डाक्टर एक दृष्टि @ डॉ. आलोक बंसल, गैस्ट्रोएन्टेरोलॉजिस्ट

राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस (1 जुलाई) पर विशेष

चिकित्सक शब्द सुन कर किसी को अपने दर्द में आराम आने लगता है, किसी को एक उम्मीद सी बनती है, की कोई तो है जो इस परेशानी का हल जानता होगा. लेकिन कोई ये भी सोचता है की फिर डांट खानी पड़ सकती है क्योकि पिछली बार ही डॉक्टर ने ये करने से मना किया था लेकिन मैंने ये बंद नहीं किया. जो भी हो चिकित्सक से या तो मन शांत होता है या उलझन बढ़ भी जाती है, इसीलिए कुछ लोगो का ब्लड प्रेशर घर में तो नार्मल रहता है लेकिन डॉक्टर के केबिन में बढ़ा हुआ होता है. कुछ का दर्द क्लिनिक में एंट्री करते ही ठीक भी हो जाता है. लेकिन आजकल थोड़ा मामला बदल रहा है, शायद कॉर्पोरेट कल्चर की मेडिकल में एंट्री बढ़ने के कारण. ज्यादातर छोटे अस्पताल अब बड़े कॉर्पोरेट हॉस्पिटल में कन्वर्ट हो रहे है, समय की जरूरत भी है, क्योकि लोगो को मेडिक्लेम, सी जी एच एस, रेलवे के कर्मचारी होने की सुविधा हॉस्पिटल्स में इलाज के लिए चाहिए होती है, जो छोटे अस्पताल नहीं दे पाते. इस कारण मरीज़ चिकित्सक रिश्ता अब मरीज़ कॉर्पोरेट कर्मी के रिश्ते में बदलता जा रहा है. मरीज़ जो पहले चिकित्सक को भगवान् समझता था अब असल रूप में पहचानने लगा है की वो राक्षस है, असल रूप राक्षस? हां राक्षस. क्यों? क्योंकि जो दर्द शारीरिक तकलीफ आपको हो रही वो भगवान की ही देन है ये तो आप जानते होंगे ना. अब भगवान के दिए हुए अभिशाप को नष्ट करने वाला, तो राक्षस ही कहलायेगा. लेकिन आप तो चिकित्सक को भगवान कहते थे. नहीं यही तो गड़बड़ था अब सही पकडे है कि राक्षस होते है. बदलते परिवेश में ये कॉर्पोरेट वालों ने अब दिग्दर्शन करा दिया जनता को. नहीं नहीं इन लोगो ने बोला नहीं है बस जनता अपने आप समझने लगी है, क्योकि अब हॉस्पिटल में रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट पे ही सब कुछ होता है, जो समिति 100 – 200 करोड़ खर्च कर के हॉस्पिटल खड़ा करेगा कितना ही समाज सेवा कर पायेगा. चिकित्सक बनने में भी खर्च कम नहीं है, देख लो नीट एग्जाम में कितनी धांधली हो रही और फिर प्राइवेट से एम् बी बी एस में भी 1-2 करोड़ लग रहे जिनकी संख्या भारत में गवर्नमेंट सीट से 10 गुना है, कुछ चीन और रूस से डिग्री वाले भी है इनको भी 80-90 लाख लग ही जाते है, और बचे गवर्नमेंट सीट वाले जिनको भी 5 से 10 लाख लग रहा और 2-3 साल का गाँव में बांड अलग. डिग्री सब की बराबर. आपको लगता होगा दर्द तकलीफ का इलाज इन डिग्रीयो से होता है, नहीं ये चिकित्सक की तपस्या से होता है, जब चिकित्सक बनने में लगे 20 साल और उसका 1-1 पल हो कई दिनों के समान, तब ही चिकित्सक किसी का दुख दर्द हरने के काबिल हो पाता है. नये चिकित्सक को लोग ऐसे देखते है कि ये क्या ही कर पायेगा. भाई जितने दिन आपने सो कर बिताए है उतने दिन उसने बिना सोये, रात रात भर खड़े रहकर, अस्पताल में दिन रात इधर उधर भागते हुए, अपनी भूख प्यास रोक के लोगो की सेवा की है आज समय आया अपना शुल्क लेने का तो आपको लग रहा की ये क्या इलाज कर पायेगा. उसने 20 साल में आपके 100 साल में किये काम से ज्यादा मेहनत की है इसलिए 35 साल की उम्र में भी अभी जनम लिए बच्चे से लेकर 70- 80 साल के बुजुर्ग की तकलीफ केबिन में बैठे बैठे हल कर रहा है, फिर भले आपको लगता रहे कि बस 4 लाइन लिखने के हज़ार रुपये. व्यापार में जहा निवेश के दिन से ही लोग लाभ की इच्छा में रहते है और चिकित्सा के क्षेत्र में 20 साल बाद भी आप लाभ तो छोड़िये, परामर्श शुल्क ही दूसरे मुलाकात में फिर से उम्मीद कर ले तो कुछ लोग चिकित्सक को लालची बोलने में जरा भी देर नहीं लगाते. लोग मॉल में, बार/रेस्तरां में लाखो उड़ा देंगे लेकिन सुबह सब्जी वाले से 10 रूपए का धनिया मुफ़्त में चाहिए, ये वैसे ही है जैसे बड़े हॉस्पिटल में लाखो खर्च कर देंगे लेकिन क्लिनिक में हर बार परामर्श शुल्क में भी रियायत चाहिए, गुच्ची /लुई वित्तों पहनने में चाहिए लेकिन दवाई जेनेरिक लेंगे. इस कारण अब चिकित्सा में कॉर्पोरेट की भागीदारी बढ़ रही है, जो चिकित्सक को मरीज के ऑपरेशन या ट्रीटमेंट का प्लेटफॉर्म देता है, बदले में ये सुनिश्चित करता है की आपका मॉल रेस्तरां में होने वाला खर्च कम हो, क्योकि वो खर्च अब यहां होने वाला है. हॉस्पिटल परमिशन के दस्तावेज, मेडिक्लेम जैसी सुविधा के लिए परमिशन, स्टाफ से माथापच्ची, फाइनेंस, मार्केटिंग, दवाई कंपनी से सौदेबाजी और परिजनों से मोल भाव जो किसी मेडिकल कॉलेज में नहीं सिखाया जाता तो चिकित्सक क्यों अपना समय और ऊर्जा इसमें बर्बाद करे, वैसे भी लोगों से पैसे निकलवाने की आकांक्षा और प्रतिभा चिकित्सक में होती तो कभी इतनी प्रतिस्पर्धा करके मेडिकल कॉलेज नहीं गया होता.


( लेखक – डॉ आलोक बंसल, गैस्ट्रोएन्टेरोलॉजिस्ट है जो जबलपुर में गैस्ट्रो न्यूरो क्लिनिक के डायरेक्टर के पद पर है. इन्होंने एम बी बी एस मेडिकल कॉलेज रायपुर, एम डी मेडिसिन सफदरजंग हॉस्पिटल नई दिल्ली व डी एम गैस्ट्रोएंटरोलॉजी सी एम सी वेल्लोर से की है. )

Spread the word