सैटेलाइट अलर्ट, त्वरित अनुक्रिया दल और जनभागीदारी से वनमंडल कोरबा ने पाया वनों को सुरक्षित रखने में बड़ा मुकाम

कोरबा । वनमंडल ने वर्ष 2026 के वन अग्नि सीजन (16 फरवरी से 15 जून 2026) के दौरान वन अग्नि प्रबंधन में एक मिसाल कायम की है। डीएफओ श्रीमती प्रेमलता यादव के नेतृत्व में वन विभाग के सुनियोजित प्रयासों, आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल और जन-जागरूकता के समन्वय से इस वर्ष वन अग्नि की घटनाओं में 46′ से अधिक की कमी दर्ज की है।
विगत वर्ष 2025 के अग्नि सीजन में जहाँ कोरबा वनमंडल के अंतर्गत कुल 404 वनाग्नि की घटनाएं सामने आई थीं, वहीं इस वर्ष (2026) कड़े प्रबंधन के चलते यह आंकड़ा सिमटकर मात्र 219 रह गया। वनमंडल अंतर्गत आने वाले सभी छह वन परिक्षेत्रों के संवेदनशील, अति-संवेदनशील एवं मध्यम संवेदनशील क्षेत्रों में विभाग ने आग पर पूरी तरह नियंत्रण पाने में सफलता हासिल की है।आधुनिक तकनीक का लाभ उठाते हुए विभागीय अधिकारियों कर्मचारियों सहित स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों के मोबाइल नंबरों को भी सीधे सैटेलाइट सिस्टम से जोड़ा गया। वनाग्नि घटना का अलर्ट मिलते ही तुरंत एसएमएस (स्रूस्) के माध्यम से सूचना पहुंचाई गई, जिससे त्वरित रिस्पांस संभव हो सका।
वनमंडल स्तरीय एवं परिक्षेत्र स्तरीय ‘स्ट्राइक फोर्स’ और विभागीय कर्मचारियों की विशेष टीमें गठित की गईं, जिन्होंने दिन और रात के समय लगातार सघन गश्त कर आग की घटनाओं को फैलने से रोका। त्वरित अनुक्रिया दल और जनभागीदारी: त्वरित रिस्पांस टीम, संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (छ्वस्नरूष्ट), वन अग्नि प्रहरियों और स्थानीय ग्रामीणों के सक्रिय और साझा सहयोग से हर छोटी-बड़ी आग पर तत्काल काबू पाया गया।
दीवार लेखन और टोल फ्री नंबर:
ग्रामीणों की त्वरित मदद के लिए वन क्षेत्रों के गांवों की दीवारों पर ‘वाल राइट अप’ (दीवार लेखन) कराया गया और टोल फ्री नंबर दर्ज किए गए, जिससे आग की सूचना तत्काल मुख्यालय तक पहुंची।
व्यापक जन-जागरूकता:
सभी छह परिक्षेत्रों में लगातार जन-जागरूकता की गईं। महुआ और अन्य वनोपज संग्रहण करने वाले संग्राहकों को वनाग्नि से होने वाले नुकसान, वन्यजीवों और पर्यावरण की क्षति के प्रति जागरूक किया गया।
पर्यावरण और वन्यजीवों को नहीं हुआ बड़ा नुकसान
इस प्रभावी प्रबंधन का सुखद परिणाम यह रहा कि यदि कहीं छिटपुट आग लगी भी, तो उससे केवल सूखी पत्तियां, गिरे हुए सूखे डाल-डंगाल या कुछ घास-फूस को ही आंशिक नुकसान पहुंचा। वनमंडल के भीतर इस वर्ष कोई भी बड़ी या विनाशकारी वनाग्नि की घटना घटित नहीं हुई।
इस सफलता से वनों में प्राकृतिक रूप से होने वाले पुनरुत्पादन (छोटे पौधों) को नया जीवन मिला है और वन्यप्राणियों के रहवास सुरक्षित रहे हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों और वनवासियों में काफी हर्ष व्याप्त है। वनों के इस बेहतर स्वास्थ्य का सीधा लाभ आगामी वर्षा ऋतु में देखने को मिलेगा, जहाँ वनीकरण और नए पौधों का विकास तीव्र गति से हो सकेगा।
आधुनिक तकनीकों और त्वरित प्रबंधन से वन अग्नि की घटनाओं पर लगाया अंकुश
वन संपदा को सुरक्षित रखने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से, कोरबा वन मंडल ने वन अग्नि सीजन 2026 के दौरान एक बेहद सफल अभियान चलाया। वन मंडल के अंतर्गत आने वाले सभी छह वन परिक्षेत्रों—बालको, कोरबा, लेमरू, पसरखेत, कुदमुरा और करतला में आधुनिक उपकरणों, उन्नत तकनीकों और पूर्व-नियोजित रणनीतियों के समन्वय से जंगलों में लगने वाली आग (फॉरेस्ट फायर) पर प्रभावी ढंग से काबू पाया गया।
आधुनिक उपकरणों का वितरण और उपयोग
इस सीजन में आग की घटनाओं से निपटने के लिए पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ अत्याधुनिक संसाधनों को प्राथमिकता दी गई:लीफ ब्लोअर मशीनें: वन मंडल द्वारा मैदानी अमले को आधुनिक लीफ ब्लोअर मशीनों का वितरण किया गया, जिससे सूखे पत्तों को तेजी से हटाकर आग की दिशा मोडऩे और रोकने में बड़ी मदद मिली।
फायर ब्रूम्स और फायर रैक्स: आग बुझाने वाली विशेष झाड़ूओं (फायर ब्रूम्स) और फायर रैक्स का उपयोग किया गया, जिसकी बदौलत कहीं भी आग सुलगने पर उसे प्रारंभिक चरण में ही त्वरित रूप से बुझा दिया गया।
जनवरी माह से ही शुरू हो गई थी तैयारी
वनाग्नि को भयावह रूप लेने से रोकने के लिए कोरबा वन मंडल ने दूरदर्शिता दिखाते हुए जनवरी 2026 से ही विभागीय स्तर पर मोर्चा संभाल लिया था:जंगलों के बीच में नए फायर लाइंस काटे गए ताकि यदि किसी हिस्से में आग लगे भी, तो वह दूसरे हिस्से में न फैल सके।: जनवरी माह से ही जंगलों में पड़े सूखे पत्तों, सूखी टहनियों और डाल-डंगालों की व्यापक सफाई की गई, जो वन अग्नि को भडक़ाने में मुख्य ईंधन का काम करते हैं।
इस त्वरित और समयबद्ध सफाई से आग के फैलने के खतरों को न्यूनतम कर दिया गया।कोरबा वन मंडल के इस चौतरफा और मुस्तैद प्रबंधन का परिणाम यह रहा कि इस वर्ष भीषण गर्मी के बावजूद वन अग्नि की घटनाओं को समय रहते पूरी तरह नियंत्रित और सीमित रखा जा सका। इससे न केवल बहुमूल्य वनस्पति और वन्यजीवों की रक्षा हुई है, बल्कि पर्यावरण को होने वाले नुकसान को भी भारी मात्रा में टाला गया है।
