दिल्ली में दवा और उपकरण खरीद में करोड़ों की अनिमियतता अधिकारियों के तबादले से मचा विभाग में हडकंप

नई दिल्ली। दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के तहत काम करने वाली केंद्रीय खरीद एजेंसी (सीपीए) इन दिनों लगातार सुर्खियों में है। विजिलेंस जांच, स्वास्थ्य सेवाओं की महानिदेशक (डीजीएचएस) से जुड़े प्रशासनिक बदलाव और सीपीए में बड़े पैमाने पर तबादलों ने केंद्रीय खरीद एजेंसी को सवाल और चर्चाओं में ला दिया है। जिसे पर्दे के पीछे रह कर काम करना था, वह अब चर्चा-ए-आम है। करीब 350 करोड़ रुपये की दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की खरीद से जुड़े मामलों को लेकर हाल ही में सीपीए पर विजिलेंस छापेमारी, निगरानी जांच, कार्रवाई सामने आई है। इसके बाद सरकार ने सीपीए के ढांचे में बदलाव को प्रशासनिक स्तर पर कई बड़े फेरबदल किए। डीजीएचएस, सीपीए प्रमुख समेत 40 से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों के हुए तबादलों को केवल रूटीन नहीं माना जा रहा है। सीपीए में मानव संसाधन की समीक्षा की गई है और ऐसे मामलों की जांच की गई है जहां कर्मचारी सीपीए के वेतनमान पर होने के बावजूद अन्य कार्यालयों में तैनात थे। इसने पर्दे के पीछे काम कर रही इस एजेंसी को सार्वजनिक चर्चाओं में ला दिया है।
सीपीए का काम दिल्ली सरकार के अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता अनुसार उपलब्ध बजट अनुसार खरीद करना होता है, सीपीए ने वर्ष 2025-26 में जो खरीद की उस पर कई सवाल उठे, शिकायतों का अंबार लग गया। सवालों और शिकायतों पर विजिलेंस ने सीपीए पर छापेमारी कर इन सवालों के जवाब ढूंढे तो कई अनियमितताएं सामने आईं। बस, इसी के बाद से हंगामा बरपा हुआ है।केंद्रीय खरीद एजेंसी (सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी) दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग की वह प्रमुख इकाई है, जो सरकारी अस्पतालों, डिस्पेंसरी और अन्य स्वास्थ्य संस्थानों के लिए दवाओं, चिकित्सा उपकरणों, सर्जिकल सामग्री, प्रयोगशाला उपभोग्य वस्तुओं और अन्य जरूरी चिकित्सा सामग्री की खरीद प्रक्रिया को संचालित करती है। यह एजेंसी सीधे तौर पर दवा या उपकरण उत्पादन नहीं करती, बल्कि निविदा, आपूर्ति और सप्लाई चेन व्यवस्था के जरिए पूरे स्वास्थ्य तंत्र को जरूरी चिकित्सा सामग्री उपलब्ध कराती है।सीपीए का कोई अलग स्वतंत्र वार्षिक बजट नहीं होता, बल्कि यह दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग के कुल बजट के भीतर काम करती है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में चिकित्सा आपूर्ति और खरीद से जुड़े मदों में यह व्यवस्था लगभग 300 करोड़ के आसपास रही।
