बुक-शेल्फ: लाज़वाब शख्सियतें: कुछ लाइक्स @ डॉ. सुधीर सक्सेना

घटित होते इतिहास का आईना
• डॉ. सुधीर सक्सेना
अजय बोकिल पत्रकार-लेखक हैं, लिहाजा हम समानधर्मा या हमबिरादर या एक ही वृहत्तर कुल के सदस्य हैं। वह मुझसे कुछ कनिष्ठ हैं; कुछ साल छोटे। उन्हें पत्रकारिता में करीब चार दशक होने को आये। इधर करीब दो दहाइयों से मैं उनके लेखन को बारीकी से देखता आया हूँ और उनके लिखे को पसंद करता हूं। पसंद इसलिये नहीं कि उन्होंने बड़ी ऊंचाइयां छुई हैं, बल्कि इसलिये कि एक तो वह ऊर्जावान हैं, चेतस हैं, पूर्वाग्रह और दुराग्रह से परे हैं, खूब पढ़ते हैं और अपने को निरंतर माँजते रहे हैं। वह फौरी फतवे नहीं देते, आक्रामक या तल्ख नहीं होते, सन्दर्भों में गहरे धँसते हैं और सरल-सहज तरीके से कथ्य को प्रस्तुत करते हैं। उनकी भाषा अलंकृत, कृत्रिम या किताबी नहीं है, बल्कि उसमें रवानी है, वह बहते नीर की मानिंद है। उसमें लोल लहरें हैं, प्रवाह है, स्निग्धता है। वह तटबंधों को तोड़ती नहीं, बल्कि उससे अठखेलियां करती और नयी ऊर्मिंयां रचती है। बाज वक्त वह उसमें त्वरा से चमक पैदा करते हैं। भाषा को लेकर वह शुद्धतावादी या रूढ़िप्रिय नहीं हैं उनमें किंचित टकसाली वृत्ति भी है। मराठी भाषी होना उनकी भाषा को अलग रंगत देता है।
इन्हीं अजय बोकिल की एक किताब आई है : ‘लाजवाब शख्सियतें : कुछ लाइक्स।’ यह उनकी दूसरी किताब है। इसके पहले उनकी एक किताब आई थी : ‘कोरोना काल की दंश कथायें।’ इस दूसरी किताब में उनके विभिन्न सेलेब्रिटीज, व्यक्तियों, चरित्रों और स्मारकों पर लिखे लेखों का संकलन है। इसमें उनके मन की बातें है; सीधी निर्भीक और बेलाग। पौने तीन सौ पन्नों की इस किताब की शुरूआत पिक बैनी लता मंगेशकर से होती है, जिसे वह ‘सुस्वरा’ कहते हैं और मानते हैं कि उसमें पराकाष्ठा के शिखरों को वामन बना देने की शक्ति है। उसके सप्त सुरों में नवरसों की परिपूर्णता है और उसका गायन चित्त को चित्त से जोड़ता है। वह लिखते हैं कि लता आत्मा से गाती है। सुरों की कोई ममी नहीं होती और लता दीदी के स्वर श्रोता की आत्मा से एकाकार हो जाते हैं। उनके स्वर वह रस पैदा करते हैं; जिससे पूरी दुनिया समरस हो सके। यह उद्वरण इसलिये कि आप अजय के लेखन की तासीर बूझ सकें ओर उसके अंदाजे-बयां को जान सकें। इससे अगला ही लेख अभिनय सम्राट दिलीप कुमार पर है। शीर्षक है : युग पुरूष के नाभि चक्र में अद्वितीय दिलीप कुमार। पहले नाभि चक्र और फिर अद्वितीय। शब्द नया चाक्षुष बिंब रचते हैं। यह वही दिलीप साहब हैं, जो बालीवुड के इतिहास को दो भागों में बांट देते हैं : दिलीप पूर्व और दिलीप पश्चात। दिलीप एक्टिंग के वो आचार्य हैं, जिनके सबक बार-बार दोहराये जाते हैं और आगे भी दोहराये जाते रहेंगे। …. बाजार उनके कॅरियर को डिक्टेट नहीं करता। उलटे उन्होंने बाजार को डिक्टेट किया।” अजय मानते हैं कि दिलीप साहब अभिनय के साथ आकाशीय ऊंचाई भी है। उनके स्कूल के सबक सोने से खरे हैं और जो अपने समय में खरा है, वह हर युग में खरा रहेगा।
