अभी जीवित हैं बशीर बद्र @ डॉ. सुधीर सक्सेना

डॉ. सुधीर सक्सेना
‘बशीर बद्र नहीं रहे….’ कहना गलत है। बशीर बद्र जीवित हैं। फकत उनका ज़िस्म सुपुर्द-ए-खाक हुआ है। ही इज स्टिल अलाइव। बशीर बद्र यानी अदब की दुनिया की नामचीन शख्सियत। आधुनिक युग के बेजोड़ और ऊँचे मयार के कवि। वह शाइर थे और शाइर मरा नहीं करते। चूंकि, शेर लिखे नहीं जाते, बल्कि कहे जाते हैं, अत: अपने कहे में वह जीवित हैं और रहेंगे। हर दिल अजीज साहिर को कौन नहीं जानता। बद्र भी साहिर थे। साहिर यानी जादूगर। शब्दों के जादूगर। शब्दों से मायावी संसार जगाने का नायाब हुनर उनके पास था। उन्होंने गजलों को नई जुबां देने का बड़ा काम किया। उन्होंने जद्दोजहद भरी लंबी जिंदगी जी, लेकिन जिंदगी की आखिरी दहाई में वह डिमेंशिया समेत कई रोगों की गिरफ्त में रहे। नतीजतन वह याददाश्त खोने के साथ ही रफ्ता-रफ्ता बोलने और सुनने की सलाहियत से भी वंचित होते गये। जिंदगी की रौनकों और महफिलों से दूर होते जाने से शनै:-शनै: उनके इर्द-गिर्द की दुनिया सिमटती गयी। औरों की तरह वह अपनी पहचान भी भूलते गये, मगर उनके अशआर फिजाओं में गूंजते रहे। वे लोगों के रोजमर्रा के कथोपकथन में प्रविष्ट हो गये।
28 मई को जब उन्होंने आँखें मूंदी तो सोशल मीडिया पर उनकी यादों और श्रद्धांजलियों का सैलाब आ गया। उन्हें सुपुर्द-ए-खाक हुए जुम्मा-जुम्मा आठ रोज बीत गये, लेकिन यह सिलसिला अभी थमा नहीं है। और वह दौर भी कि उनके जनाजे में बीस लोग थे अथवा दो सौ? जाहिर है कि यह सब उनकी अहमियत दर्शाता है।
बशीर बद्र की रचनाएं खूब पढ़ी जाती हैं। वे रेख्ता पर उपलब्ध हैं और कविता कोश में भी। आज वे प्रसिद्ध शाइर के तहत उनकी जीवनी, गजलों और नज्मों का संपादन कन्हैयालाल नंदन ने किया और ‘बशीर बद्र : नई गजल का एक नाम’ का निदा फाजली ने। उनकी रचनाओं पर एकाग्र ‘कल्चर यकसां समग्र’ का संपादन बसंत प्रताप सिंह ने किया। उनकी गजलें ‘उजालों की परियां’ में सामने आईं। उनके काव्य व्यक्तित्व को ‘आस’, ‘आहट’, ‘मुसाफिर’, ‘आमद’, ‘ईकाई’ और ‘उजाले’ जैसी कृतियों के जरिए जाना जा सकता है। ‘आस’ पर उन्हें साहित्य अकादेमी ने सन 1999 में पुरस्कृत किया और उसी साल उन्हें पद्मश्री से भी नवाजा गया। फिल्म ‘मसान’ में उनकी गजल सुनने को मिली। उनकी गद्य कृतियाँ हैं : ‘आजादी के बाद उर्दू गजल का तनकीदी मुताला’ और ‘बीसवीं सदी में गजल’।

उनका जन्म 15 फरवरी 1935 को तब के फैजाबाद और आज के बुकिया में हुआ था। पिता सैयद नाजिर और मां आलियाा बेगम की इस संतान ने धूपछांही जीवन जिया।
बशीर साहब ने करीब साढ़े तीन दहाइयां मीनारों और गुंबदों की सिंफनी के खूबसूरत शहर भोपाल में बितायीं। भोपाल से उनका गहरा तादात्म्य रहा। यूं वे भोपाल के नहीं थे। वह मेरठ से भोपाल आये और भोपाल के होकर रह गयें। ताज भोपाली, कैफ भोपाली या मंज़र भोपाली और फजल ताबिश की तरह भोपाल से जाने गये और भोपाल उनके होने से। उनका पूरा नाम था सैयद मोहम्मद बशीर बद्र। मगर वह लोक और वांग्मय में बशीर बद्र के नाम से लोकप्रिय हुए। पिता सय्यद नाजिर पुलिस महकमे में मुलाजिÞम थे। वालिद के इंतकाल के बाद परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आयी। तालीम पूरी करने में बहुत व्यवधान आये। तालीम छूटी और कुछ अर्सा पुलिस महकमे में नौकरी भी की। व्यवधान के बाद उन्होंने पढ़ाई से रिश्ता फिर जोड़ा और तालीम के मरकज़ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीए, एमए किया और फिर पीएचडी।
