नेपाल: विभीषिका से त्रस्त बालेन्द्र शाह जायेंगे यूएन‌ओ @ डॉ. सुधीर सक्सेना

पनबिजलीघरों पर टूटा कहर
• डॉ. सुधीर सक्सेना

भयावह विभीषिका से त्रस्त नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह 24 सितंबर को न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81 वें सत्र को संबोधित करेंगे। वैश्विक नेताओं की इस सालाना बैठक में उनकी शिरकत का मकसद विनाशकारी बाढ़ के हादसे की ओर दुनिया का ध्यान आकृष्ट करना है। शुरूआती दौर में शाह ने भले ही कहा हो कि हमें किसी मदद की जरूरत नहीं है, लेकिन 72 घंटे भी नहीं बीते थे कि वह अंतरराष्ट्रीय मदद की गुहार करने लगे। 26 अगस्त को नेपाल के उत्तरी हिमालयी इलाके में बाढ़ ने ऐसा कहर बरपाया है कि बचाव, राहत और पुनर्निर्माण आसान नहीं है। प्रारंभ में सरकार ने विदेश मंत्री शिशिर खनाल के नेतृत्व में शिष्ट-मंडल भेजने की योजना बनाई थी, लेकिन बाढ़ के तांडव और विनाश के मद्‌देनजर, प्रधानमंत्री शाह ने खुद न्यूयार्क जाने का फैसला किया है।
जहां तक प्रधानमंत्री शाह के संभावित संबोधन का प्रश्न है, विभीषिका की तस्वीर प्रस्तुत करने के साथ ही वह त्रास‌दी की मुख्य वजह ग्लोबल वार्मिंग का ठीकरा अड़ोस-पड़ोस और बड़े देशों पर फोड़ सकते हैं। चूंकि, ग्लोबल वार्मिंग वैश्विक मुद्दा है और उसके लिए बड़े और विकसित राष्ट्र जिम्मेदार हैं, वह मुक्त हस्त सहायता के साथ ही मुआवजे की मांग कर सकते हैं। नेपाल जलवायु-परिवर्तन, पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र और कमजोर विकासशील देशों की जरूरतों जैसे मुद्दा के लिये यूएनओं के मंच का इस्तेमाल कर सकता है। विलाशक पुनर्निर्माण के लिये उसे जितने फंड की दरकार है, उतना जुटाना उसके बूते के बाहर की बात है।
इस सारे घटनाक्रम का उल्लेखनीय पहलू है कि हिन्दुकश-हिमालय क्षेत्र में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु-परिवर्तन स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि इसके लिये बड़े ग्रीन हाउस उत्सर्जक देश जिम्मेदार हैं। अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन और अन्य औद्योगिक देश दुनिया में कार्बन-उत्सर्जन में अव्वल हैं, जिससे वैश्विक तापमान बढ़ता है और इसका असर तीसरे ध्रुवर (हिंदुकुश – हिमालय) पर पड़ता है। हिन्दुकुश-हिमालय क्षेत्र आठ देशों-भारत, चीन, अफगानिस्तान, पाकिस्तन, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार में फैला हुआ है। चीन और भारत इनमें बड़े और प्रमुख हैं। अतः वे महा-आपदा के दोष से मुक्त नहीं हो सकते।
यह बात छिपी नहीं रह गई है कि सर्वाधिक मौतें और क्षति स्थापित और निर्माधीन जलविद्युत परियोजनाओं में हुई है। बाढ़ से रसुवा व नवाकोट जिलों की 12 पनबिजली परियोजनाओं को भारी नुकसान हुआ है। इनमें कार्यरत 900 से अधिक श्रमिक लापता हैं। अनुमान है कि इनमें से लगभग 500 से 600 मजदूर कीचड़ और मलबे से भरी सुरंगों में फंस गये हैं। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के मुताबिक भोटे कोशी और त्रिशली घाटियों में ग्लेशियर (हिमनद) ढहने से 14 से अधिक हाइ‌ड्रो पावर प्रोजेक्ट तबाह या क्षतिग्रस्त हो गये हैं। इन इलाकों में रेस्क्यू आपरेशनों में नेपाली पुलिस और सेना के अलावा भारत, चीन और कोरिया के विशेषज्ञ और श्वान दस्ते जुटे हुये हैं। सुरंगों में पाइपों से आक्सीजन पहुंचाई जा रही है और अनुमान है कि इससे कई तकनीशियनों और मजूरों की प्राणरक्षा हो सकती है। जल प्रलय से 12 पनबिजली प्रोजेक्टों में बिजली उत्पादन ठप हो गया है, जिसका असर भारत भौर बांग्लादेश को विद्युत-निर्यात पर पड़ा है।

आलेख : डॉ. सुधीर सक्सेना

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