विश्व पर्यावरण दिवस कलः प्रदूषण के साथ पावर हब का चल रहा संघर्ष, चुनौतियों से कब मिलेगा छुटकारा

कोरबा 04 जून। पावर हब कोरबा में कल अलग-अलग स्तर पर विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा। यह एक परंपरा होगी या फिर धरातल पर काम करने का संकल्प। सवाल इसलिए बना हुआ है क्योंकि पिछले कई दशक से औद्योगिक जिले के लोगों का संघर्ष प्रदूषण के खतरे से जारी है। लगातार समस्या के समाधान के दावे किए गए लेकिन नतीजे क्या आए, किसी से छिपा नहीं है।

छत्तीसगढ़ का पावर हब कोरबा जिला औद्योगिक विकास की दृष्टि से राष्ट्रीय मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां स्थित नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन, छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी, भारत एल्यूमिनियम कंपनी तथा साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड की कोयला खदानें न केवल क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था की धुरी हैं बल्कि देश की ऊर्जा और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने में भी अहम भूमिका निभा रही हैं।

उद्योगों की मौजूदगी का लाभ सामाजिक विकास के क्षेत्र में भी दिखाई देता है। कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर), कम्युनिटी डेवलपमेंट योजनाओं तथा जिला खनिज संस्थान न्यास (डीएमएफ) को मिलने वाली राशि से शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और आधारभूत संरचना के विकास के अनेक कार्य संचालित किए जा रहे हैं। यही कारण है कि कोरबा और आसपास के क्षेत्रों में विकास की निरंतर प्रक्रिया बनी हुई है। हालांकि विकास और औद्योगिक प्रगति की इस तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही गंभीर है। फ्लाई ऐश प्रदूषण, वायु प्रदूषण, कोयला परिवहन से उडने वाली धूल तथा औद्योगिक उत्सर्जन लंबे समय से चिंता का विषय बने हुए हैं।

पर्यावरणविदों और जनप्रतिनिधियों द्वारा समय-समय पर इन मुद्दों को उठाया जाता रहा है। प्रदूषण के कारण जनस्वास्थ्य पर पड़ रहेप्रभावों को लेकर भी सवाल खड़े होते रहे हैं। श्वसन संबंधी बीमारियों से लेकर पर्यावरणीय असंतुलन तक के मुद्दे लगातार चर्चा में बने रहते हैं। ऐसे समय में जब 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की तैयारियां जोरों पर हैं, तब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या प्रदूषण की मूल समस्याओं का प्रभावी समाधान किए बिना पर्यावरण संरक्षण के संकल्प सार्थक सिद्ध हो सकते हैं?

कोरबा के विभिन्न ताप विद्युत गृहों से प्रतिवर्ष लगभग 8000 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा है। इसके साथ ही जिले में एल्यूमिनियम उत्पादन और कोयला खनन का विशाल नेटवर्क संचालित है। अकेले कोरबा जिले से हर वर्ष करीब 150 लाख टन कोयले का उत्पादन किया जाता है, जो राष्ट्र की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में योगदान देता है। औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार से लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार मिला है, वहीं व्यापार, परिवहन और सेवा क्षेत्रों को भी नई गति प्राप्त हुई है।

क्या केवल जागरूकता कार्यक्रमों और पौधरोपण अभियानों से जनस्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है? विशेषज्ञों का मानना है कि औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि उद्योग, प्रशासन और समाज मिलकर ऐसे ठोस कदम उठाएं, जिनसे विकास की गति भी बनी रहे और आने वाली पीढियों को स्वच्छ एवं सुरक्षित पर्यावरण भी उपलब्ध हो सके। आखिरकार, ऊर्जा उत्पादन और औद्योगिक समृद्धि तभी सार्थक मानी जाएगी जब उसके साथ जनस्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी भी समान रूप से निभाई जाए।

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