वह शेरो-शायरी कम उम्र से ही करने लगे थे। बताते हैं कि उन्होंने पहला शेर बहुत कम सात वर्ष की उम्र में कहा था, जब उनकी मसें भी नहीं भीगी थीं। शनै:-शनै: कविता से उनका रिश्ता प्रगाढ़ होता गया और जल्द ही वह अदब की अजीमुश्शान शख्सियत हो गये। दिलचस्प किस्सा है कि जब वह एएमयू में छात्र थे, उनके शेर पाठ्यक्रम में शामिल हो चुके थे। और एकबारगी उनके टीचर ने उन्हीं से अपने कहे शेर की व्याख्या करने को कहा। उन्होंने व्याख्या की, मगर उनके कहे से टीचर को संतोष नहीं हुआ और उन्होंने उस शेर की अपने तईं व्याख्या की। जाहिर है कि उनकी शायरी गहरी और व्यापक थी और अपने-अपने नजरिये से उसके मायने बुझने की गुंजाइश थी।
बहरहाल देखते ही देखते यह नाम टकसाली सिक्के सा चल निकला। वह मुशायरों और कवि सम्मेलनों में छा गये। वह अपने अशआर से महफिलें लूटते। प्राय: वह अपनी रोबीली, कलफदार आवाज में शेर पढ़ते और पंक्तियों को बलाघात के साथ दोहराते थे।
बशीर साहब ने सन् 1969 में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की और 27 अगस्त, 1974 को मेरठ कॉलेज में बतौर लेक्चरर उर्दू विभाग ज्वाइन किया। 12 अगस्त, 1974 को मेरठ कॉलेज में बतौर उर्दू विभाग ज्वाइन किया। वह वहां सन् 1990 तक रहे, मगर इस बीच एक बड़ा हादसा हुआ। सन् 1987 में मेरठ सांप्रदायिक दंगे की चपेट में आ गया। दंगाइयों ने उनका घर फूंक दिया। उनका घर क्या जला, उनका मकान, किताबें, फाइलें, डायरियां, माल-असबाब सब राख के ढेर में तब्दील हो गये। यह एक बड़ा आघात था। इस वाकये ने उन्हें दर्द की तेजाबी बारिश में भिगो दिया। इस दर्द की टीस बरबस उनके शेर में उभरी। उन्होंने लिखा :
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।
उनका लिखा दीवान तीन खंडों की शक्ल में अभी आने को है, मगर अब तक उपलब्ध उनके साहित्य को पढ़ जाइये। कहीं भी तल्खी नहीं, अपशब्द या गाली-गलौज नहीं। उनका सलीका और सलूक उन्हें औरों से अलग करता है। वह न हिकारत से थूकते हैं, न कनपटी बजाते हैं और न ही गुस्से में चीजें फेंकते हैं। वह तंज कसते हैं, लानत-मलामत भी करते हैं, लेकिन शालीनता या भद्रता नहीं छोड़ते। वह एहतराम के काइल हैं। यह फरमाते हैं:
इबादतों की तरह मैं ये काम करता हूँ,
मेरा उसूल है, पहले सलाम करता हूँ।
मुखालिफत से मेरी शख्सियत सँवरती है,
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूँ।
उनमें इंसानियत का गजब का जज्बा है। वह दुश्मनी में भी उसूल के पाबंद हैं, लिहाजा इतनी दुश्मनी की ताईद करते हैं कि मुलाकात हो तो शर्मिंदगी न हो। सच से उनकी आशनाई देखिये :
बड़े शौक से मेरा घर जला,
कोई आँच तुझ पर न आयेगी।
ये जुबां किसी ने खरीद ली,
ये कलम किसी का गुलाम है।
