हसदेव बांगो बांध के विस्थापित परिवारों के समर्थन में कांग्रेस ने आयोजित किया महासम्मेलन

कोरबा 25 मई। हसदेव बांगो बांध के विस्थापित परिवारों के समर्थन में रविवार को बुका में विशाल महासम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में डॉ. चरणदास महंत, दीपक, सांसद ज्योत्सना महंत, टी. एस. सिंह देव समेत कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए।
सम्मेलन में बांगो बांध से प्रभावित विस्थापित परिवारों को जलाशय में मछली पकड़ने और बिक्री का स्वतंत्र अधिकार वापस देने की मांग प्रमुखता से उठाई गई।
महासम्मेलन में बांगो बांध से प्रभावित 52 गांवों के विस्थापित परिवार बड़ी संख्या में पहुंचे। महिलाओं की भी उल्लेखनीय भागीदारी रही। विस्थापितों ने बताया कि वर्ष 1991 में विस्थापन के बाद शुरुआती दौर में वे स्वयं मछली पकड़कर सरकार को मामूली रॉयल्टी देते थे और इसी से अपनी आजीविका चलाते थे। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्ष 2003 में ठेका प्रथा लागू होने के बाद उनका यह अधिकार समाप्त कर दिया गया, जिसके खिलाफ वे लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं
नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने कहा कि विस्थापित आदिवासियों के साथ दुर्व्यवहार और मारपीट की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि कोई आदिवासी जलाशय से मछली पकड़ने की कोशिश करता है तो उसके साथ अभद्र व्यवहार किया जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार स्वयं विधानसभा में स्वीकार कर चुकी है कि वर्ष 2007 से लागू वनाधिकार कानून जलाशयों में मछली पकड़ने वाले आदिवासियों पर भी लागू होता है, लेकिन अब तक इसका पालन नहीं किया गया। डॉ. महंत ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि विस्थापितों को उनका अधिकार वापस नहीं दिया गया तो कांग्रेस पार्टी उनके साथ मिलकर हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ेगी। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कांग्रेस हर स्तर पर संघर्ष करेगी।
पूर्व उपमुख्यमंत्री टी. एस. सिंह देव ने कहा कि वर्ष 2022 में मंत्री रहते हुए उन्होंने पेसा कानून का प्रारूप तैयार किया था, लेकिन सरकार बदलने के बाद अब तक उसे लागू नहीं किया गया। उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों के अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाया।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में 1,000 हेक्टेयर से अधिक बड़े जलाशयों में मछली पालन के लिए ठेका पद्धति लागू है। वहीं आदिवासी क्षेत्रों में वनाधिकार कानून के तहत मछली संसाधनों पर पहला अधिकार आदिवासियों का माना गया है। इसके बावजूद विस्थापित परिवार अब तक अपने अधिकार से वंचित हैं।
