राज्यपाल व राष्ट्रपति को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए कोई समय सीमा निश्चित नहीं कर सकती कोर्ट

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति-राज्यपाल की विधेयकों से जुड़े अहम संवैधानिक प्रश्नों पर सर्वसम्मति से व्यवस्था दी है कि अदालत संविधान के अनुच्छेद 200 व 201 के तहत राज्यपाल व राष्ट्रपति को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए कोई समय सीमा निश्चित नहीं कर सकती। चीफ जस्टिस (सीजेआई) बीआर गवई की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान बेंच ने अपने आदेश में यह भी कहा कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चित काल के लिए नहीं रोक सकते और विधेयक के गुण-दोष की समीक्षा किए बिना उन पर समयबद्ध निर्णय के लिए अदालतें न्यायिक समीक्षा कर सीमित निर्देश दे सकती हैं।
सीजेआई गवई के साथ जस्टिस जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की बेंच ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की ओर से संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत मांगे गए संदर्भ पर यह राय दी है। संविधान बेंच की इस राय से व्यावहारिक रूप में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच का गत आठ अप्रैल को दिया वह फैसला उलट गया है जिसमें राज्य विधानसभा से पारित विधेयकों पर निर्णय के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए तीन माह की समय सीमा तय कर दी गई थी। गौरतलब है कि तमिलनाडु सरकार की उस याचिका पर आए दो जजों के फैसले के बाद ही मई में राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से 14 बिंदुओं पर राय मांगी थी।
राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से इन 14 बिंदुओं पर मांगी थी राय
1 विधेयक आने पर राज्यपाल के अनुच्छेद 200 के अंतर्गत पास क्या संवैधानिक विकल्प ?
- मंजूरी दे, राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखे या पुनर्विचार के लिए टिप्पणियों के साथ विधानमंडल को लौटाए। राज्यपाल के पास बिल रोकने का विकल्प नहीं।
2 – क्या अनुच्छेद 200 के तहत 2 विकल्पों के प्रयोग के लिए राज्यपाल मंत्री परिषद की सलाह पर बाध्य ?
- नहीं। यदि बाध्य होते तो पुनर्विचार के लिए लौटाने का विकल्प नहीं होता।
3 अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के संवैधानिक विवेक प्रयोग की न्यायिक समीक्षा हो सकती है?
- नहीं। राज्यपाल के निर्णय के गुण-दोष की समीक्षा नहीं हो सकती पर लंबे समय तक, अस्पष्ट निर्णय या अनिश्चितकाल तक निर्णय न लेने पर कोर्ट विचार कर निर्देश दे सकती है।
4 को अनुच्छेद 200 के तहत मिली शक्ति की न्यायिक समीक्षा पर प्रतिबंध लगाता है?
- नहीं। अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपालों को व्यक्तिगत उन्मुक्ति प्रदान करता है कि वह किसी भी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं लेकिन राज्यपाला के कार्यालय को संवैधानिक निष्क्रियता से संबंधित न्यायिक समीक्षा से नहीं बचाता।
5,6,7 क्या अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल और 201 के तहत राष्ट्रपति को निर्णय लेने के लिए अदालत समय सीमा लागू कर सकता है? क्या राष्ट्रपति का संवैधानिक विवेक के प्रयोग की न्यायिक समीक्षा हो सकती है? – नहीं। कोर्ट राष्ट्रपति या राज्यपाल को विधेयक पर निर्णय के लिए समय सीमा में नहीं बांध सकते। न्यायपालिका के लिए यह अनुचित। राज्य के किसी विधेयक को मंजूरी के बारे में निर्णय की न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती।
8 – क्या राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयक सुरक्षित रखने पर राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट की राय लेनी होगी?
- नहीं। राष्ट्रपति की व्यक्गित संतुष्टि ही पर्याप्त है। अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से हार बार राय लेने की जरूरत नहीं।
9 – राज्यपाल/राष्ट्रपति के विधेयक पर निर्णय से पहले विधेयक की विषय वस्तु की न्यायिक समीक्षा हो सकती है?
- नहीं। न्यायिक समीक्षा केवल कानून बनने के बाद ही हो सकती है। विधेयक केवल प्रस्तावित कानून है जो मंजूरी के बाद कानून बनते हैं।
10 – क्या राष्ट्रपति/राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों के प्रयोग को अनुच्छेद 142 (सुप्रीम कोर्ट की संपूर्ण न्याय के लिए विशेष शक्ति) से बदला जा सकता है?
- नहीं। राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका का काम करने करने के लिए अनुच्छेद 142 का प्रयाग नहीं हो सकता।
11- क्या राज्य विधायिका द्वारा बनाया गया कानून राज्यपाल की सहमति के बिना लागू हो जाता है?
- नहीं। कोई विधेयक राज्यपाल या नियमानुसार राष्ट्रपति की विशिष्ट स्वीकृति के बिना कानून नहीं बन सकता।
12 – क्या सुप्रीम कोर्ट की बेंच विधि के महत्वपूर्ण प्रश्न पर चर्चा से पहले यह निर्णय करे कि इस मामले को अनुच्छेद 145(3) के तहत पांच जजों बेंच को भेजे?
- सीधा जवाब नहीं। यह प्रश्न विधायी स्वीकृति से संबंधित मौजूदा संदर्भ को देखते हुए अप्रासंगिक है।
13 – क्या अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट कानून तक सीमित है या मूल प्रावधानों तक निर्देश पारित करने तक विस्तारित?
- प्रश्न व्यापक, जवाब देना कठिन लेकिन इसका उपयोग मूलभूत संवैधानिक प्रावधानों को रद्द करने के लिए नहीं किया जा सकता।
14 – क्या अनुच्छेद 131 केंद- राज्य विवादों को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी अन्य क्षेत्राधिकार पर रोक लगाता है?
- अप्रासंगिक सवाल, उत्तर नहीं दिया।
एक स्वर में बोलना चाहते थे, साथी जजों का धन्यवाद : सीजेआई
सीजेआई गवई ने अपने अंतिम कार्यदिवस (शुक्रवार) से एक दिन पहले सुनाए गए सर्वसम्मत फैसले के बाद कहा कि पांच जजों की बेंच एक स्वर में बोलना चाहती थी। सीजेआइ ने इस सर्वसम्मत राय तक पहुंचने में सामूहिक प्रयासों के लिए बेंच के साथी जजों को धन्यवाद भी दिया।
दोनों पक्षों ने की सराहना
संविधान बेंच के फैसले की दोनों पक्षों, सरकार और राष्ट्रपति संदर्भ के विरोधियों ने सराहना की है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राष्ट्रपति और केंद्र सरकार की ओर से मैं इस ज्ञानवर्धक फैसले के लिए आभार व्यक्त करता हूं। अदालत में राष्ट्रपति संदर्भ के विरोध में पक्ष रखने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इसे बहुत ही विवेकपूर्ण और विचारशील फैसला बताया।
स्वतः स्वीकृति संविधान की भावना के विपरीत
संविधान बेंच ने विधेयकों पर राजभवन से समय सीमा पर मंजूरी नहीं मिलने पर स्वतः मंजूरी (डीम्ड अपुवल) को संविधान की भावना के विपरीत और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ माना। बेंच ने कहा कि डीम्ड अपूवल राज्यपाल के लिए अधिकार का अधिग्रहण है जो अस्वीकार्य है। दो जजों की बेच ने डीम्ड अनुदल की व्यवस्था दी थी।