बशीर साहब की शायरी पर गौर करें तो बिला शक वह इंसानियत के तकाजों की बात करते हैं। वह हमारे जमाने की तस्वीर को कम, रूह को ज्यादा छूते हैं। वह तथ्यों के बहाने मर्म को उद्घाटित करते हैं। उनकी शायरी जिंदगी के फलसफे की शायरी है। वहाँ कलुष नहीं है। वह निर्मल है। उनकी शायरी निर्मल निष्पाप बच्चे सी है। बशीर के अशआर बातें करते हैं। वहाँ चित्त से चित्त का संवाद है। कहीं लागलपेट नहीं, आडंबर नहीं, मुलम्मा नहीं। मेरे जाने वह हमारे वक्त के — और शायद कविता के इतिहास के — सरलतम कवि हैं। वह इतना सरल लिखते हैं कि ताज्जुब होता है। वह अपनी गजलों से विस्मय उपजाते हैं। वे कर्ण-कुहरों से सीधे हृदय में उतरते हैं और वहाँ डेरा जमा लेते हैं। एक नहीं, ढेरों उदाहरण हैं। उनका कवि-कर्म उदाहरणों का समुच्चय-या लड़ी है। वक्त के स्याह बोगदे में उनकी शायरी रोशनी की लकीर है। उनकी बहुतेरी पंक्तियाँ मुहावरों की मानिंद प्रयुक्त होने लगी हैं।
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफा नहीं होता।
या फिर
कोई हाथ भी न मिलायेगा,
जो गले मिलोगे तपाक से।
ये नये मिजाज का शहर है,
जरा फासले से मिला करो।
वह कहते हैं :
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये।
इबादत पर कितनों ने क्या कुछ नहीं कहा है। अलग-अलग शब्दावली, अलग-अलग अंदाज, बशीर साहब का अंदाज-ए-बयाँ देखिये :
वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है,
मुझे ये सिफत भी अता करे।
तुझे भूलने की दुआ करूँ,
तो मेरी दुआ में असर न हो।
अब आप ही बतायें, ऐसी दुआ तो कोई नेकदिल शख्स ही कर सकता है या फिर वह जिसकी रूह पाक हो। पाकीजगी की एक और मन:स्थिति देखिये :
अभी राह में कई मोड़ हैं,
कोई आयेगा, कोई जायेगा।
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया,
उसे भूलने की दुआ करो।
शैलेंद्र कहते हैं :
छोटी सी ये दुनिया, पहचानते रास्ते हैं।
कभी तो मिलोगे तो पूछेंगे हाल।
बशीर साहब फरमाते हैं :
मुसाफिर हैं हम भी, मुसाफिर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।
मय और मयकशी पर ढेरों शेर हैं। इतने कि कोई दीवान तैयार हो जाये। वह कहते हैं :
परेशाँ हो तुम भी, परेशाँ हूँ मैं भी,
चलो मयकदे में वहीं बात होगी।
मय कितनी पुरअसर हो सकती है, यह उनके कहे में देखा जा सकता है।
मिलन की बात करें तो उनकी आरजू देखिये :
मुझे एक रात नवाज़ दे
मगर उसके बाद सहर न हो
बशीर बद्र ने बहुत लिखा है। जिंदगी और जमाने की धूपछांही रंगत पर वहाँ इफरात शेर हैं। उन्हें धूप कुबूल है और बदली भी, लेकिन उनके लिये उस नगर में कैद नाकाबिले-बर्दाश्त है, जहाँ जिंदगी की हवा न हो। वह सच और सिर्फ सच को बयां करते हैं, जब वो कहते हैं:
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा,
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफा हो जायेगा।
उनमें गजब की सादगी है। जज्बात की गहराई है और दिल को छू लेने का अंदाज है। वस्तुत: वह ‘डिक्शनरी’ नहीं, ‘डिक्शन’ के कवि हैं। वह सरलता से समझ आते हैं। बेहद संप्रेषणीय और बोधगम्य हैं। वे दुरूह, क्लिष्ट या बोझिल नहीं हैं। उन्हें पढ़िये तो शब्दकोश का सहारा लेने की जरूरत नहीं पड़ती। वह रोजमर्रा की बोलचाल की जुबान इस्तेमाल करते हैं। उनमें सरल-सहज शब्दों के धागों में भावों के मनके पिरोने का अद्भुत कौशल है। दिलीप