क्या ‘बूमरैंग’ होंगे ट्रंप के दाँव? @ डॉ. सुधीर सक्सेना

विश्व-रंग
क्या 'बूमरैंग' होंगे ट्रंप के दाँव?
• डॉ. सुधीर सक्सेना
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समकाल की विलक्षण शख्सियत हैं। कोई नहीं जानता कि अकाचेती वह क्या कर बैठेंगे? वह कभी भी किसी को धमका सकते हैं। कभी भी किसी को कहीं से दफा कर सकते हैं और कभी भी किसी को 'अंतिमेत्थम' दे सकते हैं। दर-अस्ल वह खुद भी नहीं जानते कि वह कब क्या कर बैठेंगे? वस्तुत: वह स्वयं फितरों की गिरफ्त में है। उन्हें कई तरह के मुगालते हैं। कह सकते हैा कि उनके पाँवों में मुगालते का अदृश्य आलता लगा है और उसके चलते वह विश्व मंच पर बेढब चालें चल रहे हैं। एक तो वह सर्वशक्ति मान होने की ग्रंथि से पीड़ित हैं, दूसरे वह दूसरों को 'डिक्टेट' करने में यकीन रखते हैं। किसी की भी चूंचपड़ उन्हें रास नहीं आती। इसी मनोवृत्ति के चलते वह अपने बयानों और फैसलों से विभिन्न देशों की मुश्कें कसने का खेल खेल रहे है। उनकी मंशा है कि उक्राइना के साथ लंबे और अनिर्णीत युद्ध में उलझे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन घुटने टेक दें। नाटो के मुखिया मार्क रूट की भारत, चीन और ब्राजील के राष्ट्राध्यक्षों को सुलह के लिये पूतिन को फोन करने की सलाह को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिये।
डोनाल्ड ट्रंप को न जाने क्यों यह भ्रम हो गया है कि सारी दुनिया उनकी फरमाबरदार है और वह किसी को भी फरमान या हुक्मनामा जारी कर सकते हैं। हम भारतवासी जिंसों पर अनापशनाप महसूल के खेल से ईस्ट इंडिया कंपनी के काल से परिचित हैं। इंग्लैंड के कल-कारखानों को बचाने के लिये अंग्रेजों ने भारतीय माल पर बेतहाशा कर लगाये थे। आज डोनाल्ड ट्रंप विश्व में आंग्ल-अमेरिकी धुरी के मुखिया हैं और आज उन्होंने अत्यंत निर्लज्जतापूर्वक बाकायदा टैरिफ वार छेड़ दिया है। शीतयुद्ध का दौर कब का बीत गया। अमेरिका अब आर्थिक-युद्ध का सूत्रधार है। जिंसों पर महसूल की धमकी ट्रंप का प्रिय शगल है। जिंसों पर टैक्स को हथियार बनाकर वह कतिपय देशों की मेरूदण्ड तोड़ना चाहते हैं। वर्चस्व के ताजा विश्वव्यापी द्वंद्व में टैरिक और आर्थिक पाबंदी ट्रंप के हथियार हैं। मनमाने टैरिफ के गोले दागकर वह कुछ देशों की आर्थिक प्राचीरें ध्वस्त करना चाहते हैं। इसमें दो राय नहीं कि उनकी सबसे बड़ी खुन्नस रूस से हैं और उन्होंने इसका इजहार यह कहकर किया है कि वह व्लादिमीर पूतिन से खुश नहीं चाहते हैं। अब वह चाहते हैं कि इन देशों के शासक पुतिन को फोन करें और उन्हें वार्ता की मेज पर आने को बाध्य करें। उनके फैसले और बयान उनकी ज़ुर्रत की तस्दीक करते हैं और इस मंशा को उजागर करते हैं कि तमाम मुल्कों को अमेरिका के सम्मुख सजदा करना चाहिये। मजेदार बात यह है कि ट्रंप जब चाहे तब अपने बयानों से पलट जाते हैं। पहले वह उक्राइना के राष्ट्रपति जेलिंस्की से कहते हैं कि रूस पर हमला कीजिए मगर जेलिंस्की जब हथियार और साधन मांगते हैं तो गोल-मोल रवैया अख्तियार कर वह उसे बरज देते हैं। अब जेलिंस्की करें तो क्या करें? उन्हें अमेरिका का आसरा है, लेकिन अमेरिका उसे उतनी मदद कतई नहीं देगा कि वह रूस के खिलाफ निर्णाय लड़ाई छेड़ सकें।
ट्रंप के दुबारा राष्ट्रपति बनने के बाद सबसे बड़ा परिवर्तन उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के चरित्र और भूमिका में आया है। 32 देशों के इस सामरिक संगठन के मुखिया नीदरलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री मार्क रूटटे हैं। रूट्टे ट्रंप के खासुलखास हैं। वह उस खिलौने की मानिंद हैं, जो उतना ही चलता है, जितना उसमें चाबी भरी जाती है। बुधवार को रूट्टे ने वाशिंगटन में बयान दिया तो साफ हो गया कि सामरिक संगठन नाटो ट्रंप की शह पर राजनय में भी हिस्सा ले रहा है। यह भी आईने की तरह साफ है कि रूट्टे, जिन्होंने एक अक्टूबर 2024 को कार्यभार संभाला है, ट्रंप की कठपुतली की तरह काम करेंगे। ट्रंप के संकेत पर ही वह धमकी की जुबान बोल रहे हैं। इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि ब्रसेल्स के बाहरी इलाके में एक विशाल परिसर में स्टील और कांच से बनी इमारत में स्थित नाटो आगामी समय में अपने आका ट्रंप के इशारों पर काम करेगा।
