हिन्दी-दिवसः चलना तो गाँधी के ‘नक्शे-पा’ ही होगा
- डॉ. सुधीर सक्सेना

हिन्दी-दिवसः
चलना तो गाँधी के ‘नक्शे-पा’ ही होगा
• डॉ. सुधीर सक्सेना
हर साल हम हिन्दी दिवस मनाते हैं। हर बरस 14 सितंबर को देश-विदेश में स्कूलों कॉलेजों, दफ्तरों, सरकारी उपक्रमों, संस्थानों से लेकर दूतावासों तक में रस्म-अदायगी होती है, हिन्दी की महिमा का स्तवन गान होता है, मर्सिया पढ़ा जाता है, कसमें खाई जाती हैं और मिठाइयां बंटती है। हिन्दी के नाम पर हिन्दी पखवाड़ा मनाने का भी चलन है, लेकिन नतीजा क्या निकलता है? वही ढाक के तीन पात। नौकरशाह हिन्दी की प्रगति के नाम पर टीप दर्ज करते हैं: ‘बीइंग डन’। विश्व में सर्वाधिक आबादी के मुल्क भारत की राष्ट्रभाषा के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ में ठौर नहीं। विज्ञप्तियां अंग्रेजी में जारी होती हैं। जहां-तहां हिन्दी रोमन लिपि में लिखी जाती है। सरीसृप सा रेंगती हिंगलिश चौतरफा फल-फूल रही है। हिन्दी की पत्रिकाएं दम तोड़ चुकी है। हिन्दी के विद्यापीठों और केंद्रीय हिन्दी संस्थान की दशा और दिशा सर्वज्ञात है। विदेशी भाषा के तौर पर हिन्दी को पढ़ाने के पाठ्यक्रम की क्या स्थिति है? लंदन से प्रकाशित ‘पुरवाई’ के संपादक तेजेंद्र शर्मा ने ब्रिटेन में हिन्दी की तथा कथा बताई तो मैं हत्प्रभ रह गया। उन्होंने बताया कि ब्रिटेन में 1990 के दशक में हिन्दी बतौर ऐच्छिक विषय विषय दसवीं और बारहवीं तक पढ़ाई जाती थी। हिन्दी भाषियों ने करियर के लिए अपने बच्चों को फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश जैसी भाषाएँ सिखायी। फलतः हिन्दी की पढ़ाई बंद करनी पड़ी। फिर आया मातृभाषा फार्मूला। पंजाबी और गुजराती भाषी भारतवंशी बाजी मार ले गये। बंगाली बांग्लादेश की भाषा है और उर्दू पाकिस्तान की लिहाजा बांग्ला स्कूलों में पढ़ाई जाती है, मगर जब हिन्दी किसी की मातृभाषा ही नहीं, तो क्यूं पढ़ाई जाये? तेजेंद्र कहते हैं कि मन प्रसन्न हो जाता है कि विश्व के सौ से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है, मगर कोई नहीं बताता कि किन देशों के स्कूलों में हिन्दी पढ़ाई जाती है? वह हिन्दी के शिक्षण-प्रशिक्षण से जुड़ी संस्थाओं के डाटा-बेस पर भी सवाल करते हैं। आत्मश्लाघा में डूबी संस्थाओं और उनके स्वयंभू राजदूतों को उनकी जिज्ञासा शांत करनी चाहिये।
हिन्दी दिवस हम 14 सितंबर, 1953 से मना रहे हैं, अलबत्ता हिन्दी को राजभाषा बनाने का निर्णय सन 1949 में लिया गया था। जानकारी जुटाएं और अपने गिरेबां में भी झांके कि क्या कोई अन्य देश अपना भाषा-दिवस मनाता है और यह भी कि उसके देश में उसकी भाषा की सद्गति है या दुर्गति? अटल बिहारी वाजपेयी को यूएनओ में हिन्दी में बोले आधी सदी बीतने को आयी। उसकी पुनरावृत्ति या वहाँ उसे सूचीबद्ध करने का ठोस उपक्रम क्यों नहीं? इस महादेश में शीर्ष ‘महाजन’ आज जैसी हिन्दी का प्रयोग कर रहे हैं, उससे सामान्य जन कैसा भाषायी-संस्कार ग्रहण करेगा?