तो यह है एथिक्स और एस्थेटिक्स का परिपाक। अजय बिग बी पर लिखते हैं। भूपिंदर सिंह पर लिखते हैं। मोहम्मद रफी, टॉम आल्टर, बाला सुब्रमण्यम, रजनीकांत, ओमपुरी, श्रीदेवी, इरफान खान, सलमान खान पर लिखते हैं। और तो और वह सिने गीतकार अभिलाष पर भी लिखते हैं, जिसने ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ जैसा प्रार्थना गीत लिखा। वह राहुल बजाज, स्टीफन हाकिंग, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, एमएस धोनी, सनी लियोन, जसदेव सिंह, करूणानिधि, कल्याण सिंह, एलके अडवाणी, मायावती, राहुल गांधी, रॉबर्ट वाड्रा, श्रीधरन, शरद यादव, जसवंत सिंह, मुलायम सिंह आदि पर लिखते हैं, लेकिन तब ज्यादा अच्छा लगता है और उनकी खोजी वृत्ति और दृष्टिकोण का पता चलता है। जब वह योग शिक्षिका राफिया नाज, असाध्य रोगी अर्पण सरकार, जूतों के अस्पताल के मालिक नरसीराम, वृक्ष-सखी इलांगबाम बेलेंतीना, त्रिवेंद्रम की युवतम महापौर आर्या राजेन्द्रन, रेडियो आरजे मलिष्का, उड़नपरी हिमा दास, दुनिया में विशालतम परिवार के मुखिया जिओन चाना, छत्तीसगढ़ की लोक गायिका पूनम तिवारी, ग्रेटा थनबर्ग या सायबोर्ग के बारे में लिखते हैं। उनके ये सूचनाप्रद लेख हमारे ज्ञानकोष को समृद्ध करते हैं। उनके ये लेख सतही या हवा-हवाई न होकर व्यापक संदर्भों की पर्तें उघाड़ते हैं। वह जब गंगा की शुद्धता पर लिखते हैं तो सम्राट अकबर की बात करते हैं, जब किन्नरों पर लिखते हैं, तो मलिक काफूर का जिक्र करते हैं और हिन्दु बनाम हिंदुत्व की बात करते हैं, तो भारत को पुण्यभूमि और पितृभूमि मानने वाले सावरकर की ही बात नहीं करते, करन उन चंद्रनाथ वसु की भी बात करते हैं; जिन्होंने सन 1892में पहले पहल ‘हिन्दुत्व : हिन्दू पत्रिका इतिहास में हिंदुत्व शब्द का प्रयोग किया था। अपने कतिपय लेखों में अजय दीवार पर लिखी इबारतों को पढ़ते नजर आते हैं और अपने निष्कर्षों को भी परोसते हैं, लेकिन ऐसा वह तभी करते हैं, जब वह स्वयं ‘कन्विंस’ या आश्वस्त होते हैं। 94वें ऑस्कर समारोह में जब वह बिल स्मिथ और क्रिस रॉक के अप्रिय प्रसंग के बहाने कॉमेडी कला की बात करते हैं, तो धार्मिक-राजनीतिक कॉमेडी पर संकट की भी बात करते हैं। वह कुणाल कामरा और मुनब्बर फारूकी का जिक्र करते हैं और कहते हैं कि कॉमेडी का जवाब कॉमेडी हो सकता है, थप्पड़ नहीं।