बात तेल से शुरू हुई थी। ट्रंप को रूस से चीन और भारत का तेल व्यापार फूटी आंखों नही सुहाता। भारत में प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर की 23 रिफाइनरियां हैं जबकि रूस में 30 और अमेरिका में 131 । अमेरिका तेल का सबसे बड़ा उत्पादक रार्ष्ट है। फिलहाल, तेल अमेरिकी रणनीति का मुख्य हथियार है। भारत कच्चे तेल की 88 प्रतिशत जरूरत के लिए आयात पर निर्भर है। फरवरी 2022 में रूस-उक्राइना जंग बाद जब पश्चिमी राष्ट्रों ने रूसी तेल से दूरी बरती, रूस ने तेल सौदों पर छूट की पेशकश की। भारत ने इसका भरपूर लाभ उठाया। आज चीन और भारत रूसी तेल के प्रमुख खरीददार हैं। जून 2025 के आंकड़ों के मुताबिक भारत के कुल आयात में रूस की भागीदारी 43.2 फीसद थी। यह भागीदारी इराक, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब की संयुक्त भागीदारी से भी अधिक है। जून 2025 में भारत ने रूस से प्रतिदिन 2.08 मिलियन बैरे का आयात किया। जाहिर है कि रूस से तेल आयात भारत की आर्थिकी में मायने रखता है और भारत अमेरिका की धमकी से उससे हाथ नहीं खींच सकता। अमेरिका की धमकी भारत की नजर में बंदर घुड़की इस नाते है क्योंकि शुरू में 500 फीसद विंडफाल टैरिफ से वह 100 प्रशित सेकेंड्री टैरिफ पर उतर आया है। रूसी तेल पर कीमतों की कोई कैपिंग नहीं है, लेकिन अमेरिका ने धौंसपट्टी की रौ में अपने पिट्ठुओं की रजामंदी लेकर 60 डॉलर प्रति बैरेल की कैपिंग लगा दी है। भारत ने इस मामले में सही रूख अपनाया है और राष्ट्रीय हितों को तरजीह देने की बात कही है। उसने नाटो प्रमुख को दोहरे मापदंडों से बाज आने की चेतावनी भी दी है। यह किसी से छिपा नहीं है कि ट्रंप शांति के लिए नोबेले पुरस्कार जीतने को लालायित है। इस्रायल के नेतान्याहू और पाकिस्तान के मुनीर ने इसके लिए ‘लॉबीइंग’ शुरू कर दी है। ट्रंप की धौंस और धमकी से अमेरिका और अन्य देशों में बदमजगी फैलना स्वाभाविक है। उनकी टैरिफ-जंग से भारत, चीन और रूस का नजदीक आना और नये समीकरण बनना तय है। ट्रंप की दादागिरी से नाटो में भी असंतोष खुदबुदा रहा है और फ्रांस, तुर्किये, स्पेन, हंगरी और कनाडा ने उसका इजहार भी किया है। पड़ौसी देशों – कनाडा, क्यूबा, बेनेजुएला और मेक्सिको से अमेरिकी रिश्ते जगजाहिर हैं। धमकी कैसी हो चीन और भारत जैसे बड़े बाजार को अमेरिका हथेली से फिसलने नहीं देगा। ट्रंप अपने ही जाल में उलझते जा रहे हैं। घरेलू मोर्चे पर असंतोष गहरा रहा है। सख्त से देश नहीं चला करता। अलेन मस्क से ट्रंप के रिश्ते बिगड़ चुके हैं। संघीय मान्यताएं कसौटी पर हैं। वह अपने बेटे बैरन को आगे बढ़ाने की मुहिम में भी लगे हैं, जिसने उनके राष्ट्रपति बनने के बाद 342 करोड़ रूपये कमाये हैं। ट्रंप की नीतियों से आजिज करीब सात सौ आला अफसरों ने समय पूर्व सेवानिवृत्ति की अर्जियां लगाई हैं। घरेलू मोर्चे पर दुश्चिंताएं सघन है तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ट्रंप कहीं तो जंग चाहते हैं और कहीं जंगबंदी। वह रिश्तों में कभी भी मठा डाल सकते हैं और भले चंगे राष्ट्रों को बीमारू बना सकते हैं। वह दिनोंदिन अविश्वसनीय होते जा रहे हैं। ऐसे में ताज्जुब नहीं, गर उनके दाँव बूमरैंग हो जाएं?
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