भाषा हमारी अभिव्यक्ति है। हमारी पहचान है। हमारी अस्मिता है। इस बहुलतावादी सामासिक संस्कृति के महादेश में हिन्दी की महत्ता को सबने स्वीकारा। क्या लोकमान्य तिलक, क्या रवीन्द्रनाथ ठाकुर और क्या नेताजी सुभाष बोस। मगर महात्मा गांधी सा हिन्दीव्रती कोई दूसरा न हुआ। गांधी का सारा जीवन स्वभाषा, स्वदेशी और स्वराज का उद्घोष था। वह सन 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटे और गोखले की प्रेरणा से देश को जानने की मिशन-यात्रा में जुट गये। उनकी मातृभाषा हिन्दी न थी। वह अंग्रेजी संभाषण में कुशल थे। लेकिन उन्होंने हिन्दी अपनायी। हिन्दी में बोले। हिन्दी में लिखा। हिन्दी की अलख जगाई और स्वातंत्र्य वेला में ऐसा भी क्षण आया, जब उन्होंने बीबीसी के संवाददाता से कहा कि जाओ, दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया। बापू का यह कथन अंग्रेजी की अवमानना नहीं, वरन हिन्दी का गौरव गान है।
हिन्दी-दिवस के सूत्रपात से कई दहाई पहले की बात है। सन 1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का शिलान्यास समारोह। मुख्य अतिथि तत्कालीन वायसराय। सब अंग्रेजी में बोलते हैं, मगर बापू हिन्दी में। वह मातृभाषा में शिक्षा की पैरवी करते हैं। अगले वर्ष सन 1917 में वह भड़ौच में द्वितीय गुजरात शिक्षा सम्मेलन में फिर इसे दोहराते हैं। वह महामना मालवीय के हिन्दी भाषण को स्वर्ण सा दमकता बताते हैं। फिर आता है सन 1918 में इंदौर में अभा हिन्दी साहित्य सम्मेलन का आठवां अधिवेशन। बापू 28 मार्च से 31 मार्च तक इंदौर में। सन 1935 में वह इसी सम्मेलन के बहाने एक बार फिर इंदौर आते हैं। उच्चतर सांस्कृतिक मूल्यों के ध्वजवाहक और कला मर्मज्ञ गाँधी विद्वानों की नीहारिका के समक्षा हिन्दी के व्यवहार और प्रतिष्ठा के लिए जो कहते हैं, वह ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। वह दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए दो लाख रुपयों की शर्त भी लगाते हैं। वह दक्षिण भारत में 18 वर्षों में सघन प्रचार का ब्यौरा देते हैं। मसलन छह लाख जनों का प्रवेश से लेकर 70 लाख किताबों का प्रकाशन और मद्रास में आठ लाख प्रतियों का मुद्रण। हिन्दी की महत्ता, व्यवहार और प्रतिष्ठा को देहाराते हुए वह कहते हैं “जिस भाषा को हम राष्ट्रभाषा बनाना चाहते है इसका साहित्य स्वच्छ तेजस्वी और उच्चगामी होना चाहिए। उन्होंने हिन्दी और हिन्दुस्तानी के विवाद पर बहुत सारगर्भित बातें कहीं और विवाद को राष्ट्रीय एकता के लिये हानिकारक कहा।
बापू के कथन के संदर्भ में आंके तो सच क्या है? क्या हिन्दी साहित्य में न्यूनता नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मामलों, विज्ञान, पर्यावरण और इतिहास लेखन के लिए क्या हमें अंग्रेजी संदर्भों की शरण नहीं लेनी पड़ती? क्या हम हिन्दी के निर्भीक प्रयोक्ता हैं? गांधी की वैश्विक छवि को हिन्दी और हिन्दी की गौरव-गरिमा और ग्राह्यता को गांधी ने पोसा था। इधर हिन्दी के बहता नीर को बांधने और बांटने की कुचेष्टाएं हो रही हैं, किन्तु हिन्दी की प्रतिष्ठ के लिए गांधी के नक्शे-पा चलना होगा।
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