता है। इर्दगिर्द से बेखबर। मेरे हाथ अक्सर होता है लिखने में गहरी तल्लीनता से चाय की प्याली ठंडी हो जाती है या पेग अनपिया रह जाता है। प्रसंगवश यह भी कि धूमपान का मुझे शौक नहीं। बैठकी से जब मनचाहा ‘ड्राफ्ट’ मिल जाता है तो वह सेलीब्रेशन से कम नहीं। पिछले ढाई सालों में जब भी लिखने बैठता हूं, मुझे अपनी जीवन संगिनी सरिता की कमी सालती है, जो नगीच बैठी रहती थी। फरमाइश पर चाय बना देती और पेग भी। वह मेरे लिखे की पहली पाठक हुआ करती थी। बहरहाल , लेखक कोई भी हो, वह व्यवधान, विघ्न-बाधा शोरोगुल से बचना चाहता है। कविता तो प्रतिकार है। प्रार्थना भी बखान भी। वक्तव्य भी। संकल्प भी। धिक्कार भी। यकीन भी। नेकी और बदी की लड़ाई में वह नेकी के साथ है और सत्य और असत्य तथा अंधकार ओर प्रकाश की मुसलसल जंग में सत्य और प्रकाश के साथ। कायसिन कुलियेव और रसूल गमजताव जैसे रचनाकार मुझे अच्छे लगते हैं। वे सुंदर निर्मल मन के लेखक हैं। कलुष उन्हें नहीं भाता। हम सबका सपना जीवन और जगत की बेहतरी का सपना है। मुक्तिबोध कहते हैा -‘सभी मानव सुखी, सुंदर व शोषणमुक्त कब होंगे।’ यह वृहत्तर कवि कुल की जिज्ञासा और चिंता है। इस कुल का स्वप्न साझा स्वप्न है। वह चकमाओं, रोहिंग्याओं, तिब्बतियों रेड इंडियनों और फलस्तीनियों की पीड़ा से दुखी होता है। आज हम बोगदे में है। यह स्याह बोगदा है। बोगदे के सिरे पर रोशनी अभी दीखती नहीं। यह त्रासद और भयावह है। धार्मिक कट्टरता, अंध राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक दुराग्रहों ने विश्व के सम्मुख अभूतपूर्व संकट उत्पन्न कर दिया है। वैश्विक और मानवीय मूल्य संकट में हैं। चंडीदास के कथन ‘सबार ऊपरे मानुष रे सत्य तहाँर ऊपरे किछुनाईं के समक्ष समय ने प्रश्न चिन्ह जड़ दिया है। अकेला गांधी है, जो दोनों बाँह उठकर कहता है : ‘सत्य ही ईश्वर है। “बापू का यह वाक्य हमेशा मेरे मनोमस्तिष्क में गूंजता कहता है कि सत्य ही ईश्वर ही। तब जब मैं मेज पर होता हूं और तब भी, जब मैं वहां नहीं होता तब भी। अच्छा लेखन तैयारी मांगता है। कवितेतर और कथेतर दोनों ही लेखन ‘डिमांड’ करते हैं। पत्रकारीय लेखन के अपने तकाजे हैं। अच्छे और प्रभावी लेखन के लिए तीन चीजें चाहिये : सन्दर्भ, भाषा और शिल्प। हर कहीं कंटेंट इज द किंग है। इसका कोई अपवाद नहीं। कंटेंट शिल्प तलाश लेता है। ओ हेनरी या अंतोन चेखोव की कहानियां पढ़िये। हेमिंग्वे का ‘ओल्ड मैन एंड द’ सी” पढ़िये। मिखाइल शोलखोव की ‘इंसान का नसीबां’ पढ़िये। ये सब अपने-अपने फन के माहिर उस्ताद है। मगर सोचिये कि उनमें यह फन आया कहां से? मेज पर जाने से पेश्तर वे वहां तक जाने की तैयारी कर चुके होते हैं। अच्छी रचना यूं ही नहीं जन्म लेती। येगोर इसायेव लंबी कविताओं का अदभुत कवि है। वह उस लाल सेना के अग्रिम दस्ते में था, जिसने नाजी फौजों को मात देकर बर्लिन में प्रवेश किया। मैं मस्क्वा जाकर उससे उसकी दाचा में मिला। उसने बेहतरीन लंबी कविताएं लिखी हैं। मैंने उसकी ‘सुद पामिती’ का अनुवाद किया। शीर्ष दिया ‘स्मृति गाथा’। कविता बाद में लिखी गयी। उसका जन्म तब हुआ था, जब येगोर बतौर फौजी लाम पर जूझ रहा था। ‘कंसीव और डिलीवरी (गर्भधारण और प्रसव) के दरम्यान फासला होता है। धारण की अवधि कुछ भी हो सकती है। नौ मिनट भी। नौ माह भी। नौ साल भी। कभी : कभी हम लाख जतन कर भी मनचाह नहीं लिख पाते। मेज पर हम डिलीवर करते हैं। वह विरेचन का ठौर है। वहां हम मुक्त होते हैं। वहां हमें बेचैनी की फांस से मुक्ति मिलती है।
मैं अपनी मेज का शुक्रगुजार हूं। जिंदगी में शहर बदले। मकान बदले, लेकिन मेरे कमरे में मेज आज भी वही है। मेरा लिखना उसके होने से मुमकिन हुआ। वह अभी भी मुझे उकसाती है। मैं मुस्कुराता हूं और उसका शुक्रिया अदा करता हूँ।
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