ब्रेकिंग: नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं सुशीला कार्की, शपथ ग्रहण के साथ संभाला पदभार; भारत से है खास रिश्ता

नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं सुशीला कार्की, शपथ ग्रहण के साथ संभाला पदभार

काठमांडू। नेपाल में राजनीतिक उठापटक के बीच सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया है। उन्होंने राष्ट्रपति भवन में शपथ ग्रहण कर पदभार संभाला।

इस अवसर पर उपराष्ट्रपति रामसहाय यादव, प्रधान न्यायाधीश प्रकाश सिंह रावत, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. बाबूराम भट्टराई, सेनापति जनरल अशोक राज सिग्देल और मुख्य सचिव एकनारायण अर्याल सहित कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

शपथ ग्रहण समारोह में काठमांडू के मेयर बालेन शाह भी मौजूद थे। वहीं, इस अवसर पर आंदोलन के कारण पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली, प्रचंड, शेर बहादुर देउबा, माधव नेपाल और झालानाथ खनल अनुपस्थित रहे।

सुशीला कार्की नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने देश में हाल ही में उत्पन्न हुए राजनीतिक संकट के दौरान अंतरिम नेतृत्व संभाला।

नेपाल के इतिहास में 1960 से 1990 तक के समय को ‘पंचायत शासन’ कह सकते हैं. इस दौरान कई नेपाली हस्तियों को जेल में रहना पड़ा. 90 के दशक में विराटनगर जेल में बंद ऐसी ही एक महिला अपनी आने वाली एक किताब की पृष्ठभूमि रच रही थीं. पुस्तक का नाम था, ‘कारा’ यानी कि जेल. लोकतंत्र के विरूद्ध स्थापित एक व्यवस्था के दौरान अपने जीवन के महत्वपूर्ण पलों को जेल में बिताने वाली ये महिला, आगे चलकर नेपाल में खूब चर्चित हुईं. और जब साल 2025 के सितंबर महीने में नेपाल में Gen Z की अगुवाई में लोकतंत्र को फिर से परिभाषित करने की जरूरत पड़ी, तो उनका नाम फिर से इतिहास में दर्ज हुआ.

1997 से 2012 के बीच पैदा हुए लोग, जिनको Gen Z कहते हैं, 2025 में उनकी अधिकतम उम्र 30 साल हो सकती है, इसी साल में उस महिला की उम्र 73 साल है, जिनको Gen Z ने अपने प्रतिनिधी के तौर पर नेपाल के अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में चुन लिया है. नाम है- सुशीला कार्की.

कार्की का भारत से खास रिश्ता है। वह कहती हैं मैं अपने शिक्षकों, दोस्तों को आज भी याद करती हूँ. गंगा नदी, उसके किनारे हॉस्टल और गर्मियों की रातों में छत पर बैठकर बहती गंगा को निहारना मुझे आज भी याद है.”

उन्होंने यह भी कहा कि वे बिराटनगर की रहने वाली हैं, जो भारत की सीमा से काफ़ी नज़दीक है. “मेरे घर से सीमा केवल लगभग 25 मील दूर है. मैं नियमित रूप से बॉर्डर मार्केट जाती थी. मैं हिंदी बोल सकती हूँ, उतनी अच्छी नहीं लेकिन बोल सकती हूँ.”

भारत से उम्मीदों पर उन्होंने कहा, “भारत और नेपाल के रिश्ते बहुत पुराने हैं. सरकारें अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन जनता का रिश्ता बहुत गहरा है. मेरे बहुत से रिश्तेदार और परिचित भारत में हैं. अगर उन्हें कुछ होता है, तो हमें भी आँसू आते हैं. हमारे बीच गहरी आत्मीयता और प्रेम है. भारत ने हमेशा नेपाल की मदद की है. हम बेहद क़रीबी हैं. हाँ, जैसे रसोई में बर्तन एक साथ हों तो कभी-कभी आवाज़ होती है, वैसे ही छोटे-मोटे मतभेद हो सकते हैं, लेकिन रिश्ता मज़बूत है.”

सीएनएन-न्यूज़ 18 को दिए एक इंटरव्यू में सुशीला कार्की ने कई बातें कही थीं. इंटरव्यू की शुरुआत में उनसे नेपाल की मौजूदा स्थिति पर नज़रिया पूछा गया.
इस पर उन्होंने कहा, “जेन ज़ी समूह ने नेपाल में आंदोलन शुरू किया. उन्होंने मुझसे कहा कि उन्हें मुझ पर विश्वास है और मैं एक छोटे समय के लिए सरकार चला सकती हूँ, ताकि चुनाव कराए जा सकें. उन्होंने मुझसे अनुरोध किया और मैंने स्वीकार किया.”

