खीज में इस्रायल, नफ़े में ईरान @ डॉ. सुधीर सक्सेना

• डॉ. सुधीर सक्सेना
15 जून की शाम पेरिस में मौजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेसी वांस तथा तेहरान में ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालीबफ ने पिछले करीब साढ़े तीन माह से इस्रायल-अमेरिका और ईरान के दरम्यां जारी जंग के खात्मे की डील के डेढ़ पेजी आशय-पत्र पर इलेक्ट्रॉनिक-हस्ताक्षर क्या किये, भीषण युद्ध से चिंतित और दहले हुये जी-7 के मेंबर-मुल्कों समेत सारी दुनिया ने राहत की सांस ली। दोनों देश जुम्मे के रोज यानि 19 जून को जेनेवा में अमन के लिये सुलहनामे पर दस्तखत हुआ। ट्रंप ने पहले ही अपनी सदाशयता का परिचय देते हुए ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी को तत्काल उठाने का आदेश जारी कर दिया। पारस्परिक सहमति के अनुरूप दोनों देश 60 दिनों की युद्धविराम की अवधि में विस्तृत ब्यौरे को तैयार करेंगे, ताकि क्षेत्र में स्थायी शांति कायम हो सके।


अमेरिका और ईरान के बीच संधि की प्राथमिक शर्तों को देखें तो अमेरिका घुटने टेकने और पांव पीछे खींचने को बाध्य हुआ है। 28 फरवरी को मिली सफलता के बाद कुछ भी उसकी मंशा के अनुरूप नहीं हुआ। न तो तेहरान में तख्ता पलट हुआ और न ही वह सामरिक मोर्चे पर ईरान को शिकस्त दे सका। उलटे ईरान ने गजब के युद्ध कौशल और व्यूह-रचना का परिचय दिया। अपनी जांबाजी का परिचय देते हुये उसने इस्रायल-अमेरिका की शक्तिशाली धुरी का बखूबी सामना किया और उन्हें नाकों चने चबा दिये। उसने होर्मुज का इस्तेमाल कारगर हथियार के तौर पर किया और सारी दुनिया को हैरत और सांसत में डाल दिया। लड़ाई और लंबी खिंचती तो ईरान का मोर्चा अमेरिका के लिये दूसरा वियेतनाम या अफगानिस्तान साबित हो सकता था। ट्रंप की देश के भीतर और बाहर भद्द पिटी। यही वजह है कि ईरान के उप प्रधानमंत्री काजिम गरीबाबादी ने जहां सुलह को ईरान की फतह बताया है, वहीं सेना प्रमुख खातम अल अन्बिया के मुताबिक अमेरिका के सामने हार और समर्पण से बचने के लिये संधि के सिवाय कोई चारा न था।
ईरानी विदेश मंत्री अराघाची मानते हैं कि उभयपक्षीय समझौते में एक पक्ष अमेरिका-इस्रायल है और दूसरा पक्ष ईरान-हिजबुल्लाह, लेकिन इस्रायल ऐसा नहीं मानता। मध्यस्थ-पाकिस्तान के पीएम शहवाज शरीफ युद्ध विराम के दायरे में लेबनान के शामिल होने की बात कहते हैं, लेकिन बीवी (नेतन्याहू) इससे भी असहमत हैं। दरअस्ल इस्रायल इस सुलह से खीजा हुआ है और इसका परिचय उसने सोमवार की ही शाम दक्षिण लेबनान में बमबारी करके तथा हिजबुल्लाह के खात्मे का संकल्प दोहरा कर दिया है। इस्रायल के इस रवैये के चलते ट्रंप ने पहली बार बीबी को फोन कर फटकार लगाई।


इस्रायली पेंच को एकबारगी छोड़ दें तो स्थायी-संधि में सबसे बड़ा अवरोध ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। वांस को उम्मीद है कि परमाण्विक-निरीक्षकों को ईरान जाने की अनुमति मिलेगी और तेहरान परमाणु हथियार नहीं बनाने और परिवर्द्धित-यूरेनियम भंडार नष्ट करने पर रजामंद हो जायेगा। ईरान इस पर सहमत हो सकता है, बशर्ते उसकी 300 अरब डालर की सीज-संपत्ति रिलीज हो और आर्थिक पाबंदियां उठा ली जाएं। क्षेत्र में दबदबा बढ़ने का उसे फायदा मिलेगा। नार्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कारीडोर में उसकी अहमियत सब जानते हैं। जहां तक बड़बोलेपन ट्रंप की मन: स्थिति का प्रश्न है, उसे 15 जून की शाम उनके फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों से कहे इस कथन से बूझ सकते हैं : “मुझे बहुत खुशी है कि हस्ताक्षर हो गये, …. द डील इज आल साइन्ड।”
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