किताब में संकलित कुछ लेख अलहदा किस्म के हैं और उन्हें वर्गीकृत करना कठिन है। उनसे अजय के पत्रकारीय या लेखकीय व्यक्तित्व का पता चलता है। ऐसा ही एक लेख है ‘माणिक से काफी पहले लीलाधर जोशी ने लिखी थी सादगी की स्क्रिप्ट यह दस्तावेजी लेख है। मीडिया पर एक-दो आलेखों के अलावा एक लेख है : एक लोकतंत्रवादी अखबार की मौत पर दो आंसू। यह हांगकांग के ‘एप्पल डेली’ पर एकाग्र है और 2015 में सुश्री चान पुई मान के पहली महिला प्रधान संपादक बनने के बाद की अभिव्यक्ति की निर्भीक शोकांतिका की गाथा है। यह लेख समकाल में मीडिया की दशा और दिशा की बात करता है। अजय दमन के लिए दक्षिण और वाम की यकसां लानत मलामत करते हैं। लोकशाही और राजशाही की तर्ज पर वह नया शब्द गढ़ते हैं ‘ठोकशाही।’ मुर्गे की अभिव्यक्ति की आजादी के हक में एक न्यायोचित मांग दिलचस्प है। इसमें और अन्यत्र भी। चुहल है और तंज भी। मुर्गा फ्रांस का राष्ट्रीय पक्ष है। उसे कोर्ट में घसीटने पर अदालत फैसला सुनाती है कि मुर्गे को बांग देने का नैसर्गिक आधार है। सुबह-सुबह मुर्गे की बांग में रूमानियत नजर आना एक नया रूपक गढ़ता है।
किताब में कुछ ऐसे लेख उन लोगों के बारे में हैं, जिन्होंने अजय के पत्रकारीय व लेखकीय व्यक्तित्व की रचना में बड़ी भूमिका निभाई है। अभय छजलानी, प्रभु जोशी, अजय यादव और महेंद्र सेठिया के बारे में आलेख ऐसे ही आलेख हैं। ये आलेख हमारे वक्त का रोजनामचा भी हैं। ये हमें शब्द-संसार के अंतर्लोक की सैर कराते हैं और बीते कालखंड के व्यक्तित्वों के बहाने मानवीय भावनाओं की सुरभि का एहसास कराते हैं। अजय ने प्रभुदा की यह सीख गांठ बांध ली कि आपका दृष्टिकोण आपके लेखन की विश्वसनीयता को स्थापित करता है। उन्होंने उनकी यह बात भी मानी कि किताब घटित होते इतिहास का आईना है। बड़े लोगों की संगत का असर अजय पर पड़ा। उन्होंने निकष निर्मित किये और उन पर खरा उतरने की कोशिश की। इसी की बदौलत वह ‘बेशक राजनीतिक लड़ाइयां हमेशा लंबी होती हैा, लेकिन उसे लड़ने के तरीके समय सापेक्ष होने चाहिये जैसे निष्कर्ष प्रस्तुत कर सके।
किताब में काव्योपम उक्तियों की कमी नहीं है। पृष्ठ 64 पर लेख का शीर्षक है – ‘मनुष्यता की वो तस्वीरें जिनसे गांधीवाद का कोलाज़ बनता है पठनीय है। युवा कलेक्टर प्रीति मैथिल, आईएएस स्वरोचित सोमवंशी, कोटा की कलेक्टर रूक्मणि रियार, मेघालय के राम सिंह धर, त्रिशूर की अपर्णा लव कुमार, मणिपुर के आर्मस्ट्रांग, बलरामपुर के अवनीश शरण का नजीरों के सहारे अजय कहते हैं –“गांधी आज भी जिंदा हैं और समाज की किसी न किसी खिड़की से झांक रहे हैं।” बेशक समाज और मानवता की सेवा ही गांधी दर्शन का व्यावहारिक और सगुण स्वरूप है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की पूर्वपीठिका में भारतीय राजनीति में मुलायम सिंह और लालू यादव की भूमिका का आकलन अजय की काबिले गौर निष्पत्ति है। कुल जमा यह किताब उनसे बड़े फलक के दस्तावेजी लेखन की उम्मीदें जगाता है।
लाज़वाब शख्सियतें : कुछ लाइक्स…
