छत्तीसगढ़ के स्कूलों में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और मंत्रोच्चार अनिवार्य, सरकार और विपक्ष आमने-सामने

रायपुर, 13 जून 2026। छत्तीसगढ़ सरकार ने नए शैक्षणिक सत्र 2026-27 से प्रदेश के सभी सरकारी और निजी विद्यालयों में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, राज्यगीत तथा चयनित वैदिक मंत्रों के सामूहिक वाचन को अनिवार्य करने का निर्णय लिया है। स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी निर्देशों के बाद यह फैसला राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बन गया है।
शिक्षा विभाग के अनुसार, विद्यालयों की नियमित प्रार्थना सभा में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और राज्यगीत के साथ कुछ वैदिक मंत्रों का सामूहिक उच्चारण कराया जाएगा। सरकार का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों में अनुशासन, सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय एकता और भारतीय परंपराओं के प्रति सम्मान की भावना विकसित करना है।
सरकार के प्रतिनिधियों का तर्क है कि विद्यालय केवल शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थान नहीं हैं, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण और संस्कार विकास के भी महत्वपूर्ण केंद्र हैं। उनका मानना है कि राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और प्रेरणादायक मंत्रों का नियमित वाचन छात्रों में सकारात्मक सोच, नैतिक मूल्यों और देशभक्ति की भावना को मजबूत करेगा।
हालांकि, इस निर्णय को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था को किसी विशेष विचारधारा से जोड़ने के बजाय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शिक्षकों की कमी, स्कूलों में आधारभूत सुविधाओं और शैक्षणिक सुधारों जैसे मुद्दों पर प्राथमिकता से ध्यान दिया जाना चाहिए। कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि राज्य के सभी वर्गों और समुदायों की भावनाओं का सम्मान करते हुए ऐसे निर्णयों पर व्यापक चर्चा आवश्यक है।
इस मुद्दे पर शिक्षा विशेषज्ञों की राय भी बंटी हुई दिखाई दे रही है। कुछ विशेषज्ञ इसे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं के संरक्षण की दिशा में सकारात्मक पहल मान रहे हैं, जबकि अन्य का मत है कि विद्यालयों में किसी भी नई व्यवस्था को लागू करते समय समावेशिता, विविधता और संवैधानिक मूल्यों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
स्कूल शिक्षा विभाग ने इस संबंध में सभी जिला शिक्षा अधिकारियों, विकासखंड शिक्षा अधिकारियों तथा विद्यालय प्रबंधन समितियों को आवश्यक निर्देश जारी कर दिए हैं। आगामी 16 जून से शुरू होने वाले नए शैक्षणिक सत्र में इस व्यवस्था को लागू किए जाने की संभावना है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार की इस पहल को विद्यार्थियों, अभिभावकों और समाज के विभिन्न वर्गों से किस प्रकार की प्रतिक्रिया मिलती है तथा यह निर्णय शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र में आगे किस दिशा में प्रभाव डालता है।