कुमार उनके मुरीद थे और अमिताभ बच्चन प्रशंसक। मीना कुमारी तकिये तले उनके शेर सहेजती थीं। जगजीत और चंदनदास ने उनकी गजलों को स्वर दिया। अटल बिहारी वाजपेयी के साथ वह अमेरिका गये। साहित्य अकादमी और उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी ने उन्हें नवाजा। वह पद्मश्री से अलंकृत हुए। दुनिया भर के मुशायरों में उनकी धूम रही। शेरो-शायरी के शौकीनों ने उनकी किताबें हाथों-हाथ लीं। वह जीते-जी सेलेब्रिटी हो गये थे और उनके कई शेरों ने कहावतों की शक्ल अख्तियार कर ली थी। वह ऐसे मुकाम पर पहुँच गये थे कि पाने को और ज्यादा कुछ न था।
ऐसे में सेहत ने दगा किया। वह जिंदगी की आखिरी दहाई में डिमेंशिया से ग्रस्त रहे। आत्मबोध जाता रहा। स्मृति-लोप ने घेर लिया। ऐसे में उनकी सहचर डॉ. राहत बद्र ने न केवल अथक सेवा-सुश्रूषा की, बल्कि साये की तरह उनके साथ रहीं।
जनाब बशीर बद्र के शेर बड़े अर्थगर्भी होते हैं। उनमें चीजों का मर्म नजर आता है। उनकी छोटी बहर की गजलें भी पुरअसर हैं। वह कहते हैं :
गुरूर उस पे बहुत सजता है, मगर कह दो
इसी में उसका भला है गुरूर कम कर दे।
बिना किसी नाम-धाम लिए या इश्तिहार के उनके अशआर सीधे निशाने पर चोट करते हैं। वे बरबस युगीन सच को वाणी देते हैं। मसलन :
जी बहुत चाहता है सच बोलें,
क्या करें हौसला नहीं होता।
अपनी मिट्टी से बेइंतिहा लगाव पर गौर कीजिये :
हम दिल्ली भी हो आये हैं, लाहौर भी घूमे,
ऐ यार, मगर तेरी गली तेरी गली है।
मोहब्बत की कहानियों की बात उठती है तो वह कहते हैं :
जो कहा नहीं, वह सुना करो,
जो सुना नहीं, वह कहा करो।
वह प्रिय के विस्मरण से इंकार करते हैं, क्योंकि :
याद शाख-ए-गुलाब है,
जो हवा चली तो लचक गयी।
वह मोहब्बत से अपने रिश्ते को यूँ बयान करते हैं:
मैं हर हाल में मुस्कुराता रहूँगा,
तुम्हारी मोहब्बत अगर साथ होगी।
क्या गजब रूमानियत है। उनकी शाइरी में मोहब्बत है, बिछोह है, तन्हाई है, दर्द है, ख्वाब है। वह उर्दू गजल की नायाब विरसे को साथ लेकर आगे बढ़ते हैं। वह कहते हैं :
सितारे राह के हैं मीर ओ गालिब, ओ इकबाल,
कलम बच्चे का हूँ, तख्ती नयी-नयी हूँ मैं।
यह शेर उनके अपने बारे में बहुत कुछ कहता है। उन्हीं का एक और बड़ा खूबसूरत शेर है, जो उनकी शायरी के मिजाज को बखूबी बयां करता है। शेर इस तरह है :
कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ,
वो गजल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ, न सुना हुआ।
ये तो थी उस अजीमतरीन शख्सियत जनाब बशीर बद्र। अपनी तरह के इकलौतेऔर औरों से अलग। शायरी की दुनिया में वह भाषा के मान से नया मानक रचते हैं; एक ऐसा मानक जो ठेठ हिन्दी के ठाठ का पर्याय है। उनके शब्द फूलों पर मंडराती तितलियों की मानिंद हैं। हल्के, कोमल और रंगीन। उनकी चंचल बहुरंगी छटा मोहती है। वे दिल से दिल तक का सफर बखूबी तय करते हैं और उनके शेरों की पैकान दिल में धँसी रह जाती है। और उसकी टपकन और टीस बनी रहती है।
