सेमरहा में बनाई गई डीएमएफ के 20 लाख की पुलिया क्षतिग्रस्त, क्या तय होगी जवाबदेही

कोरबा 15 सितंबर। जिला प्रशासन के अंतर्गत संचालित डिस्ट्रिक्ट मिनिरल फाऊंडेशन द्वारा लोगों को सुविधा देने के लिए 20 लाख से पोड़ी उपरोड़ा ब्लॉक के बनिया ग्राम पंचायत के सेमरहा गांव में बनाई गई पुलिया निर्माण के कुछ ही महीनों बाद क्षतिग्रस्त हो गई। इस वजह से लोगों को राहत तो नहीं मिली बल्कि एक नई आफत सामने आ गई। पुलिया के क्षतिग्रस्त होने से बारिश के दौरान ग्रामीणों और स्कूली बच्चों को मुसीबत झेलनी पड़ रही है। पुलिया के धसने के मामले को लेकर क्या संबंधित विभाग के अधिकारी और इंजीनियर पर जवाबदेही तय होगी।
इस काम के लिए प्रशासन ने ग्राम पंचायत को एजेंसी बनाया था जबकि आरईएस ने अपनी निगरानी में निर्माण किया। क्षेत्र के लोगों ने दावा किया कि उनके द्वारा में समस्या की स्थाई समाधान के लिए मजबूत पुल की मांग की गई थी लेकिन ऐसा कुछ हुआ कि यहां पर पाइप डालकर घटिया क्वालिटी की पुलिया तैयार कर दी गई। लोगों को आशंका है कि पूरे मामले में बड़ा खेल हुआ है इसलिए यह तस्वीर निर्मित हुई है। ग्रामीण कहते हैं कि किसी भी पुलिया का निर्माण केवल पाइप डालकर रास्ता तैयार कर देने तक सीमित नहीं होता। निर्माण से पहले स्थल का तकनीकी सर्वे, नाले में पानी के सामान्य और अधिकतम बहाव का आकलन, मिट्टी और नींव की स्थिति की जांच, उचित आकार और क्षमता की पाइप/कल्वर्ट का निर्धारण तथा डिजाइन और तकनीकी स्वीकृति जरूरी होती है। इसके बाद निर्धारित मापदंड के अनुसार नींव, बेस, पाइप की स्थापना, एप्रोच और सुरक्षा संरचना का निर्माण किया जाता है। निर्माण के दौरान संबंधित तकनीकी अधिकारियों और इंजीनियर की जिम्मेदारी होती है कि काम स्वीकृत डिजाइन और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हो। निर्माण पूरा होने के बाद भी माप, गुणवत्ता परीक्षण और कार्य की तकनीकी जांच महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में सेमहरा की पुलिया निर्माण के कुछ महीनों में ही क्षतिग्रस्त होने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इन प्रक्रियाओं का पालन किस स्तर तक किया गया?
ग्रामीणों का कहना है कि डीएमएफ मद से खर्च किए गए करीब 20 लाख रुपये की शासकीय राशि का उचित उपयोग नहीं हुआ। अगर पुलिया इतनी जल्दी क्षतिग्रस्त हो गई तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। ग्रामीणों ने निर्माण कार्य से जुड़े इंजीनियर, संबंधित अधिकारी और निर्माण एजेंसी की भूमिका की जांच कराने की मांग की है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिया का निर्माण तकनीकी मानकों के अनुरूप हुआ था। क्या नाले के वास्तविक जल प्रवाह का आकलन किया गया था। पाइप की क्षमता पर्याप्त थी या नहीं। निर्माण के समय इंजीनियर ने गुणवत्ता की निगरानी किस स्तर पर की। और यदि निर्माण में कमी थी तो भुगतान किस आधार पर किया गया। इस इलाके के लोगों ने प्रशासन को नई समस्या के बारे में अवगत कराने के साथ कहां है कि पूरे मामले की जांच कराई जाए और विभाग के अधिकारी से इंजीनियर की संपूर्ण भूमिका को जांच के दायरे में लिया जाए।
पुलिया क्षतिग्रस्त होने के कारण को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से इसे अतिवृष्टि और तेज बारिश का परिणाम बताया जा रहा है। ग्रामीण इस तर्क से असहमत हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि निर्माण के समय पुलिया की जगह, पानी के बहाव, पाइप की क्षमता, नींव और संरचना की पर्याप्त तकनीकी जांच की गई होती, तो इतनी जल्दी पुलिया की यह स्थिति नहीं होती। क्या केवल अतिवृष्टि को कारण बताकर निर्माण की गुणवत्ता और तकनीकी स्वीकृति की जिम्मेदारी से बचा जा सकता है?
