क्या चर्चिल कांग्रेस में लौटेंगे?
- डॉ. सुधीर सक्सेना

चर्चिल ब्राज अलेमाओं छोटे और तटीय राज्य गोवा के बड़े क्षत्रप हैं। वह धनाढ्य और रसूखदार शख्सियत हैं। वह चर्चित रहे हैं और विवादास्पद भी। उनके खाते में कई सुनहरी उपलब्धियां है। इनमें सर्वप्रथम हैं मुख्यमंत्रित्व। वह मार्च-अप्रैल, सन 1990 में गोवा के मुख्यमंत्री थे। सन 1996-98 और सन 2004-07 में वह दक्षिण गोवा से निर्वाचित सांसद रहे। यही नहीं, इसके पूर्व वह बेनोलिम और नावेलिम निर्वाचन क्षेत्रों से चार बार राज्य विधानसभा के लिये चुने गये। कथानक दिलचस्प इस नाते हैं कि वह पहलेपहल सन 1989 में राज्य विधानसभा के लिये चुने गये और अगले ही वर्ष उन्हें चीफ मिनिस्टर बनने का गौरव मिला। इसे नियति कहें या योगायोग कि वह केवल सत्रह दिन ही इस पद पर रह सके। कालक्रम के मान से वह प्रतापसिंह राणे के बाद गोवा के दूसरे मुख्यमंत्री थे लेकिन उन्हें तकरीबन एक पखवाड़े में ही लुई बारबोसा को सत्ता सौंपनी पड़ी।
16 मई, सन 1949 को पोर्चुगीज गोवा में कार्मोना में जनमे चर्चिल ने बतौर सांसद और एमएलए खूब सुर्खियां बटोरीं। उन्होंने अपनी यात्रा यूनाइटेड गोवंस डेमोक्रेटिक पार्टी के बैनर तले शुरू की और विभक्त दल के संस्थापक बने। सन 80 के दशक के उत्तरार्द्ध में उसे अलविदा कह वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े। कांग्रेसनीत प्रोगेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट के सत्ता में आने पर वह चंद दिनों के लिये सूबे के मुखिया बने, किंतु आंतरिक खटपट से इस्तीफा देने को बाध्य हुये। बावजूद इसके कांग्रेस से उनका नाता जुड़ा रहा और वह उसी की टिकट पर चुने जाकर लोकसभा में पहुंचे। उनकी महत्वाकांक्षा उन्हें कुछ न कुछ करने को प्रेरित करती रही। फलत: मार्च, 2007 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और सेव गोवा फ्रंट की स्थापना की। फ्रंट ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और दो पर विजय प्राप्त की। फ्रंट प्रत्याशी के तौर पर वह और अलीक्सो लौरेंसा विजयी रहे। चूंकि, स्पष्ट बहुमत किसी को भी नहीं मिला था, अत: कांग्रेस के नेतृत्व में मिली जुली सरकार बनी तो फ्रंट उसका घटक दल था। चर्चिल को मंत्री पद मिला।
चर्चिल और उनके परिवार पर भाग्य अधिक दिनों तक मेहरबान नहीं रहा। मार्च, 2012 में असेंबली चुनाव में चर्चिल, उनके भाई जोआकिम, पुत्री वलांका और भतीजा यूरी चुनाव हार गये। चर्चिल ने अलेमाओ-परिवार के चार सदस्यों की पराजय पर मुख्यमंत्री दिगंबर कामत और ईवीएम पर तोहमत जड़ी। सन 2014 में वलांका के दक्षिण गोवा से टिकट देने पर इंकार करने पर उन्होंने कांग्रेस छोड दी और निर्दल लड़ने का ऐलान किया। दो ही दिन बाद उन्होंने तृणमूल कांग्रेस ज्वाइन करने की घोषणा की और उसकी टिकट पर लोकसभा के लिये चुनाव लड़ा, मगर मुह की खाई। उन्हें बमुश्किल करीब 12 हजार वोट मिले। इसके बाद उन्होंने फिर पैंतरा बदला और अक्टूबर, 2016 में एनसीपी में शरीक हो गये। यह दाँव उन्हें फला और सन 2017 में वह बेनोलिम से असेंबली के लिये चुने गये। इसके बाद भी वह चैन से नहीं बैठे और 13 दिसंबर, 2021 को टीएमसी में लौट आये।
ताजा चुनाव में टीएमसी के दयनीय प्रदर्शन और बिखराव के बाद 77 वर्षीय चर्चिल नया अशियाना तलाश रहे हैं। स्वभाविक तौर पर उनका ध्यान कांग्रेस की ओर गया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि उन्हें कांग्रेस में लौटने पर खुशी होगी। उनकी छोटी सी शर्त है, बशर्ते कांग्रेस ‘एप्रोच’ करे। वह साधन संपन्न कुबेर नेता हैं। इधर उन्हें कोंकणी-गायन का शौक चर्राया है। उनकी फुटबॉल टीम चर्चिल ब्रदर्स लीग मैचों में चर्चित रही है। बेटी वलांका इसकी सीईओ है। सन 2017 के चुनाव में उन्होंने करीब 15 करोड़़ रूपयों की संपत्ति की घोषणा की थी। देखना दिलचस्प होगा कि एक और पारी खेलने को लालायित चर्चिल के लिये कांग्रेस अपने दरवाजे खोलती है या नहीं?
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