जनाब बशीर बद्र की शायरी किन्हीं सरहदों की गुलाम नहीं थी। उन्हें प्रधानमंत्री समेत देश की शीर्षस्थ शख्सियतों ने उद्धृत किया। वह बखुद अटल बिहारी वाजपेयी के प्रशंसक थे और उनके घर की बैठक में अटलजी की बड़ी-सी तस्वीर टंगी थी। उनके चेहरे की मासूमियत आकर्षित करती थी और मुशायरों या निजी बैठकों में भी थोड़े-थोड़े अंतराल पर मुस्कुराहट होठों पर तिर उठती थी। वह तहजीबपसंद शख्स थे और आगंतुकों तथा अजनबियों से मुस्कुराहट के साथ शालीनता से पेश आते थे। नयों और छोटों की हौसलाअफजाई करते थे। उनकी गुफ्तगू सलीकेदार थी।
सोचिये, शायरी में मशगूल, शायरी में जीते और डूबते इतराते शख्स पर क्या गुजरी होगी, जब आग में उनका साजो-सामान राख हो गया था। मगर बरसों बाद जब किसी पत्रकार ने उन्हें ताल में नौकायन के दरम्यान कुरेदा तो उन्होंने कहा कि इसे दंगे तक मेहदूद न कीजिये। बताते हैं कि उन्होंने पुलिस महकमे में यह कहकर तरक्की ठुकरा दी थी कि दरिया जहां समंदर से मिला, दरिया नहीं रहता।
वह मोम की मानिंद थे और मानते थे कि बतरस से नीम भी संदल हो जाता है। अंधेरगर्दी पर इससे सख्त टिप्पणी और क्या होगी :
कातिलों के तरफदार का कहना है कि उसने,
मकतूल की गर्दन पर कभी सिर नहीं देखा।
वह खुशनसीब थे कि उनको विशाल भारद्वाज जैसा शिष्य मिला, जिसने उनके आतिश में राख हुए शेरों को याद और मेहनत से जिला दिया। बताते हैं कि बशीर साहब को चार-पाँच हजार अशआर जुबानी याद थे। विशाल ने उन्हें हज भी कराया। उन्होंने सन 1973 में पीएचडी की थीसिस जमा की थी, मगर अध्यापन और मुशायरों की मसरूफियत में डिग्री लेना टलता गया। अंतत: उन्हें 48 साल बाद सन 2021 में डिग्री मिली। डिग्री घर पहुँची तो उन्होंने किसी नेमत सा उसे सीने से लगाया और बच्चे-सा हुलस उठे। उनकी थीसिस में उनके अपने 87 शेर शामिल थे। भोपाल में उनके घर पर पलंग पर पड़ी खासतौर पर खूबसूरत चादर का जिक्र हुआ, जिस पर मीर के 72 शेरों की तर्ज पर दुबई की डॉ. अख्तर जहाँ मलिक ने जनाब बशीर के 72 शेरों के एक-एक हरूफ को एम्ब्रॉयडरी से उकेरा। उनके शेर दिलो-दिमाग में बरबस तरंगें उठाते हैं। वे अंतस्तल को भिगो देते हैं। ऐसा नहीं है कि गहरी रूमानियत में डूबे बशीर बदलते इंकलाब के तकाजे को नहीं बूझते थे।
वह यह भी जानते थे कि उम्र बीत जाती है दिल को दिल बनाने में। शैलेन्द्र के शब्दों में कहें तो यह दिल वाला शाइर ताउम्र दिल की बात करता रहा। साहिर की भाँति वह अमन और सुलह के हिमायती थे और मानते थे कि जंग तो खुद ही इक मसला है। जंग क्या मसअलों का हल देगी। वह प्रेम के पुजारी थे। बिना भाषा में गुल खिलाये या कलाबत्तू टांके वह इस बेढब शोरोगुल भरे दौर में गजल की मार्फत आदमी के भीतर की नमी को बचाने की जद्दोजहद करते रहे।
बशीर का अर्थ है — खुशखबर लाने वाला। और बद्र के मानी हैं चौदहवीं का चाँद। संजोग देखिये कि यह चाँद ईदुज्जुहा का चाँद देखकर गया, मगर ऐसे चाँद डूबा नहीं करते, वे नीहारिका में चमकते हैं। उन्होंने 91 साल धरती नाम के ग्रह पर गुनगुनाते हुए गुजारे कि :
मुसाफिर हैं हम भी, मुसाफिर हो तुम भी,
फिर किसी मोड़ पर मुलाकात होगी।
तो यकीन मानिये कि सलोने चाँद की चमक समेटे बशीर बद्र नामक बेहद अपने शाइर शब्दों की मार्फत फिर-फिर मुलाकात होगी।
यकीन मानिये कि शब्दों के जादूगर कभी मरा नहीं करते। बशीर बद्र स्टिल लिव्ज। वह अपनी अनुपस्थिति में भी उपस्थित हैं।