कार्की ने कहा, “मेरा पहला ध्यान उन लड़कों और लड़कियों पर होगा, जो आंदोलन में मारे गए. हमें उनके लिए और उनके परिवारों के लिए कुछ करना होगा, जो गहरे दुख में हैं.”

उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन की पहली मांग प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा थी, जो पूरी हो गई है. अब अगली मांग देश से भ्रष्टाचार हटाने की है. उनके शब्दों में, “बाक़ी माँगें तभी पूरी हो सकती हैं, जब सरकार बनेगी.”

नेपाल के सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार, सुशीला कार्की का जन्म 7 जून 1952 को नेपाल के बिराटनगर में हुआ था.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, उन्होंने 1972 में बिराटनगर से स्नातक किया.

1975 में उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की और 1978 में त्रिभुवन विश्वविद्यालय से क़ानून की पढ़ाई पूरी की.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि 1979 में उन्होंने बिराटनगर में वकालत की शुरुआत की.

इसी दौरान 1985 में धरान के महेंद्र मल्टीपल कैंपस में वे सहायक अध्यापिका के रूप में भी कार्यरत रहीं.

उनकी न्यायिक यात्रा का अहम पड़ाव 2009 में आया, जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट में अस्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया.
2010 में वे स्थायी न्यायाधीश बनीं. 2016 में कुछ समय के लिए वे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रहीं और 11 जुलाई 2016 से 6 जून 2017 तक नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश के रूप में पद संभाला. सुशीला कार्की के सख़्त रवैए के कारण उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा.

सुशीला कार्की ने नेपाली कांग्रेस के नेता दुर्गा सुबेदी से शादी की. वह कहती हैं कि उनके पति के सहयोग और ईमानदारी ने वकील से मुख्य न्यायाधीश तक के उनके सफ़र में अहम भूमिका निभाई.

बिराटनगर और धरान में तीन दशकों से ज़्यादा समय तक वकालत करने के बाद उन्होंने सीधे सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के रूप में प्रवेश किया.

सुशीला कार्की तब सुर्खियों में आईं जब उन्होंने कांग्रेस नेता जेपी गुप्ता को संचार मंत्री के पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार के एक मामले में दोषी ठहराया. कार्की ने काफ़ी समय पहले बीबीसी नेपाली को दिए साक्षात्कार में यह भी कहा था कि वह अक्सर अपनी बेंच में भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई करती हैं.

हालांकि, मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने लगभग 11 महीने के कार्यकाल के दौरान उन्हें महाभियोग का सामना करना पड़ा और उन्हें निलंबित कर दिया गया.

अप्रैल 2017 में उस समय की सरकार ने संसद में उनके ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव रखा.

आरोप लगाया गया कि उन्होंने पक्षपात किया और सरकार के काम में दखल दिया. प्रस्ताव आने के बाद जाँच पूरी होने तक उन्हें मुख्य न्यायाधीश के पद से निलंबित कर दिया गया.

इस दौरान जनता ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता के समर्थन में आवाज़ उठाई और सुप्रीम कोर्ट ने संसद को आगे की कार्रवाई से रोक दिया.

बढ़ते दबाव के बीच कुछ ही हफ़्तों में संसद को प्रस्ताव वापस लेना पड़ा. इस घटना से सुशीला कार्की की पहचान एक ऐसी न्यायाधीश के रूप में बनी, जो सत्ता के दबाव में नहीं झुकतीं.

बता दें कि सुशीला कार्की के साथ ही इस आंदोलन में काठमांडू के मेयर बालेन शाह का नाम भी सुर्ख़ियों में रहा है.

बालेन शाह मई 2022 में जब पहली बार नेपाल की राजधानी काठमांडू के मेयर बने, तो यह सबके लिए चौंकाने वाला था. बालेन शाह ने नेपाली कांग्रेस की सृजना सिंह को हराया था. शाह को 61,767 वोट मिले थे और सृजना सिंह को 38,341 वोट.

नेपाल में जब जेन ज़ी का आंदोलन शुरू हुआ तो सोशल मीडिया पर लोग बालेन शाह से अपील कर रहे थे कि वह मेयर के पद से इस्तीफ़ा देकर नेतृत्व करें. महज 35 साल के बालेन शाह नेपाल में जेन ज़ी के आंदोलन का समर्थन कर रहे थे लेकिन वह सड़क पर नहीं उतरे थे.

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